बुधवार, 24 जनवरी 2018

आज की पद्मावती का हाल





पद्मावत , मैंने तय किया था कि इस विषय पर मैं न तो कुछ बोलूंगा और न कुछ लिखूंगा. क्यूंकि एक तो मैंने फिल्म देखी नहीं है और न ही मुझे इसका इतिहास पता है. लेकिन कल की गुरुग्राम की घटना ने मुझे मजबूर कर दिया. इस फिल्म के लिए चारों तरफ विरोध चल रहा था प्रदर्शन हो रहे थे. खैर विरोध प्रदर्शन तो हर किसी का संवैधानिक अधिकार है. लेकिन कल जो गुरुग्राम में हुआ ये कौन सा तरीका था विरोध प्रदर्शन का....? स्कूल बस में मासूम बच्चे बैठे थे. जिन्हे शायद 'पद्मावती और करणी सेना' का नाम भी नहीं पता होगा, लेकिन इसके नाम पर जो उन्होंने भय और आतंक भरे क्षण गुज़ारे हैं उनका कौन ज़िम्मेदार है? ज़रा दो मिनट सोच के देखिये, हँसते खेलते हुए ये बच्चे स्कूल से छुट्टी होने की ख़ुशी में घर की ओर जा रहे हैं और अचानक पत्थरों की बारिश शुरू हो जाती है और बस के शीशे टूटने लगते हैं. वो बच्चे जिनके चेहरों पर घर पहुंचने की ख़ुशी थी, अब घर पहुँच भी पाएंगे की नहीं ये डर हो गया. अचानक बस के अंदर रोने-चीखने की आवाज़ शुरू हो जाती है. लेकिन प्रदर्शनकारी को ज़रा भी दया नहीं आती है और वो लगातार पत्थरबाजी कर रहा है. अब यहाँ आप ये भी सोच के देखिये कि उसी बस में आपका बच्चा भी बैठा हुआ है. 

इस लिंक में आप देख सकते हैं की बच्चों की कैसी हालत थी उस वक़्त 

                                         आज पद्मावत इतना बड़ा मुद्दा बन गया है कि कई प्रदेश की सरकारें इसके विरोध
में आ गयी हैं. यहाँ तक की सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार इसके प्रदर्शन पर कोई रोक नहीं लग सकती. फिर भी प्रदेश की सरकार इस पर कानूनी राय लेने की बात कर रहे हैं कि इस पर कैसे रोक लगे. जिस पद्मावती के अपमान के कारण ये सारा प्रदर्शन चल रहा है, पता नहीं कितने संगठनों ने इसे समाज की इज़्ज़त का मुद्दा बना लिया है. लेकिन सब ये भूल गए कि जिस गुरुग्राम में प्रदर्शन के नाम पर बच्चों को डराया गया, उसी प्रदेश में पिछले 10 दिन में 10 पद्मावती के साथ बलात आचरण किया गया और उसमे कुछ नन्ही पद्मावती भी थी. अब पूछता हूँ कहाँ हैं वो समाज के ठेकदार, जिनकी इज़्ज़त पद्मावत के रिलीज़ होने से जा रही है, अगर इतनी ही इतिहास की चिंता थी तो पिछले 10 दिनों में इसके लिए क्यों नहीं विरोध प्रदर्शन हुए. क्या ये सब जो समाज में चल रहा है उससे उनके समाज की इज़्ज़त नहीं जा रही. क्या यही हमारा इतिहास रहा है. सेना चलाने वाले पद्मावत के निर्देशक, कलाकार के सर-नाक काटने  पर लाखों इनाम की घोषणा कर रहे हैं. अगर वो खुद को समाज का सच्चा संगरक्षक मानते हैं तो कभी उन्होंने समाज के इन अपराधियों के लिए ऐसी घोषणा क्यों नहीं की.
                      
                           ये सारा नाटक सिर्फ अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए चल रही है. साथ ही सरकारें इन जैसे लोगों को भरपूर समर्थन भी कर रही है. सामान्यतः एक आम आदमी अगर सर काटने की बात भी कर ले तो अगले घंटे वो खुद को जेल के अंदर पाएगा, लेकिन ये जनाब कई जगहों पर पार्टी विशेष का चुनाव प्रचार करते नज़र आते हैं वो भी भारी भरकम सुरक्षा व्यवस्था के साथ. इसलिए फिल्मों को छोड़ अगर समाज कि आज की  पद्मावती की  रक्षा के लिए ठोस कदम उठायें तो वो ज्यादा बेहतर होगा.

बुधवार, 13 दिसंबर 2017

कैसी ये चीत्कार है...

गोरखपुर हादसा 

कैसी चीत्कार है, ये कैसा हाहाकार है
मृत हुए मासूम, निष्ठुर ये सरकार है.
मां की ये गोद है, गोद मे अबोध है
मृत पड़ा है ये, माँ को नही ये बोध है.
लाशों का व्यापार है, कौन गुनाहगार है 
कैसी चीत्कार है, ये कैसा हाहाकार है.

गोद ये पिता की आज अर्थी बन गयी
माँ के कलेजे को ये टुकड़े टुकड़े कर गयी.
सीले हुए ये लब हैं, हाथों में शव है
पंक्तियों में सब है, संस्कार कब है.
मृत हुए मासूम, निष्क्रिय सरकार है
कैसी चीत्कार है ये कैसा हाहाकार है.


सोमवार, 26 जून 2017

खो गया मेरा वो हिंदुस्तान


कहाँ खो गया मेरा वो हिन्दुस्तान
संग थे जहां ॐ और अज़ान
धर्म  से बड़ा था जहां ईमान
कहाँ खो गया मेरा वो हिन्दुस्तान...

दिवाली, ईद दोनो थी हमारी शान
जहां संग रहते थे राम और रहमान
जब सिर्फ भाईचारा थी हमारी शान
कहाँ खो गया मेरा वो हिन्दुस्तान...

माँस की लड़ाई में बंटे हिन्दू मुसलमान
न जाने दिल में क्या पल रहे अरमान
इन्सानों को बंटते देख रो रहा आसमान
कहाँ खो गया मेरा वो हिन्दुस्तान...

चाँद से भी न कुछ सीख सका ये इंसान
शीतल ही है, करवाचौथ हो या रमज़ान
खो के इंसानियत ये बने हिन्दू मुसलमान
कहाँ खो गया मेरा वो हिन्दुस्तान...

शनिवार, 17 जनवरी 2015

किरन बेदी: अन्ना आन्दोलन से मोदीत्व तक...


दिल्ली चुनाव करीब है और इस वक़्त मुझे अन्ना हजारे का वो पुराना कुनबा याद आ रहा है. मंच के एक तरफ कुमार विश्वास हाथ में माइक ले कर गाते हुए "होठों पे गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो" और मंच के दूसरी तरफ किरन बेदी हाथों में तिरंगा ले कर लहराती हुई.
मंच पर अन्ना हजारे साथ ही एक आरटीआई एक्टिविस्ट अरविन्द केजरीवाल बीच-बीच में आ कर जनसमूह का अभिवादन स्वीकार करते थे. आज भी इस कुनबे की पूरी तस्वीर आँखों के सामने यदा कदा आ ही जाती है, जिसमे ये सभी सरकार और भारत के प्रमुख दोनों पार्टियों के खिलाफ नारा बुलन्द करते थे.

लेकिन आज की तस्वीर बिलकुल बदली हुई सी मुझे नज़र आयी. जिस गोधरा पर किरन बेदी ने सैकड़ों सवाल उठाये थे आज वो उसी अमित साह के बगल वाली कुर्सी पर बैठ कर मुस्कुराते हुए बार-बार नरेन्द्र मोदी के तारीफ के पुल बाँध रही थीं. हाय रे राजनीति, इस राजनीति ने तो देश के एक तेज़-तरार्र, बेदाग़ महिला पर भी अपनी छाप छोड़ दी. तभी बड़े-बूढ़े कहते हैं कि "बेटा राजनीति बड़ी गन्दी चीज़ है, लोग इसमें अपना ईमान तक बेच खाते हैं."




अब देखिए अन्ना आन्दोलन के बाद कहानी थोड़ी फ़िल्मी होती चली गयी. केंद्र में बीजेपी ने सरकार बना ली है. रालेगण सिद्धि में अकेले बैठे हुए अन्ना और उनके सहयोगियों की आखिरी किस्त भी उनसे विदा ले चुकी है. आंदोलन से जुड़ी एक पूर्व महिला पत्रकार अपने पुराने सहयोगियों को 'एक्सपोज' करने पर आमादा हैं. 'देशसेवा' के जज्बे से लैस देश की पहली महिला आईपीएस अधिकारी भाजपा में शामिल हो गई है और भाजपा ने इन्हें राजधानी में होने वाले चुनाव का अघोषित रूप से सबसे बड़ा चेहरा बना चुकी है. साथ ही एक बड़ी बात कि अन्ना का आंदोलन अब दुर्गति को प्राप्त हो चूका है. मतलब साफ़ है, चार साल में कई सपनों के चार टुकड़े हो गए हैं. हालांकि अरविंद अपनी गलतियों, खामियों और पुराने साथियों के साथ अपने जीवन की संभवत: सबसे अहम लड़ाई लड़ रहा है.

लेकिन किरन बेदी ने उस अन्ना आन्दोलन के दौरान भाजपा के ऊपर कई सवाल उठाये थे, क्या मैं ये मानूं कि किरन बेदी को उनके सभी सवालों के सही जवाब मिल चुके हैं या फिर मैं ये मान लूं कि जब भी किसी फैक्ट्री में हड़ताल होती है तो हड़ताल के नायक, यानि यूनियन लीडर को फैक्ट्री का मालिक बुला कर उसे वहां का मेनेजर बना कर मामला समाप्त कर देता है. शायद यहाँ भी ये मामला इसी तरीके से समाप्त करने की कोशिश तो नहीं की गयी?  

यहाँ समस्या ये नहीं है कि किरन बेदी भाजपा में शामिल हो गयी, दरअसल समस्या ये है कि कांग्रेस-भाजपा से लड़ते लड़ते ये भाजपा में शामिल हो गयीं. जिस भाजपा पर अपने ट्वीट के बौछारों से कई सवाल खड़े करती थीं, जैसे राजनीतिक पार्टी को आरटीआई में लाने का सवाल, गुजरात दंगे पर नरेन्द्र मोदी की भूमिका, लोकपाल-जोकपाल, गढ़करी कॉर्पोरेट कनेकशन. क्या अब आप अपने उसी सवाल से असहमत हैं? मैं इन्हें बस याद दिलाना चाहता हूँ कि ये खुद इन नेताओं को रंग बदलने वाले सियार कि संज्ञा दिया करती थीं, लेकिन अब ये खुद के लिए कौन से शब्द या विशेषण ढूंढ के रखीं हैं, ज़रा हमें भी बताएं.

जब अरविन्द ने आम आदमी पार्टी बनायी थी तो किरन बेदी ने अपने आप को बिलकुल गैर-राजनीतिक बताते हुए किसी पार्टी में जाने की संभावनाओं को भी खारिज़ किया था. फिर ये अचानक इन्हें क्या हो गया, कहीं मुख्यमंत्री की कुर्सी खाली देख कर अपने सिद्धांतों से पलट तो नहीं गयीं? अन्ना आन्दोलन इसी राजनीतिक
व्यवस्था के खिलाफ एक आवाज थी जिस व्यवस्था में आज आपने अपना विलय किया है. अगर यही करना था तो कांग्रेस भी बुरी नहीं थीं लेकिन वहां जाने में तो रिस्क था. क्यूंकि एक तो उसने आपको दिल्ली का पुलिस कमिश्नर नहीं बनने दिया और दूसरा भाजपा लगातार जीत रही एक स्थापित पार्टी है. यहाँ मेहनत कम करनी पड़ेगी, अब इस अवस्था में आपको अवसरवादी ना कहूँ तो क्या कहूँ?

किरन बेदी को अगर मुख्यमंत्री ही बनना था तो 2013 में आम आदमी पार्टी का मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनने का प्रस्ताव क्यों नहीं स्वीकार किया कहीं ऐसा तो नहीं कि इन्हें आम आदमी पार्टी की सरकार बनने का कोई अंदेशा ही न रहा हो? एक स्थापित राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ नई पार्टी बनाकर चुनाव लड़ना एक तरह का संघर्ष है, इसमें बहुत कुछ दांव पर लगाना पड़ता है. लेकिन यहाँ बिलकुल साफ़ है कि अन्ना हजारे की पीठ में छुरा किसने घोंपा? अन्ना आन्दोलन के दौरान एक स्वामी अग्निवेश कांग्रेस से मिल गए थे तो दूसरी ओर आप अग्निवेश की तरह भाजपा से मिल गयीं. वैसे मैडम जी, आपको रामविलास पासवान जैसे सहयोगी और येदुरप्पा जैसे साथी की नई संगत मुबारक हो.

शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2013

असली रावण कौन...?


पता नहीं क्यूँ कभी कभी ऐसा लगता है जैसे हमारी परम्पराएँ समय के साथ बदल जानी चहिये। सुनकर या फिर सोचकर कुछ लोग सहमत नहीं होंगे पर मेरे विचार में यही सच है। ये विचार मेरे मन में कुछ दिनों पहले बीते विजयादशमी के दिन आया, जब हर चौक, चौराहों, गली मुहल्लों और मैदानों में बुराई के प्रतीक रावण दहन का कार्यक्रम चल रहा था। दशहरा के दिन रावण के विशाल पुतले में आग लगा कर अधर्म पर धर्म के विजय का प्रतीकोत्सव मनाया जाता है। पर आज के समय में रावण कहाँ नहीं है और सड़कों पर चलते फिरते रावण के कुकृत्य से कौन अनजान है? आज भी अनेक सीताओ के अपहरण होते हैं, पर ऐसा कौन सा रावण है जो सीता को उसके हामी के इंतज़ार में उसे अशोकवाटिका में छोड़ता है? ये बात बिलकुल सत्य है कि सीता आज भी असहाय ही है पर शायद अब उनकी आँखों में अपनी सुरक्षा हेतु किसी राम की प्रतीक्षा नहीं होती है, बल्कि उनकी आँखों में असल रावण के न होने का मलाल ज़रूर होता है जो अशोकवाटिका के बदले सीधा बलात आचरण पर ही उतर जाता है। ज़रा सोचिये, हम जिस रावण का पुतला दहन करते हैं, उसी रावण के कैद से मुक्त होकर सीता श्रीराम की अग्निपरीक्षा में उतीर्ण हुई थी। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि बड़ा रावण कौन है, आज का रावण या फिर कल का रावण जिसका हम हर साल दहन करते हैं।

उस समय तो हम एक ही झलक से रावण को पहचान लेते थे, क्यूंकि वो दस सिर लेकर घूमता था। पर आज का रावण जिसे पहचान पाना बहुत मुश्किल है और उसके दस सिर भी नहीं होते। अभी सबसे बड़ा उदहारण साधू के रूप में घुमने वाला आसाराम है। कम से कम रावण के बारे में हर कोई जानता था कि वो दुराचारी राक्षस है। पर ऐसे रावण जो साधू का भेष धर के रावण से भी आगे निकल चुके हैं तो ऐसे में सीता कहाँ सुरक्षित रह सकती है। वो रावण तो साधू का भेष धर के सीता का अपहरण किया पर सीता को अशोकवाटिका में रखा क्यूँकि उनके पति वनवास काट रहे थे और रावण नहीं चाहता था कि सीता के पतिव्रता धर्म पर कोई आंच आये। वो चाहता तो ज़बरदस्ती सीता को महल में रख सकता था पर ऐसा कभी नहीं किया। पर आजकल के इस साधूरूप में छुपे रावण को देखकर तो ऐसा लगता है कि अगर साक्षात् श्रीराम भी धरती होते तो इन्हें देखकर वो खुद भी शर्मसार हो जाते। अब तो ऐसा लगता है जैसे वक़्त आ गया है कि हम जागरूक हो जाएँ और इस साधुरूपी रावण को महिमामंडित करने के बजाये दण्डित करने की शुरुआत करें। तभी हमारे समाज और देश का भला होना संभव है।

मंगलवार, 30 अप्रैल 2013

धन्यवाद तेरा जो कोख में तू मुझको लाई माँ

मैंने यहाँ कुछ कोशिश की है कि अपने देश में जो आजकल हो रहा है, खासकर बच्चियों के साथ जो यौन उत्पीड़न के मामले सामने आ रहे हैं. अगर एक माँ जिसके कोख में एक बच्ची पल रही हो तो वो बच्ची यहाँ के हालात पर क्या सोचती है...?



