आज सुबह मैं बड़ी मीठी नींद में सोया हुआ था कि मेरे फ़ोन के घंटी बज उठी. मुझे बड़ा गुस्सा आया क्यूंकि बीती रात मैं देर से सोया था. बड़े अनमने ढंग से मैंने फ़ोन उठाया तो पता चला की फ़ोन मेरे पिता जी का था. आधी नींद में ही मैं उनसे बात कर रहा था. पर पिता जी ने एक ऐसा समाचार सुनाया कि मेरे बिलकुल ही होश उड़ गए और मेरी नींद कहाँ चली गयी मुझे पता ही नहीं चला. अब मैं उस समय से उठ कर आत्मंथन में लगा हुआ हूँ कि ये क्या हो रहा है. जो भी समाचार मुझे मेरे पिता जी ने सुबह सुबह दिया उसके बारे में सोच कर समझ नहीं आ रहा है कि ये दोष किसे दूं मैं.
असल में हमारे एक पारिवारिक मित्र हैं जो मेरे पिता जी के साथ स्कूल में पढ़ते थे. इनके परिवार के साथ हमारा बड़ा ही घनिष्ठ सम्बन्ध है. आपको जैसा कि ज्ञात होगा कि गत दिनों बिहार के लखीसराय जिले में नक्सलियों की पुलिस के साथ जबरदस्त मुठभेड़ हुई थी, जिसमे सात पुलिसकर्मी शहीद हो गए थे और कई पुलिसकर्मियों को उन्होंने बंधक बना लिया है. उन अपहृत लोगों में मेरे पिता जी के दोस्त के दामाद भी हैं, जो लखीसराय के किसी थाने में कार्यरत थे.
जब से ये खबर मेरे कानो में आई है मैं यही सोच रहा हूँ कि ये क्या हो रहा है. इस घटना के करीब 2 दिन हो चुके हैं लेकिन इनलोगों का कोई पता भी नहीं है कि ये लोग कहाँ हैं. नक्सलियों ने इनके साथ किया क्या है. ये जिंदा भी हैं ये मर गए. बस इन 2 दिनों में सरकार से इनके परिजनों को एक ही चीज़ मिल रही है और वो है 'भरोसा', इसके अलावा सरकार इन मामूली अधिकारियों या आम आदमी के लिए कुछ नहीं कर सकती. क्यूंकि ये किसी गृहमंत्री जी के पुत्री नहीं है, ये एक मामूली से आम आदमी है. अगर कल इनके मरने कि भी खबर आ जाये तो सरकारी खजाने से 10 लाख की रकम दे कर सरकार सोचेगी कि हमारा काम हो गया. क्या यही इन्साफ है?
ये नक्सली दिन दहाड़े हमारी हत्याएं करते रहे पर हमारे केंद्रीय मंत्री समझते हैं कि वो भी इंसान हैं इसलिए इनसे बात-चीत करके मामला सुलझाएं. ये राजनेता ज़रा सोचें कि, जितने भी अधिकारी अपहृत हैं, उनके घरों का क्या माहौल होगा अभी? लेकिन ये क्यूँ सोचें, इन्हें क्या फर्क पड़ता है? इनकी राजनीति तो चमकनी चाहिए बस. जहाँ तक मुझे पता है कि जिस क्षेत्र में ये घटना हुई है उसके बारे में ख़ुफ़िया विभाग पहले ही रिपोर्ट दे चूका था कि यहाँ नक्सली कैंप चल रहा है और आशंका जताते हुए राज्य मुख्यालय को भी सतर्क किया गया था. पर शिथिल प्रशासन पर भारी पड़े नक्सलियों ने खून की होली खेलकर प्रशासन को उसकी औकाद बता दी. महत्वपूर्ण बात यह है कि हाल के दिनों में सरकार ने लखीसराय जिले को नक्सल प्रभावित घोषित किया है लेकिन इस जिले में नक्सलियों से लड़ने के लिए न तो संसाधन उपलब्ध है न पुलिस बल. जहाँ नक्सली इस मुठभेड़ के दौरान 100 से अधिक संख्यां में थे और साथ ही नक्सली एल.एम.जी. और ए.के.47 जैसे हथियारों से हमले कर रहे थे पर हमारे पुलिसबल के पास कौन से हथियार होते हैं? मेरा तो सरकार से बड़ा ही सीधा सवाल है कि जब ख़ुफ़िया विभाग कि रिपोर्ट इन जगहों के बारे में आ चुकी थी तो पूर्ण सुविधाएँ हमारे जवानों को क्यूँ नहीं मिली थी, क्यूँ उन्हें भगवान के भरोसे छोड़ दिया गया था?
कुछ दिनों पहले हमारी केंद्रीय मंत्री ममता बनर्जी ने नक्सल के समर्थन में बयान देते हुए कहा है कि उनके साथ अन्याय हो रहा है. साथ ही इनके समर्थन में हमारे एक और केंद्रीय मंत्री प्रणव मुखर्जी का भी बयान आया है. क्या ये कुछ दिनों पहले CRPF पर हुआ नक्सली हमला भूल गए. जिसमे हमारे अनगिनत जवान मौत के घात उतार दिए गए. ज़रा हमारे मंत्रीगण बयान देने के पहले सोचें कि उस हमले में शहीद हुए जवानों के परिवार पर क्या बिता होगा यह सब सुनकर. वो यही सोच रहे होंगे कि "जिसने इनके घर का चिराग बुझा दिया ये सरकार उसी को बचाने में लगी है" और इधर इन पुलिस पदाधिकारियों के अपहरण हुए करीब दो दिन से भी ज्यादा हो चुके हैं, पर अभी तक हमारे माननीय मुख्यमंत्री जी का कोई बयान नहीं आया है. जबकि ये जांबाज़ पुलिस पदाधिकारी अपनी जान पर खेल कर इन नक्सलियों से लोहा लेने गए थे, ताकि क्षेत्र में शान्ति व्यवस्था कायम रह सके. इनके परिवार में कोहराम मचा हुआ है. इनलोगों के आंसू आँखों से सूख ही नहीं रहे हैं. पर सरकार क्या कर रही है कुछ पता नहीं चल रहा है. अब मुझे ऐसा लग रहा है कि सरकार ही अब नक्सालियों जैसी हरकत करने लगा है. अब तो सवाल ये आ गया है कि असल में नक्सली है कौन, ये जंगल में छिपे लोग या फिर सरेआम खादी पहन कर घुमने वाले ये नेता जो नक्सलियों का समर्थन करते हैं? अब सच बताऊँ तो मेरा विश्वास उठ चूका है इन मंत्रियों और सरकार से. आजतक नक्सलियों के समर्थन में बोलने वाले इन मंत्रियों का इस मामले में कोई बयान क्यूँ नहीं आ रहा है? इधर बिहार के मुख्यमंत्री जी भी चुप्पी साधे बैठे हुए हैं. इसलिए मैं इनलोगों कि कुशलता कि कामना ईश्वर से करता हूँ और इनके सकुशल वापसी कि दुआएं मांगता हूँ.
मंगलवार, 31 अगस्त 2010
शनिवार, 10 अप्रैल 2010
महिला अपराधों की राजधानी "दिल्ली"
आज पता नहीं क्यूँ मुझे अपने देश की राजधानी का ख्याल मेरे मन में आया. असल में समाचार पत्रों में कुछ दिनों से महिलाओं पर हो रहे अत्याचार से सम्बंधित ख़बरें आ रही थीं. मैं आपको ज़रा याद दिलाना चाहता हूँ ये दिल्ली, उसी देश की राजधानी है जिसे हम माता कह के खुद को गौरवान्वित महसूस करते हैं. बड़े शान से हम कहते हैं की "भारत हमारी माता है". आज हमारे देश के लिए एक और गौरव की बात ये है की हमारी भारत माता की 'राष्ट्रपति' वो भी महिला हैं. साथ ही हमारे देश के सरकार की बागडोर भी एक सशक्त महिला ने ही थाम रखी है और इस देश की राजधानी है, हमारी प्यारी दिल्ली. अब एक और संयोग देखिये कि दिल्ली प्रदेश कि जो मुखिया हैं वो भी 'महिला' ही हैं और तो और दिल्ली शहर की मेयर भी एक महिला ही हैं. क्या अजब संयोग है. मेरे विचार में शायद संसार का कोई भी देश ऐसा नहीं होगा जहाँ महिलाओं का इतना सम्मान होता हो और जहाँ लगातार उच्च पदस्थ सिर्फ महिलाएं ही हों. लेकिन इन सबों का वास दिल्ली में होते हुए भी, दिल्ली में महिलाओं की स्थिति क्या है?
आंकडें कहते हैं कि इस देश का महिलाओं के लिए दिल्ली सबसे असुरक्षित शहर है. हाल ही में नेशनल क्राइम ब्यूरो का सर्वे कहता है कि महिलाओं पर होने वाले अत्याचार में दिल्ली का पहला स्थान है. मुझे तो सोच कर लगता है कि 'वाह रे देश कि विडम्बना' महिलाओं के देश में, महिलाओं के राज्य में और महिलाओं के शहर में 'बेचारी महिला' ही असुरक्षित हैं. शायद ये राजनीति के गिरते स्तर की पहचान है. अगर हम सामान्य अपराध में सर्वे रिपोर्ट देखेंगे तो दिल्ली इसमें पहले पांच शहरों में शान से खड़ा है पर महिला अत्याचार में सबसे अव्वल है.
अब ज़रा हम अगर आंकड़ों पर गौर करें तो हमें पता चलेगा की असल में हमारी दिल्ली क्या है. कुछ दिनों पहले किये गए 35 बड़े शहरों में महिला अपराध के मामले में दिल्ली सबसे आगे है. अगर 35 शहरों को मिला कर महिला अत्याचार 14.2% है प्रतिलाख कि आबादी में तो, दिल्ली में ये प्रतिशत 27.6% प्रतिलाख में है. इसका मतलब साफ़ है की बांकी 35 शहरों के संयुक्त प्रतिशत का दोगुना. ये सर्वे उन 35 बड़े शहरों में किया गया है जिनकी आबादी 10 लाख से ज्यादा है. अगर बलात्कार के केसों को देखें तो आपको पता चलेगा कि, अकेले दिल्ली में 562 केस हैं जबकि 1693 सभी शहरों को मिला कर. मतलब करीब एक तिहाई केस दिल्ली में ही हुए हैं. महिलाओं के अपहरण के 2409 केसों में 900 केस दिल्ली में हुए हैं, जो की सम्पूर्ण आंकड़ों का 37.4% अकेला दिल्ली में है. दहेज़ हत्या का मामला अगर देखें तो 19% दिल्ली में हुए है बांकी 35 शहरों के मुकाबले. उपर्युक्त सभी आंकड़े भारत के सिर्फ 35 बड़े शहरों में संयुक्त रूप से किया गया है जिनकी आबादी 10 लाख से ऊपर थी.
अगर मैं इस तरह से आंकडें और केसों को विस्तार से आपको बताना शुरू कर दूंगा तो शायद मैं लिखता रहूँगा पर मेरे शब्द ख़त्म नहीं होंगे. इसलिए आंकड़ों को यही विराम देते हुए बस मैं ये कहना चाहता हूँ कि, कब ये स्वार्थी राजनेता अब तो राजनेत्री भी कहना अनुचित नहीं होगा. क्यूंकि उच्च पद पर विराजमान तो है ही और राजनीति में भी बड़ी संख्या में आ रही हैं. पर ये लोग कब स्वार्थ से ऊपर उठ कर काम करना शुरू करेंगे. मैं इन सभी महिला प्रशासकों से पूछना चाहता हूँ कि क्यूँ आप सबों के उच्च पद पर विराजमान रहने पर भी आज कोई भी महिलाएं बाहर निकलने से डरती है, क्यूँ दिन ब दिन इनके ऊपर अत्याचार बढ़ते ही जा रहे हैं, सरकार क्यूँ नहीं इन बातों के ऊपर ठोस कदम उठाती है? सवाल बहुत हैं पर जवाब इनके पास नहीं है. क्यूंकि ये भी सिर्फ राजनीति ही जानते हैं.
अभी संसद में हाल ही में बवाल हुआ था, महिला आरक्षण पर. मैं यहाँ यही पूछना चाहता हूँ किन आरक्षण कि बात कर रही हैं ये महिला राजनेत्रियाँ या फिर ये सरकार? मेरे हिसाब से महिलाओं के खिलाफ हो रहे अत्याचार में तो आरक्षण दिलवा दिया इन महिला प्रशासकों ने और इनके कुशासन ने दिल्ली को बनवा दिया देश का सबसे असुरक्षित शहर महिलाओं के लिए. सबसे पहले तो महिलाओं का हितेषी बनने का ढोंग छोड़ दें जो 'महिला आरक्षण' दिखा कर, कर रहे हैं. अगर इन उच्च पदस्थ महिलाओं को ज़रा भी महिलाओं के प्रति दर्द इनके दिल में है तो दिल्ली को ही नहीं पूरे भारतवर्ष को महिलाओं पर हो रहे अत्याचार से मुक्त करें.
मेरा निवेदन है इन सबों से एक बार फिर कि, गन्दी राजनीति से ऊपर उठ कर इन आम जनता के बारे में सोच लें. अगर सच में आपको महिलाओं को आगे लाना है, उन्हें मुख्य धारा में सरीक करना है और इन्हें सशक्त बनाना है तो इन्हें पूर्ण सुरक्षा का अहसास दिलाएं. फिर मेरे विचार में इन्हें किसी आरक्षण कि ज़रूरत नहीं पड़ेगी. पूर्ण सुरक्षा का अहसास ही इनके लिए सबसे बड़ा आरक्षण होगा और पुनः हम गौरवान्वित होकर कह सकेंगे कि "भारत हमारी माता है"
आंकडें कहते हैं कि इस देश का महिलाओं के लिए दिल्ली सबसे असुरक्षित शहर है. हाल ही में नेशनल क्राइम ब्यूरो का सर्वे कहता है कि महिलाओं पर होने वाले अत्याचार में दिल्ली का पहला स्थान है. मुझे तो सोच कर लगता है कि 'वाह रे देश कि विडम्बना' महिलाओं के देश में, महिलाओं के राज्य में और महिलाओं के शहर में 'बेचारी महिला' ही असुरक्षित हैं. शायद ये राजनीति के गिरते स्तर की पहचान है. अगर हम सामान्य अपराध में सर्वे रिपोर्ट देखेंगे तो दिल्ली इसमें पहले पांच शहरों में शान से खड़ा है पर महिला अत्याचार में सबसे अव्वल है.