धन्यवाद तेरा जो कोख में तू मुझको लाई माँ
पर क्या करूँ आ कर जहाँ सिर्फ हो बुराई माँ
जहाँ हर रिश्ता जैसे ख़त्म हो रहा हो बनकर धुआं
क्या करुँगी आकर तेरे इस बुरे घर बार में माँ

जहाँ पिता और भाई भी करे इज्ज़त को तार तार
किसकी बाहों में खेलूंगी, कैसा चल रहा ये कारोबार
मानती हूँ तेरी रौशनी बन के यहाँ मैं आई माँ
धन्यवाद तेरा जो कोख में तू मुझको लाई माँ

माँ कुछ ऐसा कर दे कि बेटी कोख में ही ना आ पाए
कम से कम हर रिश्ता दागदार होने से तो बच जाये
ना कर मुझसे मुझे जन्म देने कि अब लड़ाई माँ
धन्यवाद तेरा जो कोख में तू मुझको लाई माँ

सोच कर थम जाती हैं साँसे, सहम जाता है ये दिल
किस रिश्ते पर करूँ भरोसा, कोई नहीं इस काबिल
मुझे वापस वही भेज दे जहाँ से मुझको तू लाई माँ
धन्यवाद तेरा जो कोख में तू मुझको लाई माँ

गुरुवार, 6 सितंबर 2012

क्या ठाकरे की बपौती है मुंबई...?

पिछले दो-तीन दिनों से अखबारों और न्यूज़ चैनल पर बाल ठाकरे एण्ड कंपनी को बिहारियों के खिलाफ ज़हर उगलते हुए देख रहा हूँ. कल तो हद ही हो गयी, एक सिनेमा हॉल में भोजपुरी फिल्म चल रही थी और वहाँ राज ठाकरे के गुंडों ने हमला बोल दिया, जो पकड़ में आया उसे बुरी तरह पीट दिया. यह सब देख कर पता नहीं क्यूँ मुझे आज राहुल गाँधी याद आ गए और साथ ही उनका फ़रवरी 2010 का बिहार दौरा याद आ रहा है. जी हाँ, मुझे उसी राहुल गाँधी की याद आई है जो बिहार चुनाव के ठीक पहले पटना आये थे और सिंह गर्ज़ना करते हुए कहा था कि “बिहारियों को महाराष्ट्र जाने से कोई नहीं रोक सकता. अगर कोई इसकी हिम्मत भी करता है तो उसे करारा जवाब दिया जाएगा.” पर कहाँ गया वो कुरते की आस्तीन चढा कर शानदार भाषण देने वाला व्यक्ति जब फिर से बिहारियों पर हमले हुए. आज मराठियों के खिलाफ रोष प्रकट करने वाला राहुल गाँधी ठीक उसी तरह गायब है जैसे गधे के सर से सींग गायब होता है, आखिर ये कैसी लुका छिपी है? मुझे याद आता है जब राहुल से नाराज़ हो कर शिव सेना ने राहुल गाँधी के मुंबई घुसने पर पाबंदी लगा दी थी. पर राहुल गाँधी मुंबई आये लेकिन उसके पीछे जो पुलिस व्यवस्था की गयी थी वो देखने लायक थी. जी हाँ लग रहा था जैसे परिंदा भी पर नहीं मार सकता. राहुल गांधी के मुंबई पहुचने के ठीक पहले करीब 300 से ज्यादा शिव सैनिक गिरफ्तार किये गए थे. जबकि मुझे याद नहीं है कि जब भी बिहारियों या उत्तर भारतियों पर हमले हुए हैं उस वक्त 30 शिव सैनिक भी गिरफ्तार हुए हों. हाँ पुलिस वालों की ड्यूटी मुंबई के हर स्टेशनों पर ज़रूर लगा दी जाती है जो बिहारियों को ज़बरदस्ती ट्रेन में बिठा कर वापस भेजने का काम करती है. यहाँ सरकार का मतलब साफ़ है कि वो भी दबे जुबां से इन दंगाइयों की मदद कर रही है. अभी तक जितने भी हमले बिहारियों पर हुए हैं उनमे कभी भी मैंने किसी कांग्रेस के नेता को आगे आ कर बोलते हुए नहीं सुना है. जबकि महाराष्ट्र में इन्ही की सरकार है अगर चाहें तो ऐसे गुंडों को सबक सिखाने में इन्हें ज़रा भी वक्त नहीं लगेगा पर नहीं बोलेंगे क्यूंकि यहाँ चुनाव नजदीक है. वैसे कई प्रदेशों का भगोड़ा ठाकरे कुनबा जिसके मराठी होने का सबूत अभी तक किसी इतिहासकार को मिला ही नहीं है. कोई कहता है ये बिहार से आया है, कोई यू.पी. कहता है तो कोई एम.पी. अलग अलग अध्ययन से यही पता चला है कि महाराष्ट्र के पहले इनका अंतिम आश्रय स्थल मध्य प्रदेश का देवास जिला था और वहाँ से रोजगार की खोज में महाराष्ट्र आये थे. साथ ही यहाँ मैं एक और बात बताना चाहूँगा कि “ठाकरे” इनका टाइटल है ही नहीं. बाल ठाकरे के दादा उस वक्त के एक ब्रिटिश लेखक विलियम मेकपिस ठाकरे से बहुत प्रभावित थे और उसी का अंतिम नाम अपने बेटे केशव सीताराम ठाकरे उर्फ प्रबोंधंकर ठाकरे को दिया. मतलब साफ़ है कि ठाकरे कुनबा का यह नाम भी एक दो पीढ़ी ही पुराना है. अब यहाँ सवाल ये उठता है कि क्या बाल ठाकरे के दादा सीताराम सच में उस ब्रिटिश लेखक से प्रभावित हो कर अपने बेटे को एक नया टाइटल दिए या फिर पुरानी यादों को मिटा कर बच्चों की नयी जिंदगी, एक नए तरीके से, एक नए प्रदेश में शुरू करवाना चाह रहे थे जिसका फायदा आज ठाकरे कुनबा उठा रहा है. मराठी प्रेम तो इस तरह इनके अंदर भरा हुआ है कि हर चीज़ ये मराठी में ही करवाने की बात करते हैं. शिवसेना का कार्यकारी अध्यक्ष उद्धव् ठाकरे हमेशा मराठी बोलने और मराठी स्कूलों में पढ़ने पर जोर देता है पर इससे उसे खुद को कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसका बेटा कहाँ पढ़ रहा है. जी हाँ, आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि उद्धव ठाकरे का बेटा आदित्य ठाकरे जो अभी युवा शिवसेना के अध्यक्ष हैं वो मुंबई के महंगे और बड़े स्कूलों में से एक स्कूल में पढते थे. ये स्कूल था “बॉम्बे स्कॉटिश स्कूल” जहाँ सभी बड़ी बड़ी बॉलीवुड की हस्तियाँ पढ़ा करती थीं और आज वहाँ उनके बच्चे पढ़ रहे हैं. अब आप ही देखिए ये है मराठी भाषा का नारा बुलंद करने वाला नेता. मेरा मानना है कि अगर आप मराठी स्कूलों की इतनी वकालत करते हो तो अपने बच्चों को वहाँ क्यूँ नहीं भेजते? भारत की आर्थिक राजधानी कही जाती है मुंबई. इसका मतलब साफ़ है कि यह मुंबई सभी भारतीयों का उतना ही है जितना मराठियों का. मुंबई इस ठाकरे की कोई बपौती नहीं है जो कि जब चाहे बिहारियों के खिलाफ फतवा ज़ारी कर दे. पूरे देश में मुंबई का नाम फिल्म उद्योग के कारण ही है और इस ठाकरे को मैं ये भी याद दिला दूं कि इस उद्योग में उत्तर भारतियों का ही सिक्का चलता है. यहाँ मैं सभी तो नहीं कहूँगा पर हाँ अधिकतम बड़े निर्माता निर्देशक उत्तर भारतीय ही हैं. अगर हम आंकड़ों पर गौर करें तो मुंबई में सिर्फ भोजपुरी फिल्म का व्यवसाय २०० से ३०० करोड का है. अब आप ज़रा सोचिये कि ये सिर्फ मुंबई में भोजपुरी फिल्म के व्यवसाय का आंकड़ा है और ये बिहारियों के खिलाफ ज़हर उगलते हैं. ये तो वही बात हो गयी कि “जिस थाली में खाया उसी में छेद कर दिया.” मतलब साफ़ है कि यहाँ आ कर हम आपको रोटी दे रहे हैं और आप हमें ही आँखें दिखा रहे हो. कोई बात नहीं कहा ही जाता है कि “अपने इलाके में कुत्ता भी शेर बनता है” जितना भौकना हो भौंक लो क्यूंकि हाथी को कोई फर्क नहीं पड़ेगा. पर बस डर एक ही बात का है कि जिस तरह से गुंडागर्दी ये वहाँ मचा रहे हैं कही फिर कोई राहुल राज ना पैदा हो जाए.

गुरुवार, 29 मार्च 2012

बिहार- सुशाषण फिर मीडिया पर भारी

22 मार्च 2012, हर बिहारी के लिए जैसे जश्न का दिन था. इसी दिन वर्ष 1912 में बंगाल से अलग होकर एक नयी पहचान बनाने को एक नए राज्य का निर्माण हुआ, जिसका नाम था बिहार. इसी 22 मार्च 2012 को बिहार निर्माण के 100 वर्ष पूरे हुए और पूरा प्रदेश जश्न के माहौल में डूबा हुआ था. शायद हर बिहारी के लिए ये गर्व का दिन था चाहे वो बिहार में रह रहे हों या फिर अप्रवासी हों. मैं भी अगले दिन अखबारों में जश्न की तस्वीरें देख रहा था और ख़बरें पढ़ रहा था. पर पता नहीं क्यूँ मुझे ऐसा महसूस हो रहा था कि मैं ख़बरें नहीं पढ़ रहा हूँ बल्कि बिहार सरकार का विज्ञापन देख रहा हूँ. ऐसा लगा रहा था जैसे बिहार के सभी अखबारों की ख़बरें प्रायोजित हैं. इसका कारण ये नहीं है कि अखबार ने सरकार के कार्यक्रम को बढ़ा-चढ़ा कर छापा था बल्कि कारण ये है कि मैंने एक और खबर उसी अखबार के पिछल्ले पन्ने पर देखा. जी हाँ, दैनिक हिन्दुस्तान के पेज न. 10 पर एक खबर छपी थी कि "आयकर टीम पूजा फ़ूड प्रोडक्ट की संपत्ति का आकलन करने में जुटी, करोड़ों रुपये के आयकर की चोरी." जब इस खबर को विस्तार से मैं पढने लगा तो पता चला कि "यह कंपनी किसी पूर्व विधान पार्षद का है और जब इनके ठिकानों पर छापेमारी हुई तो करीब साढ़े चार करोड़ की नगदी एक बोरे में ठूसी हुई मिली. कंपनी के पार्टनर्स का पटना में 50 से ज्यादा फ्लैट हैं और 12 करोड़ से ज्यादा अघोषित आय की जानकारी विभाग को मिली है. साथ ही कंपनी पार्टनर्स के लॉकर्स और कई बैंक अकाउंट का भी पता चला है जिसकी जांच अभी जारी है." पूरी खबर पढने के बाद मेरी उत्सुकता ज्यादा बढ़ गयी कि इतनी बड़ी खबर और अब तक की बहुत बड़ी बरामदगी है ये आय कर वालों की तरफ से, फिर भी ये अखबार के दसवें पन्ने पर क्यूँ है? एक बात और मैं यहाँ बता देना चाहता हूँ कि इस खबर की हेडलाईन चार कॉलम में थी पर खबर दो कॉलम में ही ख़तम हो गयी थी. फिर मैंने अपनी उत्सुकता शांत करने के लिए खबर की पड़ताल करने में जुट गया. लेकिन पड़ताल के बाद जो बातें सामने आई उसमे यही पता चलता है कि सच में प्रदेश की मीडिया पर सरकार का कितना दबाव है. अब आप भी सोचेंगे कि इस खबर को पहले पन्ने पर न छापने का दबाव सरकार क्यूँ देगी? तो अब आप भी सुनिए कि जिस व्यक्ति की पहचान मीडिया छुपाने की कोशिश कर रही थी वो हैं विनय कुमार सिन्हा और ये जनता दल यूनाइटेड के कोषाध्यक्ष भी रह चुके हैं. साथ ही सुशाषण बाबू मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के घनिष्ठ करीबियों में माने जाते हैं. अब मैं अगर बताऊँ कितने करीब तो आप ही समझ लीजिये कि मुख्यमंत्री निवास में आने के पहले तक अपने पटना प्रवास के दौरान सुशाषण बाबू इसी विनय कुमार सिन्हा के फ्लैट में रहते थे. हो सकता है कि आयकर विभाग द्वारा जप्त इन्ही 50 फ्लैट में से किसी एक में रहते होंगे और अगर जिसने मुख्यमंत्री का इतना ख्याल रखा हो तो ये खबर बिहार के किसी भी अखबार के पहले पन्ने पर तो बमुश्किल ही आ सकता है.

बिहार में अखबार पढने वाले 89% लोग ज्यादातर दो ही अखबार पढ़ते हैं, दैनिक हिन्दुस्तान और दैनिक जागरण. जिसमे कि दैनिक हिन्दुस्तान के दसवें पन्ने पर इस तरह से छापा गया कि लोगों को खबर समझ ही न आये और दूसरा अखबार दैनिक जागरण में तो मुझे ये खबर कही मिली ही नहीं. अब अगर इस सिलसिले को मैं आगे बढाऊँ तो आपको मैं अगले अखबार की तरफ ले जाता हूँ प्रभात खबर. ऐसा कहा जाता है कि यह बिहार का सबसे तेजी से बढ़ता हुआ अखबार है. लेकिन इस अखबार में भी ये खबर नवें नंबर पर दिखा. खबर पढने के बाद ऐसा लगा कि जैसे एक छोटा सा हेडलाईन "बारह करोड़ की अघोषित आय" दे कर बस इसे निपटा दिया गया था. इसके बाद बांकी किसी हिंदी अखबार में मझे ये खबर नहीं दिखा. अब बात ये है कि सुशाषण बाबू कब तक कोशिश करते रहेंगे की उनके खिलाफत की खबर जनता तक ना पहुंचे. यहाँ बात सिर्फ सुशाषण बाबू की नहीं है यहाँ सवाल मीडिया के आचरण पर भी उठ रहा है. पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहा जाता है पर अब बिहार में ऐसा कहा जा सकता है कि पत्रकारिता अब लोकतंत्र का नहीं सरकार का एक मजबूत स्तम्भ हो गया है. क्यूंकि ये अब सरकार को मजबूत बनाने में लगा हुआ है. हाल ही में राष्ट्रीय स्तर पर सबसे ज्यादा चर्चा में रहा 'कोयला घोटाला' को उजागर करने का दावा करने वाले इन अखबारों ने नीतीश कुमार की पार्टी और विनय कुमार सिन्हा के बीच के संबंधों पर पूरी तरह पर्दा डाल दिया. खैर इतना तो चलता है अगर आपका कोई घनिष्ठ प्रदेश का मुख्यमंत्री हो. क्यूंकि आपने भी सुना ही होगा कि "जब सइयां भये कोतवाल, तो दर काहे का" अब मैं एक और दिलचस्प बात आपलोगों को बताता हूँ, आज से छह साल पहले तक लोहिया, जेपी और बाद के दिनों में भूतपूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर को सबसे चरित्रवान बताने वाले प्रभात खबर के प्रधान संपादक को अब सिर्फ नीतीश कुमार ही एक मात्र स्टेट्समैन नजर आते हैं. जाहिर है कि जब प्रधान संपादक की दृष्टि ऐसी होगी तो अखबार तो दृष्टिदोष का शिकार होगा ही. अब अगर दृष्टिदोष की बात चल ही गयी है तो आपको दैनिक हिन्दुस्तान के दृष्टिदोष का भी कारण मैं बता दूं. सुशाषण बाबू की पार्टी से सांसद एन. के. सिंह एच. टी. मीडिया के बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स में शामिल हैं. अब ऐसे लोग जब संचालन टीम में ही हो तो किसकी मजाल है कि सरकार के खिलाफ ख़बरें लिखने की हिमाकत करे. अब अगर इसके बाद भी किसी अखबार में खिलाफ की ख़बरें आ गयी तो बस दुसरे ही दिन से अखबार को मिलने वाले लाखों रुपये के विज्ञापन बंद. आप ही बताएं बिना धन के अखबार तो चल ही नहीं सकता क्यूंकि कहा गया है "धन बिन सब सुन्न." वैसे अगर आप सबों को याद हो तो आपातकाल के समय में इंदिरा गांधी ने अखबारों से थोडा झुकने को कहा था पर नीतीश काल में तो ये इनके आगे रेंगने लगे. अखबारों का नीतीश के आगे रेंगने के ढेरों उदाहरण आपको मिल जाएंगे. अभी ताज़ा उदाहरण तो मैंने दे ही दिया है ऐसे और भी कई मामलों में अखबारों ने खबर देने में पक्षपात किया है. गत दिनों फारबिसगंज के मामले को अखबार ने जिस तरह से इसे कवरेज़ किया था इससे वहां कि स्थिति बिलकुल साफ़ नज़र आती है. जंगलराज की समाप्ति के बाद आज भी बिहार में पुलिस अत्याचार, भ्रष्टाचार, हत्या, अपहरण, फिरौती, बलात्कार जैसी घटनाएं बड़े पैमाने पर घट रही हैं. पर राजद सरकार में ऐसी ख़बरें प्रमुखता से पहले पन्ने पर आती थी जिसे अब धकेल कर अंदर के पन्नों में भेज दिया गया है या फिर ये खबर बनती ही नहीं है. क्यूंकि इससे इनके सुशासनी दावों की पोल खुल जाएगी और अगर अखबार सरकार की पोल खोलना शुरू कर देंगे तो मुख्मंत्री सरकारी विज्ञापन देना बंद कर देंगे. अब सारा दोष हम पत्रकारिता को भी नहीं दे सकते क्यूंकि हम जनता समझते सब हैं लेकिन जवाब वक़्त आने पर देते हैं. ये राजनेता जनता को भगवान का दर्ज़ा देते हैं और बुजुर्गों ने कहा है कि "भगवान की लाठी में आवाज़ नहीं होती." इसलिए हमारा भी दिन ज़ल्दी आएगा जब हम बिना आवाज़ वाली वोट रुपी लाठी से हमला बोलेंगे.

सोमवार, 4 जुलाई 2011

बिहार- सुशासन पर भारी भ्रष्टाचार...

पांच साल पहले नवम्बर 2005 में अप्रत्याशित जीत के साथ नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लिए. एक लम्बे अंतराल के बाद इतना बड़ा परिवर्तन यहाँ हुआ था. इस परिवर्तन के कई कारण माने जाते हैं, जैसे लालू प्रसाद के जंगलराज और कुशासन से लोग त्रस्त हो चुके थे. साथ ही फ़रवरी 2005 में त्रिशंकु लोकसभा के बाद बिहार में छह महीने का राष्ट्रपति शासन ने लोगों को प्रशासन में नयी व्यवस्था के लिए आकर्षित किया. लेकिन साथ ही "नीतीश कुमार, नया बिहार" का नारा देकर ब्रांड नीतीश को बिहार के सुख और समृद्धि के पासपोर्ट के तौर पर वोट रुपी बाज़ार में उतारा. इन्होने पांच साल तक मीडिया का भरपूर उपयोग करते हुए अपनी पूरी मीडिया मार्केटिंग की और दुबारा 2010 में भी अपनी धमाकेदार वापसी की.

लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या सचमुच बिहार की तरक्की हुई है, क्या जंगलराज से मुक्ति मिल गयी है और बिहार भ्रष्टाचारमुक्त हो चूका है? जब इसका जवाब आप ढूँढने निकलेंगे तो सौ मुंह और सौ बातें होंगी. पर चलिए आज हम सच्चाई से ज़रा रूबरू हो जाएँ. अगर हम CAG (Comptroller and Auditor General) की 2008-2009 की रिपोर्ट देखेंगे तो पाते हैं कि बिहार में 11000 करोड़ का बिल प्रस्तुतिकरण या निधियों के दुरूपयोग का राजकोष घोटाला हुआ. ये घोटाला पशुपालन के 1000 करोड़ से कितना गुना ज्यादा है इसका अंदाज़ा आप खुद लगा सकते हैं. इसी वर्ष के CAG रिपोर्ट में एक और बहुत बड़ा और चौकाने वाला मामला सामने आया था. वर्ष 2007 के अगस्त से अक्टूबर के दौरान बिहार के कोसी बाढ़ पीड़ितों को भेजा जाने वाला करीब 3000 क्विंटल से ज्यादा के अनाज वितरण में ज़बरदस्त अनियमितता देखने को मिला है. बिहार राज्य खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति निगम खगड़िया के अंतर्गत मानसी रेलवे स्टेशन से 32 ट्रकों से अनाज उठा कर नियत स्थान पर पहुँचाया गया. लेकिन जांच के बाद जब उन ट्रक के पंजीकृत नंबरों को खंगाला गया तो पाया गया कि अधिकतम नम्बर मोटरसाईकिल, ट्रैक्टर, स्कूटर, जीप और मिनी ट्रक के निकले. अब तो ऐसा लगता है कि ये अनाज ज़रुरतमंदों तक पहुँच भी पाया कि नहीं?

घोटालों की फेहरिस्त को आगे बढाते हुए अब हम चलते हैं स्वास्थ्य सेवा की ओर. CAG के रिपोर्ट में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन योजना में धोखाधड़ी कर धन निकासी का मामला प्रकाश में आया है. जननी सुरक्षा योजना के तहत प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में बच्चों को जन्म देने वाली माताओं को हर जन्म पर 1400 रुपये सहायता राशि स्वरुप मिलती है और CAG के रिपोर्ट के अनुसार पांच जिलों के 14 प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों (किशनगंज, भागलपुर, नालंदा, गोपालगंज और पूर्वी चंपारण) के लिए छह लाख साठ हज़ार रुपये निकाले गए हैं. साथ ही रिपोर्ट में यह भी दर्शाया गया है कि इन पैसों में 298 महिलाएं लाभान्वित हुई हैं और दो से पांच बच्चों को महज दो महीने में जन्म देकर इस राशि से इन महिलाओं को नगद लाभ हुआ है. अब आप ही सोच सकते हैं कि भ्रष्टाचार किस चरमसीमा तक पहुँच चुकी है. ये तो सिर्फ 14 प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों रिपोर्ट है. ज़रा आप ही अब अंदाजा लगायें कि अगर पूरी 534 प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों के बारे में रिपोर्ट आ गयी तो ये धन निकासी का आंकड़ा क्या होगा?

खैर ये तो बात थी आंकड़ों कि लेकिन जब आप आंकड़ों से हट कर बात करेंगे तो पता चलेगा घोटालों और भ्रष्टाचार कि हालत बिहार में किस चरमसीमा तक पहुँच चुकी है. बिहार के हर एक प्रखंड में एक पद है CDPO (child development project officer) का. जिसके अन्दर करीब 200-300 आंगनबाड़ी आते हैं. यहाँ कहा जाता है कि एक CDPO कि सरकारी वेतन चाहे जो भी हो लेकिन उन्हें हर आँगनबाड़ी से गैर सरकारी वेतन अर्थात अतिरिक्त आमदनी 1100 रुपये कि होती है. तो आप ज़रा अंदाजा लगायें कि अगर 200-300 आंगनबाड़ी से इतनी ही रकम अगर हर महीने मिले तो इनकी आमदनी प्रतिमाह लाखों में हो रही है. ये सिर्फ मैं नहीं, आँगनबाड़ी में कार्यरत हर कोई जानता और कहता है. अब यहाँ देखने कि बात ये है कि ये पैसा सिर्फ प्रखंड के CDPO के पास ही रहता है या इसे ऊपर तक कई हिस्सों में बांटा जाता है. अब ज़रा हम बिहार के स्कूलों का रूख करेंगे तो यहाँ भी भ्रष्टाचार कम नहीं है. यहाँ हर स्कूल को "मिड डे मील" के नाम पर कई क्विंटल अनाज दिया जाता है. लेकिन अगर आप स्कूल में विद्यार्थियों की उपस्थिति देखने जायेंगे तो पता चलेगा कि करीब 300विद्यार्थियों में से 50-60 ही स्कूल में उपस्थित हैं. लेकिन आप स्कूल का उपस्थिति रजिस्टर चेक करेंगे तो पायेंगे को कम से कम 90 से 95 प्रतिशत विद्यार्थी उपस्थित हैं. अब सवाल ये उठता है कि ये सिर्फ कागज़ी उपस्थिति क्यूँ? असल में ऐसा इसलिए है कि ज्यादा उपस्थिति दर्ज कराने के बाद बचा हुआ "मिड डे मील" का अनाज बाज़ार में बेच दिया जाता है. ये सिर्फ सरकार ही नहीं देख पा रही है जबकि गाँव का हर व्यक्ति खुलेआम ये कहानी आपको सुना और दिखा सकता है. अब इतना बड़ा घोटाला हो रहा है तो क्या बड़े अफसरों को इसकी जानकारी नहीं है? वैसे जानकारी है भी तो वो कुछ नहीं करेंगे क्यूंकि उनका हिस्सा जो उनके पास पहुँच जाता है.

चलिए अब हम अपना रूख बिहार के कुछ सत्ताधारी विधायकों कि तरफ करते हैं और उनकी संपत्तियों कि वृद्धि दर के बारे में पता करते हैं. इससे आपको पता चलेगा कि जनता कैसे हलाल हो रही है और हमारे विधायक इस सुशासन राज में कैसे मालामाल हो रहे हैं. इनकी संपत्ति की वृद्धि दर देख कर आप भी चौंक जायेंगे.

NDA MLA
विधायक             विधानसभा            2005                  2010
वृषण पटेल           वैशाली            11.27(लाख)            1.72(करोड़)
दामोदर सिंह         महाराजगंज        2.90(लाख)           57.36(लाख)
गुड्डी देवी            सैदपुर              3.11(लाख)            68.46(लाख)
मनोज कु.सिंह        कुढ़नी             23हज़ार                40.90(लाख)
अनंत कुमार           मुंगेर            13.91 लाख            59.12 लाख
अनिल कुमार          विक्रम            31.47 लाख           1.27 करोड़
अनिरूद्ध कुमार         निर्मली           25.14 लाख           1.11 करोड़
अमरेंद्र प्रताप सिंह     आरा            10.9 लाख            32.58 लाख
अशोक कुमार यादव     केवटी           14.27 लाख          51.48 लाख
नीतीश कुमार मिश्रा    झंझारपुर          37.39लाख          1.32 करोड़
पूर्णिमा यादव           नवादा            34.92 लाख            2.78 करोड़
रेणु देवी प.            चंपारण             41.31 लाख          2.11 करोड़
एसएन आर्या          राजगीर            24.78 लाख           1,6 करोड़ (सौजन्य- महुआ न्यूज़)

ऊपर के आंकड़ों को देख कर आप तो अंदाजा लगा ही चुके होंगे कि सुशासन कुमार के ऑफिसर और विधायकगण पूरी इमानदारी के साथ जनसेवा में लगे हुए हैं. नीतीश कुमार जी की इस भ्रष्टाचार विरोधी मुहीम में उनका बढ़ चढ़ कर साथ दे रहे हैं, इससे आपको अब अंदाजा हो गया होगा कि सुशासन के इस थोथेबाजी में भ्रष्टाचार किस तरह से हावी है. मेरा बस मुख्यमंत्री जी से अनुरोध है कि मीडिया मैनेजिंग छोड़ के कुछ बिहार मैनजेमेंट के बारे में सोचे और सिर्फ मीडिया में ही नहीं असल में भी बिहार को सर्वश्रेष्ट राज्य बनाने के लिए कदम उठायें.

मंगलवार, 14 जून 2011

बिहार- सुशासन में मीडिया का योगदान.....

बिहार के मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार का नाम जनता ने आज बदल कर सुशासन कुमार रख दिया है. क्यूंकि चारो ओर खुशहाली और हरियाली दिख रही है. पर आज मैंने इसी सुशासन कुमार के राज्य का एक तालिबानी विडियो क्लिप किसी न्यूज़ चैनल पर देखा, जिसने मेरे रौंगटे खड़े कर दिए. इस क्लिप को देखने बाद से मुझे समझ नहीं आ रहा है कि मैं मुख्यमंत्री का नामकरण सुशासन कुमार करूं या फिर कुशासन कुमार? इस क्लिप में हाल ही में अररिया, फारवीसगंज में हुए गोलीकांड के बाद का जिक्र है. जिसमे एक पुलिसवाला 16-17 साल के बेहोश पड़े हुए बच्चे के चेहरे पर घुटने के बल कूद जाता है. फिर अपने बूट से उसके सर पर निर्मम वार करता है. अब इससे भी मन नहीं भरा तो अपने साथी से डंडा मांगने लगता है, जिसे उसके साथी ने मना कर दिया. सच में अगर आपने वो विडियो क्लिप देख लिया तो आपका खून खुल उठेगा इस सरकार के खिलाफ. http://aajtak.intoday.in/videoplay.php/videos/view/57589/2/206/what-should-be-name-of-this-barbaric-act.html
जी हाँ यहाँ मैंने वेब एड्रेस डाला है इस URL को आप कॉपी पेस्ट करके वो विडियो क्लिप देख सकते हैं.