अब ज़रा हम अगर आंकड़ों पर गौर करें तो हमें पता चलेगा की असल में हमारी दिल्ली क्या है. कुछ दिनों पहले किये गए 35 बड़े शहरों में महिला अपराध के मामले में दिल्ली सबसे आगे है. अगर 35 शहरों को मिला कर महिला अत्याचार 14.2% है प्रतिलाख कि आबादी में तो, दिल्ली में ये प्रतिशत 27.6% प्रतिलाख में है. इसका मतलब साफ़ है की बांकी 35 शहरों के संयुक्त प्रतिशत का दोगुना. ये सर्वे उन 35 बड़े शहरों में किया गया है जिनकी आबादी 10 लाख से ज्यादा है. अगर बलात्कार के केसों को देखें तो आपको पता चलेगा कि, अकेले दिल्ली में 562 केस हैं जबकि 1693 सभी शहरों को मिला कर. मतलब करीब एक तिहाई केस दिल्ली में ही हुए हैं. महिलाओं के अपहरण के 2409 केसों में 900 केस दिल्ली में हुए हैं, जो की सम्पूर्ण आंकड़ों का 37.4% अकेला दिल्ली में है. दहेज़ हत्या का मामला अगर देखें तो 19% दिल्ली में हुए है बांकी 35 शहरों के मुकाबले. उपर्युक्त सभी आंकड़े भारत के सिर्फ 35 बड़े शहरों में संयुक्त रूप से किया गया है जिनकी आबादी 10 लाख से ऊपर थी.
अगर मैं इस तरह से आंकडें और केसों को विस्तार से आपको बताना शुरू कर दूंगा तो शायद मैं लिखता रहूँगा पर मेरे शब्द ख़त्म नहीं होंगे. इसलिए आंकड़ों को यही विराम देते हुए बस मैं ये कहना चाहता हूँ कि, कब ये स्वार्थी राजनेता अब तो राजनेत्री भी कहना अनुचित नहीं होगा. क्यूंकि उच्च पद पर विराजमान तो है ही और राजनीति में भी बड़ी संख्या में आ रही हैं. पर ये लोग कब स्वार्थ से ऊपर उठ कर काम करना शुरू करेंगे. मैं इन सभी महिला प्रशासकों से पूछना चाहता हूँ कि क्यूँ आप सबों के उच्च पद पर विराजमान रहने पर भी आज कोई भी महिलाएं बाहर निकलने से डरती है, क्यूँ दिन ब दिन इनके ऊपर अत्याचार बढ़ते ही जा रहे हैं, सरकार क्यूँ नहीं इन बातों के ऊपर ठोस कदम उठाती है? सवाल बहुत हैं पर जवाब इनके पास नहीं है. क्यूंकि ये भी सिर्फ राजनीति ही जानते हैं.
अभी संसद में हाल ही में बवाल हुआ था, महिला आरक्षण पर. मैं यहाँ यही पूछना चाहता हूँ किन आरक्षण कि बात कर रही हैं ये महिला राजनेत्रियाँ या फिर ये सरकार? मेरे हिसाब से महिलाओं के खिलाफ हो रहे अत्याचार में तो आरक्षण दिलवा दिया इन महिला प्रशासकों ने और इनके कुशासन ने दिल्ली को बनवा दिया देश का सबसे असुरक्षित शहर महिलाओं के लिए. सबसे पहले तो महिलाओं का हितेषी बनने का ढोंग छोड़ दें जो 'महिला आरक्षण' दिखा कर, कर रहे हैं. अगर इन उच्च पदस्थ महिलाओं को ज़रा भी महिलाओं के प्रति दर्द इनके दिल में है तो दिल्ली को ही नहीं पूरे भारतवर्ष को महिलाओं पर हो रहे अत्याचार से मुक्त करें.
मेरा निवेदन है इन सबों से एक बार फिर कि, गन्दी राजनीति से ऊपर उठ कर इन आम जनता के बारे में सोच लें. अगर सच में आपको महिलाओं को आगे लाना है, उन्हें मुख्य धारा में सरीक करना है और इन्हें सशक्त बनाना है तो इन्हें पूर्ण सुरक्षा का अहसास दिलाएं. फिर मेरे विचार में इन्हें किसी आरक्षण कि ज़रूरत नहीं पड़ेगी. पूर्ण सुरक्षा का अहसास ही इनके लिए सबसे बड़ा आरक्षण होगा और पुनः हम गौरवान्वित होकर कह सकेंगे कि "भारत हमारी माता है"
गुरुवार, 1 अप्रैल 2010
इस्लाम और आतंकवाद
गत दिनों मैंने मास्को ब्लास्ट के बारे में देखा तो मेरे दिमाग में एक ही बात उस समय से आ रही है कि आखिर कब तक इस्लाम के नाम पर ये हत्याएं होती रहेंगी, क्या कोई धर्म ये बताता है कि जो इनके अनुयायी नहीं हैं उनकी हत्या कर दो. मेरा ज्ञान जहाँ तक कहता है कि, कोई भी धर्म ऐसी शिक्षा नहीं देता है और फिर भी इन्हें सही ठहराने वाले आपके आस-पास बहुत मिल जायेंगे. मेरे विचार से शायद जिस विवाद से सम्पूर्ण विश्व बचना चाह रहा है उस पर खुल कर बहस करने का सही वक्त आ गया है. ये मुद्दा अब समूचे संसार के सामने बहस का मुद्दा है "इस्लाम और आतंकवाद"
यह बिलकुल सही है कि "हर मुसलमान आतंकवादी नहीं होता है, पर हर एक पकड़ा जाने वाला आतंकवादी मुसलमान ही क्यूँ होता है" अगर हम कुछ एक उदाहरण को नज़रंदाज़ कर दें तो. दुनिया का हर देश इस्लाम आतंकवाद का दंस झेल रहा है. यह सवाल हर किसी के मन में हर वक्त आता है पर आज तक इसपर खुल के बहस करने से हर कोई कतराता हैं. अब शायद समय आ गया है की इस पर हम खुल के बात करें. क्यूंकि ये बहुत ही पुरानी कहावत है की 'करे कोई और भरे कोई'. इसलिए ये आतंकवादी संगठन इस्लाम के नाम पर दरिंदगी तो कर देते हैं हैं, पर इसका भुगतान हमारे निर्दोष मुसलमान भाइयों को भुगतना पड़ता है. अल-कायदा जिस ट्विन टावर को उड़ा कर 9/11 का जश्न मना रही थी, क्या उसके बाद उन्होंने देखा की वहां पर अमरीकी पुलिस ने कितने निर्दोष मुसलमानों को सलाखों के पीछे कर दिया. हज़ारों-हज़ार की संख्यां में निर्दोषों की गिरफ्तारियां हुई थी. कुछ तो रिहा होने के बाद भी अब तक अपनी सामान्य ज़िन्दगी नहीं जी पा रहे हैं. क्या यही ट्विन टावर उड़ने की उपलब्धी गिनाती है ये अल कायदा. इन्हें इन सब बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता है. आज इन लोगों ने आम मुसलमानों की ये हालत बना दी है की अगर आपका नाम अहमद, आरिफ, खान, अली या ऐसा कुछ भी है तो आपको शक की निगाह से देखा जाता है. अगर आप भारत से बाहर किसी अंग्रेजी देश की यात्रा पर हैं तो हवाई अड्डे पर जाँच दल सामान्य से ज्यादा आपकी तलाशी लेंगे. इसका सबसे बड़ा उदहारण हाल ही में शाहरुख़ खान की शिकागो हवाई अड्डे पर हुई घटना से लगा सकते हैं. जहाँ जाँच दल अधिकारी ने उन्हें घंटों बिठा कर रखा था.