जब मैंने ये देखा तो इस खबर को विस्तार से जानने के लिए मैंने जांच-पड़ताल शुरू कर दी, तो पता चला कि ये ज़मीन अधिग्रहण का मामला है. सरकार ने ओरो सुंदरम इंटरनेशनल प्रा. लि. को एक फैक्ट्री लगाने के लिए ज़मीन बेचीं थी. पर जो ज़मीन फैक्ट्री को दी गयी वो गांव आने जाने का एकमात्र सार्वजनिक रास्ता है जिस पर कई सरकारी निधियों द्वारा सड़क निर्माण के नाम पर पैसा लगाया जा चूका है. जिससे गांववाले उसी रास्ते से गांव कि अन्दर बाहर जाते थे और इसी का विरोध गांव वालों ने किया. पर सुशासन सरकार ने गाँव वालों के विरोध के खिलाफ जो पुलिसिया कारवाई की वो बेहद शर्मनाक थी. सरकार ने तो इंदिरा सरकार के आपातकाल दौर को भी पीछे छोड़ दिया, जिसका एक अंश आप उस विडियो क्लिप में भी देख सकते हैं. वहां पुलिस द्वारा ज़बरदस्त गोलीबारी की गयी जिसमे सरकारी आंकड़ों के हिसाब से चार लोगों की मौत हो गयी. अब सवाल ये उठता है कि गलत ज़मीन क्यूँ सरकार द्वारा बेचीं गयी और जब गाँव वालों ने विरोध किया तो ये तालिबान की तरह पुलिसिया कारवाई क्यूँ कि गयी? कहीं इसमें सरकार या फिर सरकार में शामिल किसी का स्वार्थ तो नहीं छिपा हुआ था? जी हाँ, ओरो सुंदरम इंटरनेशनल प्रा. लि. के निदेशक अशोक चौधरी हैं और इसमें भाजपा के विधान पार्षद अशोक अग्रवाल के पुत्र सौरभ अग्रवाल भी साझेदार हैं. तो अब सवाल ये उठता है कि कही ये कारवाई सरकार इशारे पर तो नहीं हुई?

खैर इसमें साझेदार जो भी है पर सबसे बड़ा सवाल ये है कि नंदीग्राम के बराबर का ये कांड था पर बिहार कि मीडिया में इस खबर को कितनी प्रमुखता से छापा गया? बिहार के तीन-चार प्रमुख और चर्चित अखबार हैं, जिसमे फारविसगंज की खबर को प्रमुखता से नहीं बस एक सूचना के तौर पर जगह मिली. चाहे वो, दैनिक हिन्दुस्तान हो, चाहे दैनिक जागरण या फिर प्रभात खबर. अगर घटना के दुसरे दिन रविवार 5 जून का अखबार आप देखंगे तो पाएंगे कि बड़े अखबारों हिन्दुस्तान और दैनिक जागरण के पटना संस्करण के पहले पन्ने पर फारबिसगंज पुलिस गोलीबारी से संबंधित कोई खबर ही नहीं थी. इतना ही नहीं शनिवार को उपरोक्त अखबारों में इस गोलीकांड के विरोध में भाकपा (माले) द्वारा निकाले गये प्रतिवाद मार्च की खबर या तो अंदर के पन्नों पर किसी कोने में इस तरह छापी गयी कि मुश्किल से उस पर नजर पड़ती. या फिर इस मार्च को हिंदी अखबारों ने कोई जगह ही नहीं दी. दरअसल बड़े हिंदी अखबारों ने यह दिखाने की पूरी कोशिश की, कि इस बर्बर घटना के बावजूद राजधानी पटना में सब शांति-शांति है. लेकिन लोकतंत्र का ये चौथा स्तम्भ बिहार में इतना पंगु क्यों है, शायद इन्हें लगता है कि अगर जनता को इस बर्बरता के बारे में बताने से बिहार के मीडिया को नियंत्रित करने वाला मुख्यमंत्री सचिवालय नाराज हो जायेगा और वहां से बहने वाले विज्ञापनों के श्रोत सूखने लगेंगे. लेकिन ऐसी सोच इनकी हो गयी है तो लोकतंत्र का स्तम्भ कहलाने का क्या हक है इन्हें?

अगर हम नीतीश सरकार के पिछले छह साल के कार्यकाल पर नज़र डालें तो यह निष्कर्ष निकलता है कि बड़े अखबारों के निष्पक्ष नहीं रहने का यह कोई पहला मामला नहीं है और अंतिम तो बिल्कुल नहीं. फारबिसगंज गोलीबारी की घटना का इन अखबारों ने जिस तरह से कवरेज किया वो इसका एक नया उदाहरण मात्र है. जंगलराज की समाप्ति के बाद आज भी बिहार में पुलिस अत्याचार, भ्रष्टाचार, हत्या, अपहरण, फिरौती, बलात्कार जैसी घटनाएं बड़े पैमाने पर घट रही हैं. पर राजद सरकार में ऐसी ख़बरें प्रमुखता से पहले पन्ने पर आती थी जिसे अब धकेल कर अंदर के पन्नों में भेज दिया गया है या फिर ये खबर बनती ही नहीं है. क्यूंकि इससे इनके सुशासनी दावों कि पोल खुल जाएगी और अगर अखबार सरकार की पोल खोलना शुरू कर देंगे तो मुख्मंत्री सरकारी विज्ञापन देना बंद कर देंगे. अब सीधा दोष हम सरकार का भी नहीं दे सकते क्यूंकि व्यासायिक दृष्टिकोण यही कहता है कि अखबार चलाने के लिए पैसा चाहिए, अगर सरकार का तलवा चाटने से ही ये कमी पूरी होती है तो यही सही. जी हाँ, अगर आप अखबार देखें तो पाएंगे कि सरकारी विज्ञापनों से हर पन्ना पटा रहता है और सुशासन बाबू का स्पष्ट निर्देश है कि जो भी अखबार उनके खिलाफ खबर छापे उनका विज्ञापन बंद कर दो. अब आप ही बताएं इस आर्थिक युग में कौन अपना लाखों का नुकसान करवाएगा? आजकल मीडिया मार्केटिंग एक बहुत बड़ा हथियार है जिससे आप अपनी बात मनवा सकते हैं और मैं मानता हूँ कि बिहार में पिछले छह सालों में मीडिया मार्केटिंग के अलावा और कुछ भी नहीं हुआ है. क्यंकि आप ही देखिये कि छह साल पहले शपथ के ठीक बाद मीडिया के सामने बिहार से पलायन रोकने कि उद्घोषणा करने वाले सुशासन बाबु बिहार में कोई नया उद्योग स्थापित करना तो तो दूर पुराने उद्योग ही शुरू नहीं कर पाए, लेकिन मीडिया मार्केटिंग इनकी इतनी ज़बरदस्त थी, कि बिकास के नाम पर वापस सरकार में आ गए.

अब सरकार के लिए मीडिया मैनेज इसलिए भी आसान है क्यूंकि बिहार कि 89%
अखबार पढने वाले ज्यादातर लोग दो ही अखबार पढ़ते हैं, दैनिक हिंदुस्तान और दैनिक जागरण. ऐसे में सरकार के लिए दो अखबार मैनेज करना कोई बड़ी बात नहीं है. वैसे भी सुशासन बाबू के लिए एक सुविधाजनक बात ये भी है कि सत्तारूढ़ जनता दल (यू) के एक सांसद एन. के. सिंह एचटी मीडिया के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर में भी शामिल हैं. इन सब परिस्थितियों के कारण अखबार नीतीश सरकार को खुश करने के लिए ज्यादा ही तत्पर रहते हैं. कभी-कभी तो मुझे लगता है कि यहाँ सरकार का जनसंपर्क विभाग बंद हो गया है और ये काम सुशासन बाबू ने यहाँ के अखबारों को दे दिया है, जो दिन भर सरकार के बखान में लगे रहते हैं. सरकार अपनी छवि चमकाने के लिए जनता का पैसा विज्ञापन के रूप में बड़े अखबारों पर लुटा रही है और अपनी सत्ता वापसी के रास्ते बना रही है. पहले जनाधार वाली पार्टियाँ मीडिया को आधारविहीन मानती थी और कर्म पर विश्वास करती थी पर समय बदल गया है. पार्टियां मीडिया के द्वारा छवि निर्माण करने में लगीं हैं. राजनीतिक पार्टियां मुख्यधारा के मीडिया का इस्तेमाल कर उन वोटरों को प्रभावित करने में लगीं हैं, जो पाठक-दर्शक भी हैं और इसका सदुपयोग या यों कहें कि सबसे बड़ा उदहारण बिहार है. साफ़ शब्दों में अगर कहें तो लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ अब पुर्णतः बिक चूका है और राजनीति में इस खरीद-बिक्री का श्रेय पूरी तरह से श्रधेय श्री नीतीश कुमार जी को जाता है, जिन्होंने बहुत गलत परंपरा कि शुरुआत कर दी है. ऐसे में लोकतंत्र पर सबसे बड़ा खतरा ये है कि अब हर कोई मीडिया को सेंसर कर जनमत को प्रभावित करने कि कोशिश करेगा जैसा कि नीतीश कुमार कर रहे हैं. इसलिए अब समय आ गया है कि जनता जागे और असलियत को समझे. लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहलाने वाला अपने ऊपर से बिकाऊ का लेबल हटा कर एक स्वच्छ छवि का निर्माण करें जिससे देश और समाज दोनों का भला हो.

सोमवार, 31 जनवरी 2011

तिरंगे की राजनीति...

तिरंगा शब्द हमारे ज़ेहन में आते ही एक अजीब सी स्फूर्ति बदन में आ जाती है. हमारा सर गर्व से ऊँचा हो जाता है साथ ही हमें फख्र होता है कि हम विश्व के सबसे बड़े प्रजातंत्र के नागरिक हैं. हमसब के लिए हिन्दुस्तानी होना ही बहुत बड़ी बात है. साथ ही हमारा राष्ट्रीय ध्वज जिसके लिए जाने कितने लोग आज़ादी के दौरान वन्दे मातरम् बोलते हुए शहीद हो गए. हर 26 जनवरी और 15 अगस्त को अपने तिरंगे का ध्वजारोहण करके अपने शहीदों का सम्मान और अपनी आज़ादी का जश्न मनाते हैं. इस दिन हिन्दुस्तान के हर हिस्से में हर घर, हर शहर, हर चौक एवं चौराहे पर हम सब तिरंगा फहराते हैं और इसका अधिकार हर हिन्दुस्तानी को है. परन्तु हम 26 जनवरी को अपने ही देश के एक राज्य जम्मू कश्मीर के लाल चौक पर तिरंगा नहीं फहरा सकते. जी हाँ ये बिलकुल सही है, पर ऐसा क्यूँ है?

कुछ दिनों पहले भाजयुमो के राष्ट्रीय अध्यक्ष अनुराग ठाकुर भारत भ्रमण करते हुए जम्मू कश्मीर पहुँच कर वहां लाल चौक पर झंडा फहराने का कार्यक्रम बनाया था. पर उन्हें और साथ ही सभी बड़े नेताओं को जम्मू कश्मीर कि सीमा पर ही गिरफ्तार कर लिया गया. यहाँ सवाल भाजपाई होने का नहीं है यहाँ सवाल है, कि हम लाल चौक पर झंडा क्यूँ नहीं फहरा सकते? प्रधानमंत्री का कहना है, कि जम्मू कश्मीर एक संवेदनशील राज्य है, पर ये संवेदनशीलता तब कहाँ चली जाती है जब इसी जम्मू कश्मीर के लाल चौक पर जहाँ कभी हरे रंग का इस्लामिक झंडा, तो कभी पाकिस्तानी झंडा फहराया जाता है. लेकिन हमारा राष्ट्रीय ध्वज फहराने में हिन्दुस्तान की सरकार को ऐतराज़ है. आप अपने ही देश किसी हिस्से में इसे प्रतिबंधित कैसे कर सकते हैं. यहाँ पिछले कई सालों तक 14 अगस्त को पाकिस्तानी झंडा फहराया जाता था और हमारी सरकार ख़ामोशी से अलगाववादियों के हौसले बुलंद किये. इन्ही कारणों से करीब यहाँ से 200 मीटर दूर CRPF के बंकर में तिरंगा नहीं लहराया जा सका. ये तो कुछ भी नहीं, श्रीनगर के कुछ इलाकों में अलगावादियों के हौसले इतने बुलंद है की वहां इन्होने बोर्ड तक लगाया हुआ है “Welcome to Chhota Pakistan” का. पर सरकार को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है. पर उन्हें तब फर्क ज़रूर पड़ता है जब आप अपने ही देश के इस हिस्से में तिरंगा फहराते हैं.

वैसे आज ये बहुत बड़ा मुद्दा है कि हम लाल चौक पर झंडा नहीं फहरा सकते. पर भाजपा वालों की एक और मांग है, कि धारा 370 समाप्त करो वरना आन्दोलन होगा. अब यहाँ असल में सोचने की बात बात ये है कि भाजपा का सच में कश्मीर से कन्याकुमारी तक अखंड भारत का सपना है और सब जगह एक सामान क़ानून हो या फिर ये सिर्फ राजनीतिक एजेंडा बना कर ढोंग कर रहे हैं. क्यूँ जब इनकी सरकार लगातार 5 साल तक थी तब तो इन्होने 370 खत्म करने की कोई कवायद नहीं की? अगर सच में ये इमानदारी से इस मुद्दे के खिलाफ थे तो अपनी ये मांग अपनी ही सरकार में बखूबी पूरा कर सकते थे.पर नहीं जी, इन्हें तो राजनीतिक डपोरशंखी चाहिए जिससे मुद्दा बना कर ये चुनाव लड़ सकें. लाल चौक पर झंडा नहीं फहराने से हर हिन्दुस्तानी आहत ज़रूर है पर भाजपा की इस गन्दी राजनीति से ज्यादा आहत है.

पहले यहाँ सवाल ये उठता है कि क्यूँ इस सरकार को हरबार ये बोलने की ज़रूरत पड़ती है "कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है?" इसका उत्तर साफ़ है कि इनके ही सहयोगी नेशनल कांफ्रेंस जिसकी सरकार के मुख्यमंत्री जम्मू कश्मीर के हैं, उनका एक बयान आया था कि “जम्मू कश्मीर का विलय ही अपूर्ण है” अब जिस सरकार का सहयोगी ऐसे बयान देंगे तो क्या होगा. यहाँ एक बात और गौर करने वाली है, कि अगर आप रेडियो सुनते हैं तो कभी आल इंडिया रेडियो का प्रसारण हिंदुस्तान के किसी हिस्से का सुन लें और साथ ही जम्मू कश्मीर का सुन लें आपको फर्क पता चल जायेगा. पटना प्रसारण से वक्ता कहता है कि “ये आल इंडिया का पटना केंद्र है, लखनऊ के कहते हैं “ये आल इंडिया का लखनऊ केंद्र है. ऐसा हिन्दुस्तान के हर हिस्से में कहा जाता है पर जम्मू कश्मीर की बात अलग है वहां के वक्ता कहते हैं कि “ये रेडियो जम्मू कश्मीर है” इन्हें इंडिया नाम लेना भी गंवारा नहीं है. यहाँ तक की रेवेन्यु स्टाम्प पूरे भारत का एक है पर जम्मू कश्मीर में वहां का अपना रेवेन्यु स्टाम्प चलता है. फिर भी सरकार बार बार चिल्ला चिल्ला के कैसे बोल रही है कि “कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है” सिर्फ ये कहने से कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है से हमारी एकता और अखंडता बनी नहीं रह सकती? अगर अपने ही देश के किसी हिस्से में तिरंगा फहराने से शांति भंग होने का खतरा होने का संकेत अगर ये सरकार दे रही है तो धिक्कार है ऐसी सरकार पर. कश्मीर जैसे मुद्दे पर तो सरकार की हालत बिलकुल शुतुरमुर्ग वाली है कि जो तूफ़ान आते ही अपना सर रेत में छुपा लेता है ये सोच कर कि शायद आने वाला तूफ़ान यू ही टल जायेगा. सरकार को कश्मीर पर अपनी नीति पुर्णतः स्पष्ट करनी पड़ेगी वरना ये एक छोटा सा घाव एक दिन कैंसर का रूप ले लेगा.