वैसे सच्चाई ये भी है की लादेन जैसे आतंकवादियों को सही मानने वालों की कमी भी इस संसार में नहीं है. शायद आप सब भी मेरे इस बात से सहमत ही होंगे. क्यूंकि अगर इन्हें मानने वालों की कमी होती तो इनकी तायदाद दिन ब दिन बढती नहीं जाती. इनके लिए हर कोई फिदायीन या मानव बम बनने को तैयार नहीं रहता. अभी मास्को ब्लास्ट में भी मानव बम का ही इस्तमाल किया गया था. लेकिन मैं इस्लाम की लड़ाई लड़ने वाले आतंकवादियों से पूछना चाहता हूँ की जहाँ आप ब्लास्ट करते हैं वहां क्या कोई मुसलमान नहीं मारा जाता? शायद आपको अब तक याद होगा कि गत वर्ष पकिस्तान के एक फाईव स्टार होटल में जबरदस्त ब्लास्ट हुआ था, वो भी रमजान के पाक महीने में. सभी इफ्तार की नमाज़ अदा कर रहे थे और एक जबरदस्त धमाका हुआ था. मैं इन लोगों से पूछना चाहता हूँ, की यहाँ ये ये ब्लास्ट क्यूँ हुआ था. यहाँ तो सभी खुदा की इबादत कर रहे थे, जिस खुदा के लिए आप लड़ाई लड़ रहे हैं, ये निर्दोष तो उन्हें ही याद कर रहे थे. फिर क्यूँ यहाँ ब्लास्ट किया आपने? अगर आप मुसलामानों का खुद को बहुत बड़ा हितेषी मानते हैं तो अजमेर शरीफ और जामा मस्जिद में क्यूँ ब्लास्ट किया था? ज़रा इसका जवाब देंगे आप की वहां कौन मारा गया था, वही हमारे निर्दोष मुसल्मान भाई.
मेरे विचार में यहाँ पर आप लोगों के सामने तस्वीर पूरी तरह से साफ़ है की आतंकवादियों का कोई कौम या कोई धर्म नहीं होता. इनका एक अलग ही धर्म है आतंकवाद. दुनिया में आतंकवादी जहाँ भी हैं वो किसी इस्लाम, सिख या हिन्दू धर्म से सम्बन्ध नहीं रखते हैं. उनका अलग ही धर्म है जिसका नाम है 'आतंकवाद" और उनकी पवित्र किताब बम है. वही बम जो किसी की जाती या धर्म देख कर नहीं फटती. यहाँ मैं राजनेताओं को भी कहना चाहूँगा की धर्म की राजनीती में अपना वोट भुनाना थोडा कम करे दें साथ ही शाहरुख़ खान जैसी बड़ी हस्ती से कहना चाहूँगा की आप लोग तो राजनेता से भी अच्छी राजनीति कर लेते हैं. अपनी फिल्म को चलाने का क्या शानदार शगूफा पाकिस्तानी खिलाडियों के रूप में छोड़ा और आपकी फिल्म 'माई नेम इज खान' बन गयी, अब तक सबसे ज्यादा चलने वाली फिल्म. उसके बाद वापस मुंबई आने के बाद तो आप ऐसे शांत हो गए जैसे "गधे के सर से सींग गाएब हो गया हो". वैसे जनता तो बेवकूफ है, इन्हें पता ही नहीं चला की आप तो अपनी फिल्म की मार्केटिंग कर रहे हैं और जनताओं की भावनाओं से खेल रहे हैं. पाकिस्तानी क्रिकेटर के विवाद में तो आपने अपनी फिल्म चलाने के लिए जम के बयानबाजी कि, खुद को शिकागो में रोके जाने पर भी अच्छा ख़ासा मीडिया में हंगामा किया था. पर आप जैसे बड़े स्टार अगर कभी लादेन के खिलाफ मीडिया के सामने ऐसा बयान दे देंगे तो शायद इसका आम जनता में व्यापक असर पड़ेगा. प्रेस कांफ्रेंस बुला कर अगर आप जैसे स्टार सीधा लादेन को अपनी बात कहें की "ये देखो तुम्हारे कारण हमें क्या-क्या झेलना पड़ रहा है" मुझे पता है ये बड़ी बचकानी से बात मैं कह रहा हूँ लेकिन सरकार को दोष देने के बजाय हमारा भी तो कुछ कर्तव्य है. मुझे पता है इन बातों से तो लादेन जैसे लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ेगा, पर अगर सब मिल कर हर बार ये बोलना शुरू कर देंगे तो शायद कुछ फर्क पड़े. कम से कम लादेन को नहीं पर उनको सही मानने वालों की संख्यां भी तो कम होगी. जब गाँधी जी निहत्थे अंग्रेजों से भारत को आज़ाद करने की बात करते थे तो लोग ऐसे ही उन्हें कहते थे की ये असंभव है, पर आखिर ये संभव कर दिखाया न उन्होंने. इसलिए अंततः मेरा इन सारे सितारों से अनुरोध है की ये कदम आप उठायें. ये ज़रूरी नहीं है की सिर्फ फ़िल्मी हस्ती ही आगे आयें. वो सभी मुसलमान भाई जो आज विश्व के सामने एक प्रसिद्धि हासिल किये हुए हैं, चाहे वो किसी भी क्षेत्र से सम्बन्ध रखते हों, सब आगे बढ़ें और एक एक करके अपनी बात इन आतंकवादी संगठनों तक पहुचाएं. फिर शायद वो दिन भी दूर नहीं होगा की कुछ तो बदलाव आयेगा. कम से कम निर्दोष मासूम तो इनके बहकावे में नहीं आयेंगे.
यह बिलकुल सही है कि "हर मुसलमान आतंकवादी नहीं होता है, पर हर एक पकड़ा जाने वाला आतंकवादी मुसलमान ही क्यूँ होता है" अगर हम कुछ एक उदाहरण को नज़रंदाज़ कर दें तो. दुनिया का हर देश इस्लाम आतंकवाद का दंस झेल रहा है. यह सवाल हर किसी के मन में हर वक्त आता है पर आज तक इसपर खुल के बहस करने से हर कोई कतराता हैं. अब शायद समय आ गया है की इस पर हम खुल के बात करें. क्यूंकि ये बहुत ही पुरानी कहावत है की 'करे कोई और भरे कोई'. इसलिए ये आतंकवादी संगठन इस्लाम के नाम पर दरिंदगी तो कर देते हैं हैं, पर इसका भुगतान हमारे निर्दोष मुसलमान भाइयों को भुगतना पड़ता है. अल-कायदा जिस ट्विन टावर को उड़ा कर 9/11 का जश्न मना रही थी, क्या उसके बाद उन्होंने देखा की वहां पर अमरीकी पुलिस ने कितने निर्दोष मुसलमानों को सलाखों के पीछे कर दिया. हज़ारों-हज़ार की संख्यां में निर्दोषों की गिरफ्तारियां हुई थी. कुछ तो रिहा होने के बाद भी अब तक अपनी सामान्य ज़िन्दगी नहीं जी पा रहे हैं. क्या यही ट्विन टावर उड़ने की उपलब्धी गिनाती है ये अल कायदा. इन्हें इन सब बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता है. आज इन लोगों ने आम मुसलमानों की ये हालत बना दी है की अगर आपका नाम अहमद, आरिफ, खान, अली या ऐसा कुछ भी है तो आपको शक की निगाह से देखा जाता है. अगर आप भारत से बाहर किसी अंग्रेजी देश की यात्रा पर हैं तो हवाई अड्डे पर जाँच दल सामान्य से ज्यादा आपकी तलाशी लेंगे. इसका सबसे बड़ा उदहारण हाल ही में शाहरुख़ खान की शिकागो हवाई अड्डे पर हुई घटना से लगा सकते हैं. जहाँ जाँच दल अधिकारी ने उन्हें घंटों बिठा कर रखा था.