बुधवार, 12 जनवरी 2011

बेटी का जनाज़ा...

आज मध्य प्रदेश के अनुप पुर जिले में एक ऐसी घटना हुई, जिसने इंसानियत को झकझोर के रख दिया. अनूप पुर जिले के किसी गाँव में एक लड़की की उलटी और दस्त के कारण मृत्यु हो गयी. यह खबर वहां के पुलिस थाने तक पहुंची और थाने से फरमान आया कि लाश कि जांच थाने आ कर करवाओ. बेचारा लड़की का पिता गरीब था इसलिए बेटी की लाश ले जाने का कोई और साधन नहीं होने के कारण उसने अपनी सायकिल निकाली और कपडे के साथ कम्बल में लपेट कर लाश सायकिल के पीछे कैरिएर पर लाद कर ले गए. देख कर ऐसा लग रहा था जैसे कोई सामान की गठरी ले कर जा रहा हो. थाने में प्राथमिक जांच के बाद लड़की के पिता से कहा गया की जिला अस्पताल जा कर लाश का पंचनामा करवा लो. पुलिस थाने से सिर्फ आदेश जारी हुआ इसके अलावा कोई सुविधा उन्हें मुहैया नहीं करवाई गयी. बेचारा लड़की का पिता अपनी बेटी की लाश वापस अपनी सायकिल के कैरियर पर लाद कर उसका पंचनामा करवाने जिला अस्पताल की तरफ निकल पड़ा. जिला अस्पताल वहां से करीब 25 किलोमीटर दूर था. करीब चार घंटे के सफ़र के बाद एक पिता अपनी बेटी की लाश का पंचनामा करवाने जिला अस्पताल पहुंचा. क्यूंकि सरकारी कारवाई के बाद एक पिता को बेटी की लाश वापस चाहिए उसका अन्तिम संस्कार करने के लिए. इसलिए वो अपनी बेटी के जनाज़े के साथ हो रही हर ज़िल्लत को बर्दाश्त करता रहा. वैसे ज़िल्लत बर्दाश्त करने के अलावा वो कुछ कर भी नहीं सकता था, क्यूंकि वो ग़रीब था.

अब यहाँ सवाल ये उठता है कि, क्या ग़रीब होना गुनाह है या फिर सविंधान इन्हें जीने का कोई हक नहीं देता है. मध्य प्रदेश सरकार के मुखिया शिवराज सिंह चौहान खुद को ग़रीबों का सबसे बड़ा हितैषी बताते हैं. उनके अनुसार उनके यहाँ अधिकतम योजनायें ग़रीबों के हित के लिए ही है और सबसे बड़ी बात ये है कि कुछ दिनों पहले से मध्य प्रदेश सरकार वहां के पुलिसवालों को ट्रेनिंग दे रही है और एक बृहत् कार्यक्रम पुलिस वालों के लिए चला रही है जिसका मकसद है कि "मध्य प्रदेश पुलिस, जनता के समक्ष कैसे सभ्य और विनम्र रहे." अगर वहां के पुलिस की ये विनम्रता है तो ये क्रूर हो जाए तो आप ही अंदाजा लगायें कि आलम क्या होगा? मुझे कायदा कानून की ज्यादा जानकारी नहीं है पर कोई मुझे ये बताये कि अगर कही कोई हादसा हो जाये तो सरकारी संस्थाएं अगली कारवाई के लिए सुविधाएँ प्रदान करती हैं या नहीं या फिर इन्ही पुलिस वालों की तरह अपनी हैवानियत वाली शक्ल दिखाती रहती हैं? शायद यहाँ मेरा कहना ये गलत नहीं होगा कि हमारा सविंधान ये सुविधाएँ हैसियत देख कर देती है, अगर ये किसी मंत्री, विधायक या सांसद के साथ हुआ होता तो हमारा सरकारी तंत्र क्या ऐसे ही काम कर रहा होता?

इतने बड़े हादसे के बाद वहां मुख्यमंत्री जी प्रेस के सामने आये और आते ही उन्होंने इस पूरी घटना कि निंदा की और न्यायिक जांच का आदेश देते हुए वहां के ए. एस. आइ. को बर्खास्त कर दिया. मेरे विचार में ये खानापूर्ति कि अलावा कुछ भी नहीं था. आज हमारे देश के किसी भी हिस्से में कुछ होता है तो सरकार का मुखिया एक जांच समिति बना कर मामले को रफा दफा कर देता है. ये शायद इन ग़रीबों का दुर्भाग्य है कि इन्हें ऐसे ही प्रशासक मिलते हैं. मुझे ये पता नहीं आज जो कुछ भी हुआ उसे कैसे रोका जा सकता था पर साफ़ शब्दों में मैं कहना चाहता हूँ की जो भी हुआ वो इंसानियत को शर्मसार करने के लिए काफी था. यह दृश्य टी.वी. पर देखने के बाद से मेरी अंतरात्मा मुझे झकझोर रही है और बार बार यही आवाज़ आ रही है कि "हाय रे गरीबों कि सरकार"

पुलिस और सरकारी तंत्र से तो ऐसी ही आशा थी पर वहां आस-पास के लोग जो मूकदर्शक बने हुए थे उन्हें क्या कहना चाहिए? हम क्यूँ हर बात पर सरकार को दोष देते हैं? अगर हम बदलेंगे तभी सरकार की सोच बदलेगी. आज जब मैंने टी.वी. पर उस व्यक्ति को अपनी बेटी की लाश ले कर इधर उधर भटकते हुए देखा तो मुझे लगा की वहां आस-पास मौजूद लोगों की आत्मा बिलकुल मर चुकी है. ये दुनिया जानती है कि हमारे राजनेता और मंत्रियों के पास तो आत्मा नाम कि कोई चीज़ ही नहीं होती. लेकिन हम क्यूँ उनके नक़्शे कदम पर चल रहे हैं. ज़रा सोचिये वो बाप जिसने अपनी बेटी की डोली उठाने की सोची होगी, कभी उसने सोचा होगा कि उसकी बेटी कि विदाई खूबसूरत डोली में करेगा. वो आज अपनी बेटी के जनाज़े को ले कर इधर उधर भटक रहा है और ये पुलिस और प्रशासन इनका मज़ाक बना रही है. अब वक़्त आ गया है कि हम सरकार के भरोसे न रह कर खुद आगे आयें और इसके खिलाफ आवाज़ उठायें. ताकि इन ग़रीबों की डोली उठाने में तो हम सहयोग नहीं कर पाए पर इनकी अर्थी इनके घर से इज्ज़त के साथ उठे और इस ग़रीब कि बेटी कि विदाई इतनी ज़िल्लत से न हो...

बुधवार, 5 जनवरी 2011

ये हैं जनप्रतिनिधि

कल एक जबरदस्त न्यूज़ जंगल में आग की तरह फैली कि, बिहार में पूर्णिया के विधायक राजकिशोर केसरी की एक महिला ने निर्मम हत्या कर दी. वैसे तो हत्या का मूल कारण जांच के बाद ही पता चलेगा लेकिन पहली नज़र में अगर देखें तो कुछ अजीब सी ही बातें सामने आती हैं, जो हमें बिलकुल स्तब्ध कर देती है. आरोपी महिला रूपम पाठक ने विधायक और उनके सहयोगियों पर यौन दुराचार का आरोप लगाया था. उसके बाद 18 अप्रेल 2010 को पुलिस अधीक्षक से मिल कर लिखित शिकायत दर्ज किया. अब यहाँ ऐसा प्रतीत हो रहा है कि समय पर कारवाई नहीं होने के कारण ही महिला ने ये दुस्साहस करने कि ठानी. अब यहाँ राजनीति शुरू हो चुकी है और आरोप प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है. लेकिन यहाँ अगर आम जनता का मत agar हम जानें तो पाते हैं कि रूपम पाठक के द्वारा न्याय के लिए अपनाये गए तरीके को गलत मानते हैं पर विधायक जी को भी साफतौर से बरी नहीं कर रहे हैं.

यहाँ सचमुच ये अब चिंतन का विषय हो गया है कि, कहलाते तो ये जनप्रतिनिधि हैं. लेकिन जनता के सामने कभी इनकी छवि साफ़ सुथरी नहीं होती. ऐसा नहीं है कि सभी जनप्रतिनिधि ऐसे ही हैं. परन्तु हमारे दिमाग में ऐसी ही छवि बनी हुई है. ये सिर्फ एक जगह कि हालत नहीं है. कुछ दिन पहले ही उत्तर प्रदेश के एक बसपा विधायक पर भी बलात्कार का इलज़ाम लगा है और वो बचाव में बयान देते फिर रहे हैं. मैं उस महिला के कदम को बिलकुल सही नहीं मानता हूँ. पर ज़रा सोचिये कि कोई भी महिला इस तरह के अंजाम तक किस हालात में पहुँच सकती है. यहाँ मतलब साफ़ है कि, क़त्ल एक अन्तिम हथियार ही बचता है. जब क़ानून से आपका विश्वास उठ जाये तो शायद इसके अलावा कोई उपाय नहीं बचता है. वैसे इस तरह के हत्याकांड को समाज सिरे से नकारते हैं लेकिन कोई व्यक्ति करे तो आखिर क्या, जब हमारा सविंधान ही हमारी रक्षा न कर पाए तो?

इस हत्याकांड के बाद जब मैंने अपने उपमुख्यमंत्री श्री सुशील कुमार मोदी जी का बयान सुना तो मैं बिलकुल ही हतप्रभ रह गया. बिना किसी जांच के और बिना किसी परिस्थिति को जाने कोई ऐसा गैर जिम्मेदारी वाला बयान कैसे दे सकता है? सुशील कुमार मोदी ने राजकिशोर केसरी को क्लीन चिट देते हुए सारे आरोप उक्त महिला रूपम पाठक के सर मढ़ दिया. उन्होंने महिला पर आरोप लगाया कि "रूपम पाठक विधायक को ब्लैक मेल कर रही थी" परन्तु कोई ज़रा हमें ये बताये कि कोई भी इंसान किसी को ब्लैक मेल किस आधार पर कर सकता है. बचपन में सुनी हुई एक कहावत है कि "धुंआ वही उठता है जहाँ आग आग लगी रहती है" तात्पर्य ये है कि अगर वो विधायक को ब्लैक मेल कर रही थी तो ये बात यहाँ साफ़ है कि विधायक जी के खिलाफ कोई सबूत उनके पास था जिसके कारण सुशील कुमार मोदी ये कह रहे हैं कि महिला विधायक को ब्लैक मेल कर रही थी. मेरा राजनेताओं से अनुरोध है कि पहले वस्तुस्थिति को समझने की कोशिश करें फिर कोई बयान दें.

मैं मानता हूँ कि विधायक कि हत्या निहायत ही गलत कदम है. उस महिला का आरोप अगर सच भी है फिर भी ये तरीका बिलकुल गैरकानूनी और गलत है. पर हमें फिक्र इस बात कि होनी चाहिए कि उस महिला ने अब तक कोई सबूत नहीं दिए हैं फिर भी आम जनता विधायक के करतूत को सही मान रही है. हर कोई यही कह रहा है कि महिला झूठ नहीं बोल रही है. पर ज़रा हम विधायक के सहयोगियों को देखें तो उन्हें उस महिला पर आरोप लगाने का उन्हें कोई अधिकार नहीं है. क्यूंकि इस हत्या के बाद उनके सहयोगियों ने मार-मार कर उसे अधमरा कर दिया. क्या ये न्याय संगत था?

ऐसा लगता है कि हर पार्टी और हर प्रदेश में ऐसे लोग मौजूद हैं जो कही न कहीं किसी न किसी काण्ड में लिप्त हैं. पर पार्टी इन्हें बाहर निकालने या इनपर कारवाई करने का कोई व्यस्थित उपाय नहीं कर रही है. हर पार्टी को अपने विरोधी पार्टी में अपराधी तत्व नज़र आते हैं और उस वक़्त ये मसला सबसे अहम् हो जाता है पर एक बार अपने गिरेबान में झाँकने की भूल कभी नहीं करते. यहाँ सवाल सिर्फ माननीय जनप्रतिनिधि के अपराधिक या चारित्रिक मामले लिप्त होने का नहीं है, सवाल ये है कि अगर हमारे माननीय जनप्रतिनिधि ऐसे होंगे तो हम आम जनता से कानून पालन करने कि क्या उम्मीद कर सकते हैं...

शुक्रवार, 17 दिसंबर 2010

बदलता बिहार...

गत चुनाव के परिणाम ने साबित कर दिया है कि बिहार अब बदल रहा है. जो बिहार आजतक जात-पात के बूते पर चुनाव लड़ता था, पार्टियाँ अपना उम्मीदवार जातीय समीकरण के आधार पर तय करते थे, लेकिन परिणाम ने साफ़-साफ़ ये बता दिया कि अब बिहार बदल कर विहार(खूबसूरत जगह) बन रहा है. परन्तु, मैं यहाँ मीडिया वालो को भी ज़रा सा दोष देना चाहूँगा, क्यूंकि यही मीडिया कहती है, कि बिहार में जात-पात कि राजनीति होती है लेकिन जैसे ही राजनितिक पार्टियाँ अपना उम्मीदवार घोषित करती हैं तो अगले दिन समाचार पत्रों में उम्मीदवारों कि जातिवार सूची जारी कर देते हैं. इसमें हम किसे दोष देंगे, इन राजनेताओं को या फिर मीडिया को? इसबार वैसे भी बिहार में जात-पात से ऊपर उठ कर मतदान किया गया है, जिसका गवाह पूरा हिन्दुस्तान है. लेकिन मुझे तब बड़ा आश्चर्य हुआ कि एक तरफ हम खुद को बदलने कि कोशिश कर रहे हैं वही दूसरी तरफ कई समाचार पत्रों ने जीते हुए विधायकों कि जातिवार सूची तक ज़ारी कर दी. खैर, बस अब हमें इस बात की ख़ुशी है कि हम अब बदल रहे हैं. पर इस अप्रत्याशित जीत के बाद नीतिश कुमार कि जिम्मेदारियां भी बहुत बढ़ गयी है. बिकास तो चारो तरफ दिख रहा है पर मेरे विचार में सम्पूर्ण विकसित करने में सबसे बड़ा योगदान बैंकों का होता है. लेकिन सर्वे के अनुसार बिहार में ऋण देने में बैंक सबसे पिछड़ी हुई है.

अगर हम रिपोर्ट देखें तो पाएंगे कि पूरे बिहार के बैंकों में बिहारवासियों ने करीब 101761 करोड़ रुपये जमा करवाया है लेकिन ऋण के नाम पर इन्हें करीब 31921 करोड़ ही मिले हैं. यहाँ मतलब बिलकुल साफ़ है कि, माहौल बदल रहा है, हालात एवं क़ानून व्यवस्था में सुधार हो रहा है पर बैंक के क्रिया-कलाप मे कोई सुधार नही दिख रहा है. हमने अपने प्रदेश के बैंक मे 101761 करोड़ रुपये जमा किया है पर ऋण के रूप मे हमे केवल 31921 करोड़ मिले हैं बांकी के करीब 70000 करोड़ रुपये यू ही या तो बैंक मे पड़े हुए हैं या ये बाहर के प्रदेशों मे जा रहे हैं. बिहार सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती है की यहाँ के बैंक की साख जमा अनुपात अर्थात ऋण देने की दर मे बढ़ोतरी करना. अगर हम बिहार की तुलना अन्य प्रदेशों से करें तो पता चलेगा की ऋण देने मे हम कितने पीछे हैं.

राज्य                            जमा(करोड़)                क़र्ज़(करोड़)      प्रतिशत(क़र्ज़ का)
तमिलनाडु                      251532                     282604        113
आंध्रप्रदेश                      245686                     269760        109
राजस्थान                      123918                      103295            87
कर्नाटक                         283571                     226879           80
महाराष्ट्र                      1693706                    1313775           78
गुजरात                         210738                     143015             68
मध्यप्रदेश                    134274                      81023             60
बिहार                          101762                          31921            31
(सर्वे रिपोर्ट, सौजन्य- दैनिक हिन्दुस्तान)

अगर उपर्युक्त आंकड़ों को देखें तो हमें पता चलता है कि बैंक वालों के रवैये के कारण हम कितने पिछड़े हुए हैं और इस हालात में हमें अपने निकटम प्रदेश के आस-पास भी पहुंचना मुश्किल सा प्रतीत हो जाता है. अगर हम आंकड़ों को देखें तो पता चलेगा कि साख जमा अनुपात के मामले में बिहार देश के सभी छोटे और बड़े राज्यों से पिछड़ा हुआ है. इस मामले में महाराष्ट्र, राजस्थान, कर्नाटक एवं गुजरात जैसे राज्य बिहार से दोगुने या उससे भी ज्यादा आगे हैं. मिजोरम ने 61 प्रतिशत, उड़ीसा ने 52 प्रतिशत, मणिपुर ने 50 प्रतिशत, सिक्किम ने 42 प्रतिशत और असम ने 40 प्रतिशत कि दर के साथ हमें पीछे छोड़ रखा है.

अब मेरा आग्रह बिहार के मुख्यमंत्री जी से है कि कृपया इन बातों पर ज़रा गौर फरमाएं जिससे बिहार में स्वरोजगार की संभावनाएं बढ़ेगी. जिस पलायन को रोकने के लिए सभी सरकारें सिर्फ कहने का प्रयास ही कर रही हैं, शायद वो हम रोक सकेंगे और जो समृद्ध बिहार केवल हमारी कल्पना में ही बसी हुई है उसे यकीन में बदल सकते हैं

शुक्रवार, 8 अक्टूबर 2010

बिहार चुनाव- हाय रे नेता तेरा रंग कैसा

आजकल मैं अपने गृह शहर पटना आया हुआ हूँ. यहाँ आ कर मैंने पाया की यहाँ चुनाव चर्चा अपने चरम पर है और देश की सभी मीडिया चाहे वो प्रिंट हो या इलेक्ट्रोनिक सभी बिलकुल मिनट मिनट की खबर जनता तक पहुंचा रहे हैं. आज सुबह ही मैंने जब समाचार पत्र देखा तो एक जबरदस्त न्यूज़ पर नज़र गयी कि "प्रदेश भाजपा अध्यक्ष पद्मश्री सी. पी. ठाकुर का इस्तीफा" और साथ ही उनका एक बयान था कि "मैं पार्टी के टिकट बटवारे से नाखुश हूँ. यहाँ भाजपा के समर्पित कार्यकर्ताओं कि अवहेलना कि गयी है.मेरा बेटा विवेक ठाकुर भाजपा का समर्पित कार्यकर्ता है."

यह न्यूज़ पढने के ठीक बाद मेरी नज़र नीचे कोने में लिखी एक और न्यूज़ पर गयी जहाँ लिखा था कि " सी. पी. ठाकुर के पुत्र विवेक ठाकुर कांग्रेस से चुनाव लड़ेंगे." यह खबर पढ़ते ही मेरे मन में तभी से एक अंतर्द्वंद चल रहा है कि क्या आज के युग में "समर्पण और अवसरवादिता" एक दुसरे के पर्यायवाची हो गए हैं, क्या रामायण कि यह चौपाई सचमुच चरितार्थ हो गयी है कि. "प्रभुता में कछु दोष न गोसाईं" अर्थात समृद्ध व्यक्ति हमेशा सही होता है? एक तरफ अध्यक्ष महोदय कह रहे हैं कि बेटा पार्टी का समर्पित कार्यकर्ता है और दूसरी तरफ टिकट के लिए कांग्रेस से भी संपर्क साधे हुए हैं. अगर सी. पी. ठाकुर के व्यक्तित्व और उनका इतिहास देखें तो चिकित्सा के क्षेत्र में गोल्ड मेडल और कई ऐसे मेडल, अवार्ड लेने के बाद भारत सरकार से पद्मश्री अवार्ड से भी नवाज़े गए. पर आज का इनका बयान और क्रिया कलाप देख कर लगता है कि राजनीति अच्छे अच्छों का ईमान बदल देती है. शायद आज के युग में महात्मा गाँधी जी भी होते तो पुत्रवाद, परिवारवाद और अवसरवादी चरित्र से खुद को दूर नहीं रख पाते. क्यूंकि आज कि राजनीती है ही ऐसी. अब मुझे लग रहा है कि जे. पी. आन्दोलन के प्रणेता श्री जयप्रकाश नारायण को भगवान् ने पुत्र से वंचित इसलिए रखा था कि कहीं समय इनपर भी पुत्रमोह का दाग न लगा दे.

आज कल हर एक नेता समाज सेवा के थोथे दावे कर के अपने पुत्र और परिवार को आगे बढाते हुए समाजवाद कि बात करते हैं. इसका सबे बड़ा जीता जागता उदहारण हैं हमारे पूर्व केंद्रीय मंत्री श्री रामविलास पासवान. इनकी पार्टी लोजपा (लोकतांत्रिक जनशक्ति पार्टी) के अधिकतम उम्मीदवार इनके परिवार से ही हैं. कोई भाई है तो कोई समधी, कोई भतीजा है तो कोई दामाद. अब रामविलास जी के ननिहाल कि तरफ चलते हैं तो वहां पाएंगे कि इनके मामा श्री रामसेवक हजारी जिन्होंने नीतीश कुमार का दामन जद यु थाम के खुद विधान सभा चुनाव लड़ रहे हैं. साथ ही अपने पुत्र महेश्वर हजारी को सांसद बनाया और दुसरे पुत्र शशिभूषण हजारी के साथ अपनी बहु मंजू हजारी को भी चुनाव लडवा रहे हैं. परिवारवाद का विरोध करने वाले नीतीश कुमार इन्हें अपना मौन समर्थन दिए हुए हैं. लालू प्रसाद के तरफ चलें तो वहां भी वही हाल है. अब तो उन्होंने अपने बेटे को अगला उत्तराधिकारी भी घोषित कर दिया है. कैलाशपति मिश्रा का तो जातिवाद जग जाहिर ही है. क्यूंकि जब 1990 में पार्टी के अंतर्कलह के कारण रातों रात पार्टी अध्यक्ष पद से इन्दर सिंह नामधारी को हटा कर कैलाशपति मिश्रा को अध्यक्ष बनाया गया था तो, कैलाशपति मिश्र ने नामधारी के द्वारा जारी किये गए उम्मीदवारों के लिस्ट को बदल कर नयी लिस्ट ज़ारी कि. जिसमे से इन्होने नविन किशोरे सिन्हा और नन्द किशोर यादव जैसे लगातार जितने वाले प्रत्याशी को हटा कर अपने ख़ास लोगों को टिकट दिया था. वैसे कांग्रेस तो परिवारवाद के परंपरा कि जननी ही मानी जाती है.

ये तो सिर्फ एक बानगी है. अगर मैं पूरा व्योरा देने बैठ जाऊंगा तो शायद पन्नों कि कमी के साथ स्याही भी कम पड़ जायेगा. यहाँ का हर नेता समाजवाद का जीता जागता उदाहरण बन रहा है. आज के सन्दर्भ में मेरी परिभाषा इस समाजवाद के लिए कुछ और ही है. असल में ये है समाज-बाद, अर्थात हम पहले समाज बाद में. अब यहाँ सवाल यह आता है कि मतदाता क्या करे? ये शायद बहुत ही महत्वपूर्ण सवाल है. क्यूंकि हम आम मतदाता के लिए यह असमंजस का विषय है कि हम बाहुबलियों से किनारा करें या इस परिवारवाद से. मेरी समझ से अब वक़्त आ गया है कि एक वोट में कितनी शक्ति है ये जानने का और इन नेताओं को बाहुबलियों और परिवारवाद की राजनीती का सबक सिखाने का. जिससे हम इन राजनेताओं का मोहरा न बने और सुसंस्कृत देश और प्रदेश का निर्माण कर सकें.

मंगलवार, 31 अगस्त 2010

नक्सली कौन...?

आज सुबह मैं बड़ी मीठी नींद में सोया हुआ था कि मेरे फ़ोन के घंटी बज उठी. मुझे बड़ा गुस्सा आया क्यूंकि बीती रात मैं देर से सोया था. बड़े अनमने ढंग से मैंने फ़ोन उठाया तो पता चला की फ़ोन मेरे पिता जी का था. आधी नींद में ही मैं उनसे बात कर रहा था. पर पिता जी ने एक ऐसा समाचार सुनाया कि मेरे बिलकुल ही होश उड़ गए और मेरी नींद कहाँ चली गयी मुझे पता ही नहीं चला. अब मैं उस समय से उठ कर आत्मंथन में लगा हुआ हूँ कि ये क्या हो रहा है. जो भी समाचार मुझे मेरे पिता जी ने सुबह सुबह दिया उसके बारे में सोच कर समझ नहीं आ रहा है कि ये दोष किसे दूं मैं.

असल में हमारे एक पारिवारिक मित्र हैं जो मेरे पिता जी के साथ स्कूल में पढ़ते थे. इनके परिवार के साथ हमारा बड़ा ही घनिष्ठ सम्बन्ध है. आपको जैसा कि ज्ञात होगा कि गत दिनों बिहार के लखीसराय जिले में नक्सलियों की पुलिस के साथ जबरदस्त मुठभेड़ हुई थी, जिसमे सात पुलिसकर्मी शहीद हो गए थे और कई पुलिसकर्मियों को उन्होंने बंधक बना लिया है. उन अपहृत लोगों में मेरे पिता जी के दोस्त के दामाद भी हैं, जो लखीसराय के किसी थाने में कार्यरत थे.

जब से ये खबर मेरे कानो में आई है मैं यही सोच रहा हूँ कि ये क्या हो रहा है. इस घटना के करीब 2 दिन हो चुके हैं लेकिन इनलोगों का कोई पता भी नहीं है कि ये लोग कहाँ हैं. नक्सलियों ने इनके साथ किया क्या है. ये जिंदा भी हैं ये मर गए. बस इन 2 दिनों में सरकार से इनके परिजनों को एक ही चीज़ मिल रही है और वो है 'भरोसा', इसके अलावा सरकार इन मामूली अधिकारियों या आम आदमी के लिए कुछ नहीं कर सकती. क्यूंकि ये किसी गृहमंत्री जी के पुत्री नहीं है, ये एक मामूली से आम आदमी है. अगर कल इनके मरने कि भी खबर आ जाये तो सरकारी खजाने से 10 लाख की रकम दे कर सरकार सोचेगी कि हमारा काम हो गया. क्या यही इन्साफ है?

ये नक्सली दिन दहाड़े हमारी हत्याएं करते रहे पर हमारे केंद्रीय मंत्री समझते हैं कि वो भी इंसान हैं इसलिए इनसे बात-चीत करके मामला सुलझाएं. ये राजनेता ज़रा सोचें कि, जितने भी अधिकारी अपहृत हैं, उनके घरों का क्या माहौल होगा अभी? लेकिन ये क्यूँ सोचें, इन्हें क्या फर्क पड़ता है? इनकी राजनीति तो चमकनी चाहिए बस. जहाँ तक मुझे पता है कि जिस क्षेत्र में ये घटना हुई है उसके बारे में ख़ुफ़िया विभाग पहले ही रिपोर्ट दे चूका था कि यहाँ नक्सली कैंप चल रहा है और आशंका जताते हुए राज्य मुख्यालय को भी सतर्क किया गया था. पर शिथिल प्रशासन पर भारी पड़े नक्सलियों ने खून की होली खेलकर प्रशासन को उसकी औकाद बता दी. महत्वपूर्ण बात यह है कि हाल के दिनों में सरकार ने लखीसराय जिले को नक्सल प्रभावित घोषित किया है लेकिन इस जिले में नक्सलियों से लड़ने के लिए न तो संसाधन उपलब्ध है न पुलिस बल. जहाँ नक्सली इस मुठभेड़ के दौरान 100 से अधिक संख्यां में थे और साथ ही नक्सली एल.एम.जी. और ए.के.47 जैसे हथियारों से हमले कर रहे थे पर हमारे पुलिसबल के पास कौन से हथियार होते हैं? मेरा तो सरकार से बड़ा ही सीधा सवाल है कि जब ख़ुफ़िया विभाग कि रिपोर्ट इन जगहों के बारे में आ चुकी थी तो पूर्ण सुविधाएँ हमारे जवानों को क्यूँ नहीं मिली थी, क्यूँ उन्हें भगवान के भरोसे छोड़ दिया गया था?