वैसे सच्चाई ये भी है की लादेन जैसे आतंकवादियों को सही मानने वालों की कमी भी इस संसार में नहीं है. शायद आप सब भी मेरे इस बात से सहमत ही होंगे. क्यूंकि अगर इन्हें मानने वालों की कमी होती तो इनकी तायदाद दिन ब दिन बढती नहीं जाती. इनके लिए हर कोई फिदायीन या मानव बम बनने को तैयार नहीं रहता. अभी मास्को ब्लास्ट में भी मानव बम का ही इस्तमाल किया गया था. लेकिन मैं इस्लाम की लड़ाई लड़ने वाले आतंकवादियों से पूछना चाहता हूँ की जहाँ आप ब्लास्ट करते हैं वहां क्या कोई मुसलमान नहीं मारा जाता? शायद आपको अब तक याद होगा कि गत वर्ष पकिस्तान के एक फाईव स्टार होटल में जबरदस्त ब्लास्ट हुआ था, वो भी रमजान के पाक महीने में. सभी इफ्तार की नमाज़ अदा कर रहे थे और एक जबरदस्त धमाका हुआ था. मैं इन लोगों से पूछना चाहता हूँ, की यहाँ ये ये ब्लास्ट क्यूँ हुआ था. यहाँ तो सभी खुदा की इबादत कर रहे थे, जिस खुदा के लिए आप लड़ाई लड़ रहे हैं, ये निर्दोष तो उन्हें ही याद कर रहे थे. फिर क्यूँ यहाँ ब्लास्ट किया आपने? अगर आप मुसलामानों का खुद को बहुत बड़ा हितेषी मानते हैं तो अजमेर शरीफ और जामा मस्जिद में क्यूँ ब्लास्ट किया था? ज़रा इसका जवाब देंगे आप की वहां कौन मारा गया था, वही हमारे निर्दोष मुसल्मान भाई.
मेरे विचार में यहाँ पर आप लोगों के सामने तस्वीर पूरी तरह से साफ़ है की आतंकवादियों का कोई कौम या कोई धर्म नहीं होता. इनका एक अलग ही धर्म है आतंकवाद. दुनिया में आतंकवादी जहाँ भी हैं वो किसी इस्लाम, सिख या हिन्दू धर्म से सम्बन्ध नहीं रखते हैं. उनका अलग ही धर्म है जिसका नाम है 'आतंकवाद" और उनकी पवित्र किताब बम है. वही बम जो किसी की जाती या धर्म देख कर नहीं फटती. यहाँ मैं राजनेताओं को भी कहना चाहूँगा की धर्म की राजनीती में अपना वोट भुनाना थोडा कम करे दें साथ ही शाहरुख़ खान जैसी बड़ी हस्ती से कहना चाहूँगा की आप लोग तो राजनेता से भी अच्छी राजनीति कर लेते हैं. अपनी फिल्म को चलाने का क्या शानदार शगूफा पाकिस्तानी खिलाडियों के रूप में छोड़ा और आपकी फिल्म 'माई नेम इज खान' बन गयी, अब तक सबसे ज्यादा चलने वाली फिल्म. उसके बाद वापस मुंबई आने के बाद तो आप ऐसे शांत हो गए जैसे "गधे के सर से सींग गाएब हो गया हो". वैसे जनता तो बेवकूफ है, इन्हें पता ही नहीं चला की आप तो अपनी फिल्म की मार्केटिंग कर रहे हैं और जनताओं की भावनाओं से खेल रहे हैं. पाकिस्तानी क्रिकेटर के विवाद में तो आपने अपनी फिल्म चलाने के लिए जम के बयानबाजी कि, खुद को शिकागो में रोके जाने पर भी अच्छा ख़ासा मीडिया में हंगामा किया था. पर आप जैसे बड़े स्टार अगर कभी लादेन के खिलाफ मीडिया के सामने ऐसा बयान दे देंगे तो शायद इसका आम जनता में व्यापक असर पड़ेगा. प्रेस कांफ्रेंस बुला कर अगर आप जैसे स्टार सीधा लादेन को अपनी बात कहें की "ये देखो तुम्हारे कारण हमें क्या-क्या झेलना पड़ रहा है" मुझे पता है ये बड़ी बचकानी से बात मैं कह रहा हूँ लेकिन सरकार को दोष देने के बजाय हमारा भी तो कुछ कर्तव्य है. मुझे पता है इन बातों से तो लादेन जैसे लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ेगा, पर अगर सब मिल कर हर बार ये बोलना शुरू कर देंगे तो शायद कुछ फर्क पड़े. कम से कम लादेन को नहीं पर उनको सही मानने वालों की संख्यां भी तो कम होगी. जब गाँधी जी निहत्थे अंग्रेजों से भारत को आज़ाद करने की बात करते थे तो लोग ऐसे ही उन्हें कहते थे की ये असंभव है, पर आखिर ये संभव कर दिखाया न उन्होंने. इसलिए अंततः मेरा इन सारे सितारों से अनुरोध है की ये कदम आप उठायें. ये ज़रूरी नहीं है की सिर्फ फ़िल्मी हस्ती ही आगे आयें. वो सभी मुसलमान भाई जो आज विश्व के सामने एक प्रसिद्धि हासिल किये हुए हैं, चाहे वो किसी भी क्षेत्र से सम्बन्ध रखते हों, सब आगे बढ़ें और एक एक करके अपनी बात इन आतंकवादी संगठनों तक पहुचाएं. फिर शायद वो दिन भी दूर नहीं होगा की कुछ तो बदलाव आयेगा. कम से कम निर्दोष मासूम तो इनके बहकावे में नहीं आयेंगे.
गुरुवार, 25 मार्च 2010
आरक्षण किसके लिए.......
कल मैंने मुलायम सिंह जी का बयान अख़बार में पढ़ा कि "अगर महिला आरक्षण लागू हो गया तो संसद भवन में सिर्फ सीटियाँ ही बजेगी". सच कहूँ तो मैंने तय किया था कि "मैं आरक्षण पर कुछ भी नहीं लिखूंगा. क्यूंकि हर किसी का इसपर अपना मत है और हर एक व्यक्ति अपने मतानुसार उचित है. इसलिए मैं इस वाद-विवाद में पड़ना नहीं चाहता था." परन्तु मुलायम सिंह के कल के बयान ने मुझे सोचने पर मजबूर करवा दिया है कि ये राजनेता देश कल्याण कि बात कभी सोचते भी हैं या नहीं? ये बिलकुल भूल गए कि जिस देश कि महिला के बारे में अपशब्दों का प्रयोग कर रहे हैं उसी देश को हम "माता" कह के बुलाते हैं और तो और आज उन्होंने फिर से कहा कि मैं जो कह रहा हों बिलकुल सही कह रहा हूँ और इसके लिए मैं किसी से माफ़ी भी नहीं मांगूंगा.
मैं मुलायम सिंह जी से पूछना चाहूँगा कि इस तरह का बयान देते समय उन्होंने ये नहीं सोचा कि अगर उनकी पुत्रवधू जो राज बब्बर से चुनाव हार गयी, वो अगर संसद में होती और ऐसी हरकत हो जाये तो उन्हें कैसा लगेगा. इस तरह के शब्दों के प्रयोग के लिए मैं आप सबसे माफ़ी मांगता हूँ, पर लोगों को हर चीज़ पहले अपने ऊपर ले कर सोचना चाहिए, तब कुछ कहना चाहिए. जो बात आपके लिए बुरी है वही बात दूसरों के लिए भी तो बुरी हो सकती है. इस तरह का बयान देने वाला व्यक्ति किसी प्रदेश का मुख्यमंत्री कैसे हो सकता है. मैं तो समझता हूँ कि देश के सबसे बड़ी विडम्बना थी जब ये हमारे रक्षा मंत्री बने थे. जो व्यक्ति महिलाओं के बारे में ऐसा सोचता हो वो उनकी रक्षा के बारे में क्या सोचेगा.
मुलायम सिंह जी, समाजवादी कि राजनीति करने वाले हैं. जब देखो समाजवाद का ढोंग करके अपने पूरे कुनबे को पार्टी के महत्वपूर्ण पदों पर आसीन किये हुए हैं. इनकी पूरी पार्टी में कही इनका बेटा है, तो कहीं भाई तो कही पुत्रवधू. ये हैं समाजवादी पार्टी. असल में इसका नाम होना चाहिए समाज के बाद कि पार्टी यानी "परिवारवाद पार्टी".
अब ज़रा आरक्षण कि बात अगर करें तो ये किस आरक्षण का दिखावा कर रहे हैं. सही मायनो में देखा जाये तो इसका फायदा किन वर्गों को होगा, किसी ने नहीं सोचा? बस सभी लगे पड़े हैं अपनी राजनीति करने में. कांग्रेस और भाजपा, महिलाओं को सशक्त बनाने कि बात कर रही हैं आरक्षण के नाम पर, इधर लालू यादव, मुलायम सिंह और शरद यादव उसमे पिछड़ों को आरक्षण देने के मांग कर रहे हैं. यहाँ लोगों को करना कुछ नहीं है बस अपनी राजनीति कि रोटी सेंकनी है.
अब ज़रा हम अब तक चली आ रही आरक्षण व्यवस्था पर अगर नज़र डालें तो एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि सरकार द्वारा दिया जा रहा हरिजन और आदिवासी आरक्षण का फायदा सिर्फ शहर के संभ्रांत परिवार ही उठा रहे हैं. गाँव के हरिजन आदिवासी अभी तक उसी हालत में है. अब इन नेताओं को कौन समझाएगा कि पहले उनके जीवन स्तर को ठीक करने कि बात सोचे. जिस गाँव में स्कूल और कॉलेज नहीं है वहां इसकी व्यवस्था करे. एक अभियान चलाया जाये जिसमे इन्हें बताया जाये इन्हें जागृत किया जाये कि इनका पढ़ा-लिखा होना कितना आवश्यक है. तब इस तरह के आरक्षण का फायदा है और मेरे विचार में सही आरक्षण का आधार यही है. आरक्षण का मतलब होना चाहिए कि ऐसे ही लोगों को मुख्य धरा में लाना जो इन सबसे कोसों दूर हैं. न कि वो लोग जो संभ्रांत होते हुए भी अभी तक इस आरक्षण का फायदा उठा रहे हैं.
आरक्षण हो या न हो इसपर बहस तो बाद में कीजिये पर सबसे पहले ये देखने कि कोशिश करें कि जिस वर्ग को आप ये सुविधा देना चाह रहे हैं क्या वो इनसे लाभान्वित हो रहे हैं. आज हम महिला आरक्षण कि बात कर रहे हैं पर ये भी सोचें कि इससे किन महिलाओं को लाभ होगा? शायद मैं इन नेताओं कि जानकारी के लिए बता दूं कि भारत कि 15 साल से उपर कि महिलाओं में करीब 40% अभी तक अशिक्षित हैं. मेरे विचार में पहले हम इन्हें शिक्षित करें फिर इनके आरक्षण कि बात करें तो बेहतर होगा. वरना फिर से ये महिलाएं बिकास से कोसों दूर रह जाएँगी और फायदा होगा उन्ही फायदेमंद लोगों को और अगर सिर्फ राजनीति ही करनी है तो कोई बात नहीं. फिर क्या फर्क पड़ता है कि कौन लाभान्वित हो रहा है और कौन नहीं.
पर मेरा नम्र निवेदन है उन तमाम राजनेताओं से कि आप लोग बड़े भाग्यशाली हैं कि आपको देश कि सेवा का मौका मिला है. जनता सैकड़ों सपने बुन कर आपको वहां तक पहुंचाती है तो कृपया कुछ ऐसा न करें कि लोकतंत्र शर्मशार हो. क्यूँ न आप कुछ ऐसा करें कि हम जनता को फक्र महसूस हो और हम गर्व से कह सकें कि इन्हें हमने वोट किया है.
मैं मुलायम सिंह जी से पूछना चाहूँगा कि इस तरह का बयान देते समय उन्होंने ये नहीं सोचा कि अगर उनकी पुत्रवधू जो राज बब्बर से चुनाव हार गयी, वो अगर संसद में होती और ऐसी हरकत हो जाये तो उन्हें कैसा लगेगा. इस तरह के शब्दों के प्रयोग के लिए मैं आप सबसे माफ़ी मांगता हूँ, पर लोगों को हर चीज़ पहले अपने ऊपर ले कर सोचना चाहिए, तब कुछ कहना चाहिए. जो बात आपके लिए बुरी है वही बात दूसरों के लिए भी तो बुरी हो सकती है. इस तरह का बयान देने वाला व्यक्ति किसी प्रदेश का मुख्यमंत्री कैसे हो सकता है. मैं तो समझता हूँ कि देश के सबसे बड़ी विडम्बना थी जब ये हमारे रक्षा मंत्री बने थे. जो व्यक्ति महिलाओं के बारे में ऐसा सोचता हो वो उनकी रक्षा के बारे में क्या सोचेगा.
मुलायम सिंह जी, समाजवादी कि राजनीति करने वाले हैं. जब देखो समाजवाद का ढोंग करके अपने पूरे कुनबे को पार्टी के महत्वपूर्ण पदों पर आसीन किये हुए हैं. इनकी पूरी पार्टी में कही इनका बेटा है, तो कहीं भाई तो कही पुत्रवधू. ये हैं समाजवादी पार्टी. असल में इसका नाम होना चाहिए समाज के बाद कि पार्टी यानी "परिवारवाद पार्टी".
अब ज़रा आरक्षण कि बात अगर करें तो ये किस आरक्षण का दिखावा कर रहे हैं. सही मायनो में देखा जाये तो इसका फायदा किन वर्गों को होगा, किसी ने नहीं सोचा? बस सभी लगे पड़े हैं अपनी राजनीति करने में. कांग्रेस और भाजपा, महिलाओं को सशक्त बनाने कि बात कर रही हैं आरक्षण के नाम पर, इधर लालू यादव, मुलायम सिंह और शरद यादव उसमे पिछड़ों को आरक्षण देने के मांग कर रहे हैं. यहाँ लोगों को करना कुछ नहीं है बस अपनी राजनीति कि रोटी सेंकनी है.