कुछ दिनों पहले हमारी केंद्रीय मंत्री ममता बनर्जी ने नक्सल के समर्थन में बयान देते हुए कहा है कि उनके साथ अन्याय हो रहा है. साथ ही इनके समर्थन में हमारे एक और केंद्रीय मंत्री प्रणव मुखर्जी का भी बयान आया है. क्या ये कुछ दिनों पहले CRPF पर हुआ नक्सली हमला भूल गए. जिसमे हमारे अनगिनत जवान मौत के घात उतार दिए गए. ज़रा हमारे मंत्रीगण बयान देने के पहले सोचें कि उस हमले में शहीद हुए जवानों के परिवार पर क्या बिता होगा यह सब सुनकर. वो यही सोच रहे होंगे कि "जिसने इनके घर का चिराग बुझा दिया ये सरकार उसी को बचाने में लगी है" और इधर इन पुलिस पदाधिकारियों के अपहरण हुए करीब दो दिन से भी ज्यादा हो चुके हैं, पर अभी तक हमारे माननीय मुख्यमंत्री जी का कोई बयान नहीं आया है. जबकि ये जांबाज़ पुलिस पदाधिकारी अपनी जान पर खेल कर इन नक्सलियों से लोहा लेने गए थे, ताकि क्षेत्र में शान्ति व्यवस्था कायम रह सके. इनके परिवार में कोहराम मचा हुआ है. इनलोगों के आंसू आँखों से सूख ही नहीं रहे हैं. पर सरकार क्या कर रही है कुछ पता नहीं चल रहा है. अब मुझे ऐसा लग रहा है कि सरकार ही अब नक्सालियों जैसी हरकत करने लगा है. अब तो सवाल ये आ गया है कि असल में नक्सली है कौन, ये जंगल में छिपे लोग या फिर सरेआम खादी पहन कर घुमने वाले ये नेता जो नक्सलियों का समर्थन करते हैं? अब सच बताऊँ तो मेरा विश्वास उठ चूका है इन मंत्रियों और सरकार से. आजतक नक्सलियों के समर्थन में बोलने वाले इन मंत्रियों का इस मामले में कोई बयान क्यूँ नहीं आ रहा है? इधर बिहार के मुख्यमंत्री जी भी चुप्पी साधे बैठे हुए हैं. इसलिए मैं इनलोगों कि कुशलता कि कामना ईश्वर से करता हूँ और इनके सकुशल वापसी कि दुआएं मांगता हूँ.

शनिवार, 10 अप्रैल 2010

महिला अपराधों की राजधानी "दिल्ली"

आज पता नहीं क्यूँ मुझे अपने देश की राजधानी का ख्याल मेरे मन में आया. असल में समाचार पत्रों में कुछ दिनों से महिलाओं पर हो रहे अत्याचार से सम्बंधित ख़बरें आ रही थीं. मैं आपको ज़रा याद दिलाना चाहता हूँ ये दिल्ली, उसी देश की राजधानी है जिसे हम माता कह के खुद को गौरवान्वित महसूस करते हैं. बड़े शान से हम कहते हैं की "भारत हमारी माता है". आज हमारे देश के लिए एक और गौरव की बात ये है की हमारी भारत माता की 'राष्ट्रपति' वो भी महिला हैं. साथ ही हमारे देश के सरकार की बागडोर भी एक सशक्त महिला ने ही थाम रखी है और इस देश की राजधानी है, हमारी प्यारी दिल्ली. अब एक और संयोग देखिये कि दिल्ली प्रदेश कि जो मुखिया हैं वो भी 'महिला' ही हैं और तो और दिल्ली शहर की मेयर भी एक महिला ही हैं. क्या अजब संयोग है. मेरे विचार में शायद संसार का कोई भी देश ऐसा नहीं होगा जहाँ महिलाओं का इतना सम्मान होता हो और जहाँ लगातार उच्च पदस्थ सिर्फ महिलाएं ही हों. लेकिन इन सबों का वास दिल्ली में होते हुए भी, दिल्ली में महिलाओं की स्थिति क्या है?

आंकडें कहते हैं कि इस देश का महिलाओं के लिए दिल्ली सबसे असुरक्षित शहर है. हाल ही में नेशनल क्राइम ब्यूरो का सर्वे कहता है कि महिलाओं पर होने वाले अत्याचार में दिल्ली का पहला स्थान है. मुझे तो सोच कर लगता है कि 'वाह रे देश कि विडम्बना' महिलाओं के देश में, महिलाओं के राज्य में और महिलाओं के शहर में 'बेचारी महिला' ही असुरक्षित हैं. शायद ये राजनीति के गिरते स्तर की पहचान है. अगर हम सामान्य अपराध में सर्वे रिपोर्ट देखेंगे तो दिल्ली इसमें पहले पांच शहरों में शान से खड़ा है पर महिला अत्याचार में सबसे अव्वल है.

अब ज़रा हम अगर आंकड़ों पर गौर करें तो हमें पता चलेगा की असल में हमारी दिल्ली क्या है. कुछ दिनों पहले किये गए 35 बड़े शहरों में महिला अपराध के मामले में दिल्ली सबसे आगे है. अगर 35 शहरों को मिला कर महिला अत्याचार 14.2% है प्रतिलाख कि आबादी में तो, दिल्ली में ये प्रतिशत 27.6% प्रतिलाख में है. इसका मतलब साफ़ है की बांकी 35 शहरों के संयुक्त प्रतिशत का दोगुना. ये सर्वे उन 35 बड़े शहरों में किया गया है जिनकी आबादी 10 लाख से ज्यादा है. अगर बलात्कार के केसों को देखें तो आपको पता चलेगा कि, अकेले दिल्ली में 562 केस हैं जबकि 1693 सभी शहरों को मिला कर. मतलब करीब एक तिहाई केस दिल्ली में ही हुए हैं. महिलाओं के अपहरण के 2409 केसों में 900 केस दिल्ली में हुए हैं, जो की सम्पूर्ण आंकड़ों का 37.4% अकेला दिल्ली में है. दहेज़ हत्या का मामला अगर देखें तो 19% दिल्ली में हुए है बांकी 35 शहरों के मुकाबले. उपर्युक्त सभी आंकड़े भारत के सिर्फ 35 बड़े शहरों में संयुक्त रूप से किया गया है जिनकी आबादी 10 लाख से ऊपर थी.

अगर मैं इस तरह से आंकडें और केसों को विस्तार से आपको बताना शुरू कर दूंगा तो शायद मैं लिखता रहूँगा पर मेरे शब्द ख़त्म नहीं होंगे. इसलिए आंकड़ों को यही विराम देते हुए बस मैं ये कहना चाहता हूँ कि, कब ये स्वार्थी राजनेता अब तो राजनेत्री भी कहना अनुचित नहीं होगा. क्यूंकि उच्च पद पर विराजमान तो है ही और राजनीति में भी बड़ी संख्या में आ रही हैं. पर ये लोग कब स्वार्थ से ऊपर उठ कर काम करना शुरू करेंगे. मैं इन सभी महिला प्रशासकों से पूछना चाहता हूँ कि क्यूँ आप सबों के उच्च पद पर विराजमान रहने पर भी आज कोई भी महिलाएं बाहर निकलने से डरती है, क्यूँ दिन ब दिन इनके ऊपर अत्याचार बढ़ते ही जा रहे हैं, सरकार क्यूँ नहीं इन बातों के ऊपर ठोस कदम उठाती है? सवाल बहुत हैं पर जवाब इनके पास नहीं है. क्यूंकि ये भी सिर्फ राजनीति ही जानते हैं.

अभी संसद में हाल ही में बवाल हुआ था, महिला आरक्षण पर. मैं यहाँ यही पूछना चाहता हूँ किन आरक्षण कि बात कर रही हैं ये महिला राजनेत्रियाँ या फिर ये सरकार? मेरे हिसाब से महिलाओं के खिलाफ हो रहे अत्याचार में तो आरक्षण दिलवा दिया इन महिला प्रशासकों ने और इनके कुशासन ने दिल्ली को बनवा दिया देश का सबसे असुरक्षित शहर महिलाओं के लिए. सबसे पहले तो महिलाओं का हितेषी बनने का ढोंग छोड़ दें जो 'महिला आरक्षण' दिखा कर, कर रहे हैं. अगर इन उच्च पदस्थ महिलाओं को ज़रा भी महिलाओं के प्रति दर्द इनके दिल में है तो दिल्ली को ही नहीं पूरे भारतवर्ष को महिलाओं पर हो रहे अत्याचार से मुक्त करें.

मेरा निवेदन है इन सबों से एक बार फिर कि, गन्दी राजनीति से ऊपर उठ कर इन आम जनता के बारे में सोच लें. अगर सच में आपको महिलाओं को आगे लाना है, उन्हें मुख्य धारा में सरीक करना है और इन्हें सशक्त बनाना है तो इन्हें पूर्ण सुरक्षा का अहसास दिलाएं. फिर मेरे विचार में इन्हें किसी आरक्षण कि ज़रूरत नहीं पड़ेगी. पूर्ण सुरक्षा का अहसास ही इनके लिए सबसे बड़ा आरक्षण होगा और पुनः हम गौरवान्वित होकर कह सकेंगे कि "भारत हमारी माता है"

गुरुवार, 1 अप्रैल 2010

इस्लाम और आतंकवाद

गत दिनों मैंने मास्को ब्लास्ट के बारे में देखा तो मेरे दिमाग में एक ही बात उस समय से आ रही है कि आखिर कब तक इस्लाम के नाम पर ये हत्याएं होती रहेंगी, क्या कोई धर्म ये बताता है कि जो इनके अनुयायी नहीं हैं उनकी हत्या कर दो. मेरा ज्ञान जहाँ तक कहता है कि, कोई भी धर्म ऐसी शिक्षा नहीं देता है और फिर भी इन्हें सही ठहराने वाले आपके आस-पास बहुत मिल जायेंगे. मेरे विचार से शायद जिस विवाद से सम्पूर्ण विश्व बचना चाह रहा है उस पर खुल कर बहस करने का सही वक्त आ गया है. ये मुद्दा अब समूचे संसार के सामने बहस का मुद्दा है "इस्लाम और आतंकवाद"

यह बिलकुल सही है कि "हर मुसलमान आतंकवादी नहीं होता है, पर हर एक पकड़ा जाने वाला आतंकवादी मुसलमान ही क्यूँ होता है" अगर हम कुछ एक उदाहरण को नज़रंदाज़ कर दें तो. दुनिया का हर देश इस्लाम आतंकवाद का दंस झेल रहा है. यह सवाल हर किसी के मन में हर वक्त आता है पर आज तक इसपर खुल के बहस करने से हर कोई कतराता हैं. अब शायद समय आ गया है की इस पर हम खुल के बात करें. क्यूंकि ये बहुत ही पुरानी कहावत है की 'करे कोई और भरे कोई'. इसलिए ये आतंकवादी संगठन इस्लाम के नाम पर दरिंदगी तो कर देते हैं हैं, पर इसका भुगतान हमारे निर्दोष मुसलमान भाइयों को भुगतना पड़ता है. अल-कायदा जिस ट्विन टावर को उड़ा कर 9/11 का जश्न मना रही थी, क्या उसके बाद उन्होंने देखा की वहां पर अमरीकी पुलिस ने कितने निर्दोष मुसलमानों को सलाखों के पीछे कर दिया. हज़ारों-हज़ार की संख्यां में निर्दोषों की गिरफ्तारियां हुई थी. कुछ तो रिहा होने के बाद भी अब तक अपनी सामान्य ज़िन्दगी नहीं जी पा रहे हैं. क्या यही ट्विन टावर उड़ने की उपलब्धी गिनाती है ये अल कायदा. इन्हें इन सब बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता है. आज इन लोगों ने आम मुसलमानों की ये हालत बना दी है की अगर आपका नाम अहमद, आरिफ, खान, अली या ऐसा कुछ भी है तो आपको शक की निगाह से देखा जाता है. अगर आप भारत से बाहर किसी अंग्रेजी देश की यात्रा पर हैं तो हवाई अड्डे पर जाँच दल सामान्य से ज्यादा आपकी तलाशी लेंगे. इसका सबसे बड़ा उदहारण हाल ही में शाहरुख़ खान की शिकागो हवाई अड्डे पर हुई घटना से लगा सकते हैं. जहाँ जाँच दल अधिकारी ने उन्हें घंटों बिठा कर रखा था.

वैसे सच्चाई ये भी है की लादेन जैसे आतंकवादियों को सही मानने वालों की कमी भी इस संसार में नहीं है. शायद आप सब भी मेरे इस बात से सहमत ही होंगे. क्यूंकि अगर इन्हें मानने वालों की कमी होती तो इनकी तायदाद दिन ब दिन बढती नहीं जाती. इनके लिए हर कोई फिदायीन या मानव बम बनने को तैयार नहीं रहता. अभी मास्को ब्लास्ट में भी मानव बम का ही इस्तमाल किया गया था. लेकिन मैं इस्लाम की लड़ाई लड़ने वाले आतंकवादियों से पूछना चाहता हूँ की जहाँ आप ब्लास्ट करते हैं वहां क्या कोई मुसलमान नहीं मारा जाता? शायद आपको अब तक याद होगा कि गत वर्ष पकिस्तान के एक फाईव स्टार होटल में जबरदस्त ब्लास्ट हुआ था, वो भी रमजान के पाक महीने में. सभी इफ्तार की नमाज़ अदा कर रहे थे और एक जबरदस्त धमाका हुआ था. मैं इन लोगों से पूछना चाहता हूँ, की यहाँ ये ये ब्लास्ट क्यूँ हुआ था. यहाँ तो सभी खुदा की इबादत कर रहे थे, जिस खुदा के लिए आप लड़ाई लड़ रहे हैं, ये निर्दोष तो उन्हें ही याद कर रहे थे. फिर क्यूँ यहाँ ब्लास्ट किया आपने? अगर आप मुसलामानों का खुद को बहुत बड़ा हितेषी मानते हैं तो अजमेर शरीफ और जामा मस्जिद में क्यूँ ब्लास्ट किया था? ज़रा इसका जवाब देंगे आप की वहां कौन मारा गया था, वही हमारे निर्दोष मुसल्मान भाई.

मेरे विचार में यहाँ पर आप लोगों के सामने तस्वीर पूरी तरह से साफ़ है की आतंकवादियों का कोई कौम या कोई धर्म नहीं होता. इनका एक अलग ही धर्म है आतंकवाद. दुनिया में आतंकवादी जहाँ भी हैं वो किसी इस्लाम, सिख या हिन्दू धर्म से सम्बन्ध नहीं रखते हैं. उनका अलग ही धर्म है जिसका नाम है 'आतंकवाद" और उनकी पवित्र किताब बम है. वही बम जो किसी की जाती या धर्म देख कर नहीं फटती. यहाँ मैं राजनेताओं को भी कहना चाहूँगा की धर्म की राजनीती में अपना वोट भुनाना थोडा कम करे दें साथ ही शाहरुख़ खान जैसी बड़ी हस्ती से कहना चाहूँगा की आप लोग तो राजनेता से भी अच्छी राजनीति कर लेते हैं. अपनी फिल्म को चलाने का क्या शानदार शगूफा पाकिस्तानी खिलाडियों के रूप में छोड़ा और आपकी फिल्म 'माई नेम इज खान' बन गयी, अब तक सबसे ज्यादा चलने वाली फिल्म. उसके बाद वापस मुंबई आने के बाद तो आप ऐसे शांत हो गए जैसे "गधे के सर से सींग गाएब हो गया हो". वैसे जनता तो बेवकूफ है, इन्हें पता ही नहीं चला की आप तो अपनी फिल्म की मार्केटिंग कर रहे हैं और जनताओं की भावनाओं से खेल रहे हैं. पाकिस्तानी क्रिकेटर के विवाद में तो आपने अपनी फिल्म चलाने के लिए जम के बयानबाजी कि, खुद को शिकागो में रोके जाने पर भी अच्छा ख़ासा मीडिया में हंगामा किया था. पर आप जैसे बड़े स्टार अगर कभी लादेन के खिलाफ मीडिया के सामने ऐसा बयान दे देंगे तो शायद इसका आम जनता में व्यापक असर पड़ेगा. प्रेस कांफ्रेंस बुला कर अगर आप जैसे स्टार सीधा लादेन को अपनी बात कहें की "ये देखो तुम्हारे कारण हमें क्या-क्या झेलना पड़ रहा है" मुझे पता है ये बड़ी बचकानी से बात मैं कह रहा हूँ लेकिन सरकार को दोष देने के बजाय हमारा भी तो कुछ कर्तव्य है. मुझे पता है इन बातों से तो लादेन जैसे लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ेगा, पर अगर सब मिल कर हर बार ये बोलना शुरू कर देंगे तो शायद कुछ फर्क पड़े. कम से कम लादेन को नहीं पर उनको सही मानने वालों की संख्यां भी तो कम होगी. जब गाँधी जी निहत्थे अंग्रेजों से भारत को आज़ाद करने की बात करते थे तो लोग ऐसे ही उन्हें कहते थे की ये असंभव है, पर आखिर ये संभव कर दिखाया न उन्होंने. इसलिए अंततः मेरा इन सारे सितारों से अनुरोध है की ये कदम आप उठायें. ये ज़रूरी नहीं है की सिर्फ फ़िल्मी हस्ती ही आगे आयें. वो सभी मुसलमान भाई जो आज विश्व के सामने एक प्रसिद्धि हासिल किये हुए हैं, चाहे वो किसी भी क्षेत्र से सम्बन्ध रखते हों, सब आगे बढ़ें और एक एक करके अपनी बात इन आतंकवादी संगठनों तक पहुचाएं. फिर शायद वो दिन भी दूर नहीं होगा की कुछ तो बदलाव आयेगा. कम से कम निर्दोष मासूम तो इनके बहकावे में नहीं आयेंगे.