अब ज़रा हम अब तक चली आ रही आरक्षण व्यवस्था पर अगर नज़र डालें तो एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि सरकार द्वारा दिया जा रहा हरिजन और आदिवासी आरक्षण का फायदा सिर्फ शहर के संभ्रांत परिवार ही उठा रहे हैं. गाँव के हरिजन आदिवासी अभी तक उसी हालत में है. अब इन नेताओं को कौन समझाएगा कि पहले उनके जीवन स्तर को ठीक करने कि बात सोचे. जिस गाँव में स्कूल और कॉलेज नहीं है वहां इसकी व्यवस्था करे. एक अभियान चलाया जाये जिसमे इन्हें बताया जाये इन्हें जागृत किया जाये कि इनका पढ़ा-लिखा होना कितना आवश्यक है. तब इस तरह के आरक्षण का फायदा है और मेरे विचार में सही आरक्षण का आधार यही है. आरक्षण का मतलब होना चाहिए कि ऐसे ही लोगों को मुख्य धरा में लाना जो इन सबसे कोसों दूर हैं. न कि वो लोग जो संभ्रांत होते हुए भी अभी तक इस आरक्षण का फायदा उठा रहे हैं.
आरक्षण हो या न हो इसपर बहस तो बाद में कीजिये पर सबसे पहले ये देखने कि कोशिश करें कि जिस वर्ग को आप ये सुविधा देना चाह रहे हैं क्या वो इनसे लाभान्वित हो रहे हैं. आज हम महिला आरक्षण कि बात कर रहे हैं पर ये भी सोचें कि इससे किन महिलाओं को लाभ होगा? शायद मैं इन नेताओं कि जानकारी के लिए बता दूं कि भारत कि 15 साल से उपर कि महिलाओं में करीब 40% अभी तक अशिक्षित हैं. मेरे विचार में पहले हम इन्हें शिक्षित करें फिर इनके आरक्षण कि बात करें तो बेहतर होगा. वरना फिर से ये महिलाएं बिकास से कोसों दूर रह जाएँगी और फायदा होगा उन्ही फायदेमंद लोगों को और अगर सिर्फ राजनीति ही करनी है तो कोई बात नहीं. फिर क्या फर्क पड़ता है कि कौन लाभान्वित हो रहा है और कौन नहीं.
पर मेरा नम्र निवेदन है उन तमाम राजनेताओं से कि आप लोग बड़े भाग्यशाली हैं कि आपको देश कि सेवा का मौका मिला है. जनता सैकड़ों सपने बुन कर आपको वहां तक पहुंचाती है तो कृपया कुछ ऐसा न करें कि लोकतंत्र शर्मशार हो. क्यूँ न आप कुछ ऐसा करें कि हम जनता को फक्र महसूस हो और हम गर्व से कह सकें कि इन्हें हमने वोट किया है.
रविवार, 21 मार्च 2010
दलित या दौलत
माया चाहे दौलत की हो या दलितों की, ये हमेशा मायावी ही होती है. ये मुझे पिछले 15 मार्च को पता चला जब दलितों की माया ने अपनी एक विराट रैली में दौलत की माया का रूप धारण किया. वैसे एक ज़माना था जब मैं भी कांशी राम को दलितों का मसीहा समझता था. उन्होंने दलितों के जीवन स्तर को सुधारने का अनवरत प्रयास किया. शायद उन्ही की मेहनत की वजह से आज मायावती दौलत की माया बन गयी हैं और वो संघर्ष करते हुए इस दुनिया से चले गए. लेकिन इन्हें ये पता नहीं है की ये अगर माया हैं, तो जनता दौलत से भी ज्यादा मायावी है.
जिस दिन मायावती करोड़ों रुपये कि माला धारण करके लखनऊ में अपनी सभा संबोधित कर रही थी उस दिन उन्हें ज़रा भी याद नहीं रहा कि ये शायद उनके प्रदेश का सबसे काला दिन है क्यूँकि उन दिनों बरेली में दंगे हो रहे थे. बरेली कि जनता कर्फ्यू के साए में जी रही थी. एक तरफ लखनऊ नीली रौशनी से जगमगा रहा था वही दूसरी ओर बरेली में अजीब सा सन्नाटा पड़ा हुआ था. पर इन्हें क्या मतलब ये तो अपनी रैली करेंगी. रैली में जहाँ 200 करोड़ रुपये खर्च हुए तो शायद इन पैसों से बरेली के कई उजड़े हुए घर आबाद हो सकते थे. लेकिन इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता क्यूँकि चुनाव अभी बहुत दूर है.
अगर यहाँ सिर्फ मायावती की ही बात कही जाए तो इनकी पहचान क्या है? देश इन्हें किस रूप में जानता है, कि ये देश के बहुत बड़े राज्य उत्तर प्रदेश कि मुख्य मंत्री हैं? मैं समझता हूँ कि इससे पहले देश इन्हें दलितों के बहुत बड़े नेता के रूप में जानता है. ये देश कि एक ऐसी नेता हैं जो दलितों का प्रतिनिधित्व करती हैं और इन्ही सब चीज़ को भुना के आज ये उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री बन गयी. पर इनके मुख्य मंत्रित्व काल में उत्तर प्रदेश के दलितों के हालत के बारे में मेरे पास कुछ जानकारियां हैं जो आपके समक्ष बांटना चाहता हूँ. ये सारी घटनाएँ 2008-2009 के बीच कि ही हैं-
फरवरी 26 को इटावा के एक थानेमें मामला दर्ज हुआ है कि "एक आठ साल कि दलित लड़की को 280 रूपया चुराने के इलज़ाम में बालों से घसीट कर थानेमें लाया गया, और देश के सभी न्यूज़ चैनेल पर लोगों ने इसे देखा था.
दिसम्बर 9,2009 को एक और मामला सामने आया जिसमे चार लोगों ने एक सत्तर साल कि दलित महिला का बलात्कार किया था. उसके बेटे और बहु को पैरों में गोली मार दिया गया क्यूंकि वो इस महिला को बचाने कि कोशिश कर रहे थे.
फरवरी 10, 2009 का एक और मामला है जिसमे बंद जिला के गिरवान गाँव में एक सात साल के दलित लड़की का बलात्कार हुआ.
इस तरह से अगर मैं एक दलित मुख्य मंत्री के शासनकाल का विवरण देना शुरू कर दूंगा तो आप स्तब्ध रह जायेंगे और सोचने पर मजबूर हो जायेंगे कि क्या एक दलित महिला का प्रदेश कि मुख्य मंत्री होने के बाद भी दलित महिलाओं पर इतना अत्यचार कैसे हो रहा है? इसके पीछे बस एक ही कारण है, कि मायावती की माया दलितों के लिए बस वोट लेने तक ही है और अब ये दौलत कि माया बन गयी है. मानवाधिकार आयोग के रिपोर्ट में तो यहाँ तक कहा गया है कि गत दिनों जितने भी केस दर्ज हुए हैं उनमे अधिकतम दलित अत्याचार के ऊपर ही हैं. लेकिन मायावती जी को यह सब जानने समझने कि फुर्सत कहाँ है. मैं तो बस इतना जानता हूँ कि संसार में बस दो जातियां होती है. एक पैसेवालों कि दूसरी गरीबों की. इसलिए मैं उत्तर प्रदेश कि अवाम को सचेत करना चाहता हूँ कि जो भी गरीब या दलित मायावती जी के भरोसे हैं अब उन्हें भूल जाएँ. क्यूंकि मायावती जी ने अब अपनी जाति बदल ली है.