गुरुवार, 25 मार्च 2010

आरक्षण किसके लिए.......

कल मैंने मुलायम सिंह जी का बयान अख़बार में पढ़ा कि "अगर महिला आरक्षण लागू हो गया तो संसद भवन में सिर्फ सीटियाँ ही बजेगी". सच कहूँ तो मैंने तय किया था कि "मैं आरक्षण पर कुछ भी नहीं लिखूंगा. क्यूंकि हर किसी का इसपर अपना मत है और हर एक व्यक्ति अपने मतानुसार उचित है. इसलिए मैं इस वाद-विवाद में पड़ना नहीं चाहता था." परन्तु मुलायम सिंह के कल के बयान ने मुझे सोचने पर मजबूर करवा दिया है कि ये राजनेता देश कल्याण कि बात कभी सोचते भी हैं या नहीं? ये बिलकुल भूल गए कि जिस देश कि महिला के बारे में अपशब्दों का प्रयोग कर रहे हैं उसी देश को हम "माता" कह के बुलाते हैं और तो और आज उन्होंने फिर से कहा कि मैं जो कह रहा हों बिलकुल सही कह रहा हूँ और इसके लिए मैं किसी से माफ़ी भी नहीं मांगूंगा.

मैं मुलायम सिंह जी से पूछना चाहूँगा कि इस तरह का बयान देते समय उन्होंने ये नहीं सोचा कि अगर उनकी पुत्रवधू जो राज बब्बर से चुनाव हार गयी, वो अगर संसद में होती और ऐसी हरकत हो जाये तो उन्हें कैसा लगेगा. इस तरह के शब्दों के प्रयोग के लिए मैं आप सबसे माफ़ी मांगता हूँ, पर लोगों को हर चीज़ पहले अपने ऊपर ले कर सोचना चाहिए, तब कुछ कहना चाहिए. जो बात आपके लिए बुरी है वही बात दूसरों के लिए भी तो बुरी हो सकती है. इस तरह का बयान देने वाला व्यक्ति किसी प्रदेश का मुख्यमंत्री कैसे हो सकता है. मैं तो समझता हूँ कि देश के सबसे बड़ी विडम्बना थी जब ये हमारे रक्षा मंत्री बने थे. जो व्यक्ति महिलाओं के बारे में ऐसा सोचता हो वो उनकी रक्षा के बारे में क्या सोचेगा.

मुलायम सिंह जी, समाजवादी कि राजनीति करने वाले हैं. जब देखो समाजवाद का ढोंग करके अपने पूरे कुनबे को पार्टी के महत्वपूर्ण पदों पर आसीन किये हुए हैं. इनकी पूरी पार्टी में कही इनका बेटा है, तो कहीं भाई तो कही पुत्रवधू. ये हैं समाजवादी पार्टी. असल में इसका नाम होना चाहिए समाज के बाद कि पार्टी यानी "परिवारवाद पार्टी".

अब ज़रा आरक्षण कि बात अगर करें तो ये किस आरक्षण का दिखावा कर रहे हैं. सही मायनो में देखा जाये तो इसका फायदा किन वर्गों को होगा, किसी ने नहीं सोचा? बस सभी लगे पड़े हैं अपनी राजनीति करने में. कांग्रेस और भाजपा, महिलाओं को सशक्त बनाने कि बात कर रही हैं आरक्षण के नाम पर, इधर लालू यादव, मुलायम सिंह और शरद यादव उसमे पिछड़ों को आरक्षण देने के मांग कर रहे हैं. यहाँ लोगों को करना कुछ नहीं है बस अपनी राजनीति कि रोटी सेंकनी है.

अब ज़रा हम अब तक चली आ रही आरक्षण व्यवस्था पर अगर नज़र डालें तो एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि सरकार द्वारा दिया जा रहा हरिजन और आदिवासी आरक्षण का फायदा सिर्फ शहर के संभ्रांत परिवार ही उठा रहे हैं. गाँव के हरिजन आदिवासी अभी तक उसी हालत में है. अब इन नेताओं को कौन समझाएगा कि पहले उनके जीवन स्तर को ठीक करने कि बात सोचे. जिस गाँव में स्कूल और कॉलेज नहीं है वहां इसकी व्यवस्था करे. एक अभियान चलाया जाये जिसमे इन्हें बताया जाये इन्हें जागृत किया जाये कि इनका पढ़ा-लिखा होना कितना आवश्यक है. तब इस तरह के आरक्षण का फायदा है और मेरे विचार में सही आरक्षण का आधार यही है. आरक्षण का मतलब होना चाहिए कि ऐसे ही लोगों को मुख्य धरा में लाना जो इन सबसे कोसों दूर हैं. न कि वो लोग जो संभ्रांत होते हुए भी अभी तक इस आरक्षण का फायदा उठा रहे हैं.

आरक्षण हो या न हो इसपर बहस तो बाद में कीजिये पर सबसे पहले ये देखने कि कोशिश करें कि जिस वर्ग को आप ये सुविधा देना चाह रहे हैं क्या वो इनसे लाभान्वित हो रहे हैं. आज हम महिला आरक्षण कि बात कर रहे हैं पर ये भी सोचें कि इससे किन महिलाओं को लाभ होगा? शायद मैं इन नेताओं कि जानकारी के लिए बता दूं कि भारत कि 15 साल से उपर कि महिलाओं में करीब 40% अभी तक अशिक्षित हैं. मेरे विचार में पहले हम इन्हें शिक्षित करें फिर इनके आरक्षण कि बात करें तो बेहतर होगा. वरना फिर से ये महिलाएं बिकास से कोसों दूर रह जाएँगी और फायदा होगा उन्ही फायदेमंद लोगों को और अगर सिर्फ राजनीति ही करनी है तो कोई बात नहीं. फिर क्या फर्क पड़ता है कि कौन लाभान्वित हो रहा है और कौन नहीं.

पर मेरा नम्र निवेदन है उन तमाम राजनेताओं से कि आप लोग बड़े भाग्यशाली हैं कि आपको देश कि सेवा का मौका मिला है. जनता सैकड़ों सपने बुन कर आपको वहां तक पहुंचाती है तो कृपया कुछ ऐसा न करें कि लोकतंत्र शर्मशार हो. क्यूँ न आप कुछ ऐसा करें कि हम जनता को फक्र महसूस हो और हम गर्व से कह सकें कि इन्हें हमने वोट किया है.

रविवार, 21 मार्च 2010

दलित या दौलत

माया चाहे दौलत की हो या दलितों की, ये हमेशा मायावी ही होती है. ये मुझे पिछले 15 मार्च को पता चला जब दलितों की माया ने अपनी एक विराट रैली में दौलत की माया का रूप धारण किया. वैसे एक ज़माना था जब मैं भी कांशी राम को दलितों का मसीहा समझता था. उन्होंने दलितों के जीवन स्तर को सुधारने का अनवरत प्रयास किया. शायद उन्ही की मेहनत की वजह से आज मायावती दौलत की माया बन गयी हैं और वो संघर्ष करते हुए इस दुनिया से चले गए. लेकिन इन्हें ये पता नहीं है की ये अगर माया हैं, तो जनता दौलत से भी ज्यादा मायावी है.

जिस दिन मायावती करोड़ों रुपये कि माला धारण करके लखनऊ में अपनी सभा संबोधित कर रही थी उस दिन उन्हें ज़रा भी याद नहीं रहा कि ये शायद उनके प्रदेश का सबसे काला दिन है क्यूँकि उन दिनों बरेली में दंगे हो रहे थे. बरेली कि जनता कर्फ्यू के साए में जी रही थी. एक तरफ लखनऊ नीली रौशनी से जगमगा रहा था वही दूसरी ओर बरेली में अजीब सा सन्नाटा पड़ा हुआ था. पर इन्हें क्या मतलब ये तो अपनी रैली करेंगी. रैली में जहाँ 200 करोड़ रुपये खर्च हुए तो शायद इन पैसों से बरेली के कई उजड़े हुए घर आबाद हो सकते थे. लेकिन इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता क्यूँकि चुनाव अभी बहुत दूर है.

अगर यहाँ सिर्फ मायावती की ही बात कही जाए तो इनकी पहचान क्या है? देश इन्हें किस रूप में जानता है, कि ये देश के बहुत बड़े राज्य उत्तर प्रदेश कि मुख्य मंत्री हैं? मैं समझता हूँ कि इससे पहले देश इन्हें दलितों के बहुत बड़े नेता के रूप में जानता है. ये देश कि एक ऐसी नेता हैं जो दलितों का प्रतिनिधित्व करती हैं और इन्ही सब चीज़ को भुना के आज ये उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री बन गयी. पर इनके मुख्य मंत्रित्व काल में उत्तर प्रदेश के दलितों के हालत के बारे में मेरे पास कुछ जानकारियां हैं जो आपके समक्ष बांटना चाहता हूँ. ये सारी घटनाएँ 2008-2009 के बीच कि ही हैं-

फरवरी 26 को इटावा के एक थानेमें मामला दर्ज हुआ है कि "एक आठ साल कि दलित लड़की को 280 रूपया चुराने के इलज़ाम में बालों से घसीट कर थानेमें लाया गया, और देश के सभी न्यूज़ चैनेल पर लोगों ने इसे देखा था.

दिसम्बर 9,2009 को एक और मामला सामने आया जिसमे चार लोगों ने एक सत्तर साल कि दलित महिला का बलात्कार किया था. उसके बेटे और बहु को पैरों में गोली मार दिया गया क्यूंकि वो इस महिला को बचाने कि कोशिश कर रहे थे.

फरवरी 10, 2009 का एक और मामला है जिसमे बंद जिला के गिरवान गाँव में एक सात साल के दलित लड़की का बलात्कार हुआ.

इस तरह से अगर मैं एक दलित मुख्य मंत्री के शासनकाल का विवरण देना शुरू कर दूंगा तो आप स्तब्ध रह जायेंगे और सोचने पर मजबूर हो जायेंगे कि क्या एक दलित महिला का प्रदेश कि मुख्य मंत्री होने के बाद भी दलित महिलाओं पर इतना अत्यचार कैसे हो रहा है? इसके पीछे बस एक ही कारण है, कि मायावती की माया दलितों के लिए बस वोट लेने तक ही है और अब ये दौलत कि माया बन गयी है. मानवाधिकार आयोग के रिपोर्ट में तो यहाँ तक कहा गया है कि गत दिनों जितने भी केस दर्ज हुए हैं उनमे अधिकतम दलित अत्याचार के ऊपर ही हैं. लेकिन मायावती जी को यह सब जानने समझने कि फुर्सत कहाँ है. मैं तो बस इतना जानता हूँ कि संसार में बस दो जातियां होती है. एक पैसेवालों कि दूसरी गरीबों की. इसलिए मैं उत्तर प्रदेश कि अवाम को सचेत करना चाहता हूँ कि जो भी गरीब या दलित मायावती जी के भरोसे हैं अब उन्हें भूल जाएँ. क्यूंकि मायावती जी ने अब अपनी जाति बदल ली है.

रैली में मायावती ने जिन नोटों कि माला पहनी है, कहा जाता है कि ये करीब पांच करोड़ कि माला बनी थी जिसमे सभी हज़ार हज़ार के नोट लगे हुए थे. मैं यहाँ ये जानना चाहता हूँ कि क्या सरकार जांच कर रही है कि ये पैसे कहाँ से आये हैं? बताया जाता है कि माला को खूबसूरत बनाने के लिए इसके किनारों को लाल रंग से रंगा गया था. क्या आर. बी. आई. के तहत इनपर मुकदमा नहीं चलना चाहिए. क्यूंकि जहाँ तक मेरी जानकारी कहती है कि अगर आप नोट पर कुछ लिखते हैं या किसी अन्य तरीकों से भी इसकी वर्तमान अवस्था को भिन्न करने कि कोशिश कि जाती है तो ये संगीन अपराध माना जाता है.

वैसे इन सब से मैडम मायावती को क्या फर्क पड़ता है. अगर एक ब्यौरा इनकी संपत्ति पर डाले तो खुद मैं आश्चर्य चकित हो जाता हूँ. सीबीआई कि चार्जशीट के हिसाब से मायावती के पास 74 प्रोपर्टी खेती वाली ज़मीन इनके परिवार वालों के नाम से हैं, 16 अवासीय प्लाट हैं, 5 जंगल के लिए ज़मीन है साथ ही 2 दुकाने और 3 बगीचा है. जिसकी कीमत अंदाज़न 6.93 करोड़ आंकी गयी है. इसके अलावा 12.98 करोड़ रुपये इनके पास दान के द्वारा करीब 130 दानदाताओं से मिले थे पर सीबीआई को बड़ी मेहनत करने के बाद सिर्फ 30 दानदाता ही मिले हैं. एक बात आपको मैं यहाँ और बताना चाहूँगा कि मायावती जी का दिल्ली के महरोली में करीब चार एकड़ का प्लाट है जिसकी कीमत इन्होने 10लाख रुपये कागजों में दिखाया है. तो आप खुद ही इससे ऊपर 6.93 करोड़ आंकड़े का मतलब समझ सकते हैं अगर महरोली कि ज़मीन १०लाख कि है तो.

अंततः मैं वापस राजनीति कि उसी दहलीज पर पहुँच गया हूँ और सोचने पर मजबूर हो गया हूँ कि क्या है इस राजनीति का भविष्य? सच कहूँ तो मुझे कोई जवाब नहीं मिल रहा है. क्या हम ऐसे ही चुप बैठ कर तमाशा देखते रहेंगे, या मैं बस अपना ब्लॉग लिख कर ही खुश होता रहूँगा कि चलो मेरा तो काम पूरा हो गया? फिर मैं सोचता हूँ, कि नहीं एक दिन आएगा जब सिर्फ इसपर बहस नहीं होगी बल्कि इसे सुधारने हम और आप आगे आएंगे. तो शायद अब इंतजार इसी बात का है कि पानी नाक से ऊपर हो जाए.....