रैली में मायावती ने जिन नोटों कि माला पहनी है, कहा जाता है कि ये करीब पांच करोड़ कि माला बनी थी जिसमे सभी हज़ार हज़ार के नोट लगे हुए थे. मैं यहाँ ये जानना चाहता हूँ कि क्या सरकार जांच कर रही है कि ये पैसे कहाँ से आये हैं? बताया जाता है कि माला को खूबसूरत बनाने के लिए इसके किनारों को लाल रंग से रंगा गया था. क्या आर. बी. आई. के तहत इनपर मुकदमा नहीं चलना चाहिए. क्यूंकि जहाँ तक मेरी जानकारी कहती है कि अगर आप नोट पर कुछ लिखते हैं या किसी अन्य तरीकों से भी इसकी वर्तमान अवस्था को भिन्न करने कि कोशिश कि जाती है तो ये संगीन अपराध माना जाता है.
वैसे इन सब से मैडम मायावती को क्या फर्क पड़ता है. अगर एक ब्यौरा इनकी संपत्ति पर डाले तो खुद मैं आश्चर्य चकित हो जाता हूँ. सीबीआई कि चार्जशीट के हिसाब से मायावती के पास 74 प्रोपर्टी खेती वाली ज़मीन इनके परिवार वालों के नाम से हैं, 16 अवासीय प्लाट हैं, 5 जंगल के लिए ज़मीन है साथ ही 2 दुकाने और 3 बगीचा है. जिसकी कीमत अंदाज़न 6.93 करोड़ आंकी गयी है. इसके अलावा 12.98 करोड़ रुपये इनके पास दान के द्वारा करीब 130 दानदाताओं से मिले थे पर सीबीआई को बड़ी मेहनत करने के बाद सिर्फ 30 दानदाता ही मिले हैं. एक बात आपको मैं यहाँ और बताना चाहूँगा कि मायावती जी का दिल्ली के महरोली में करीब चार एकड़ का प्लाट है जिसकी कीमत इन्होने 10लाख रुपये कागजों में दिखाया है. तो आप खुद ही इससे ऊपर 6.93 करोड़ आंकड़े का मतलब समझ सकते हैं अगर महरोली कि ज़मीन १०लाख कि है तो.
अंततः मैं वापस राजनीति कि उसी दहलीज पर पहुँच गया हूँ और सोचने पर मजबूर हो गया हूँ कि क्या है इस राजनीति का भविष्य? सच कहूँ तो मुझे कोई जवाब नहीं मिल रहा है. क्या हम ऐसे ही चुप बैठ कर तमाशा देखते रहेंगे, या मैं बस अपना ब्लॉग लिख कर ही खुश होता रहूँगा कि चलो मेरा तो काम पूरा हो गया? फिर मैं सोचता हूँ, कि नहीं एक दिन आएगा जब सिर्फ इसपर बहस नहीं होगी बल्कि इसे सुधारने हम और आप आगे आएंगे. तो शायद अब इंतजार इसी बात का है कि पानी नाक से ऊपर हो जाए.....
जिस दिन मायावती करोड़ों रुपये कि माला धारण करके लखनऊ में अपनी सभा संबोधित कर रही थी उस दिन उन्हें ज़रा भी याद नहीं रहा कि ये शायद उनके प्रदेश का सबसे काला दिन है क्यूँकि उन दिनों बरेली में दंगे हो रहे थे. बरेली कि जनता कर्फ्यू के साए में जी रही थी. एक तरफ लखनऊ नीली रौशनी से जगमगा रहा था वही दूसरी ओर बरेली में अजीब सा सन्नाटा पड़ा हुआ था. पर इन्हें क्या मतलब ये तो अपनी रैली करेंगी. रैली में जहाँ 200 करोड़ रुपये खर्च हुए तो शायद इन पैसों से बरेली के कई उजड़े हुए घर आबाद हो सकते थे. लेकिन इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता क्यूँकि चुनाव अभी बहुत दूर है.
अगर यहाँ सिर्फ मायावती की ही बात कही जाए तो इनकी पहचान क्या है? देश इन्हें किस रूप में जानता है, कि ये देश के बहुत बड़े राज्य उत्तर प्रदेश कि मुख्य मंत्री हैं? मैं समझता हूँ कि इससे पहले देश इन्हें दलितों के बहुत बड़े नेता के रूप में जानता है. ये देश कि एक ऐसी नेता हैं जो दलितों का प्रतिनिधित्व करती हैं और इन्ही सब चीज़ को भुना के आज ये उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री बन गयी. पर इनके मुख्य मंत्रित्व काल में उत्तर प्रदेश के दलितों के हालत के बारे में मेरे पास कुछ जानकारियां हैं जो आपके समक्ष बांटना चाहता हूँ. ये सारी घटनाएँ 2008-2009 के बीच कि ही हैं-
फरवरी 26 को इटावा के एक थानेमें मामला दर्ज हुआ है कि "एक आठ साल कि दलित लड़की को 280 रूपया चुराने के इलज़ाम में बालों से घसीट कर थानेमें लाया गया, और देश के सभी न्यूज़ चैनेल पर लोगों ने इसे देखा था.
दिसम्बर 9,2009 को एक और मामला सामने आया जिसमे चार लोगों ने एक सत्तर साल कि दलित महिला का बलात्कार किया था. उसके बेटे और बहु को पैरों में गोली मार दिया गया क्यूंकि वो इस महिला को बचाने कि कोशिश कर रहे थे.
फरवरी 10, 2009 का एक और मामला है जिसमे बंद जिला के गिरवान गाँव में एक सात साल के दलित लड़की का बलात्कार हुआ.
इस तरह से अगर मैं एक दलित मुख्य मंत्री के शासनकाल का विवरण देना शुरू कर दूंगा तो आप स्तब्ध रह जायेंगे और सोचने पर मजबूर हो जायेंगे कि क्या एक दलित महिला का प्रदेश कि मुख्य मंत्री होने के बाद भी दलित महिलाओं पर इतना अत्यचार कैसे हो रहा है? इसके पीछे बस एक ही कारण है, कि मायावती की माया दलितों के लिए बस वोट लेने तक ही है और अब ये दौलत कि माया बन गयी है. मानवाधिकार आयोग के रिपोर्ट में तो यहाँ तक कहा गया है कि गत दिनों जितने भी केस दर्ज हुए हैं उनमे अधिकतम दलित अत्याचार के ऊपर ही हैं. लेकिन मायावती जी को यह सब जानने समझने कि फुर्सत कहाँ है. मैं तो बस इतना जानता हूँ कि संसार में बस दो जातियां होती है. एक पैसेवालों कि दूसरी गरीबों की. इसलिए मैं उत्तर प्रदेश कि अवाम को सचेत करना चाहता हूँ कि जो भी गरीब या दलित मायावती जी के भरोसे हैं अब उन्हें भूल जाएँ. क्यूंकि मायावती जी ने अब अपनी जाति बदल ली है.
रैली में मायावती ने जिन नोटों कि माला पहनी है, कहा जाता है कि ये करीब पांच करोड़ कि माला बनी थी जिसमे सभी हज़ार हज़ार के नोट लगे हुए थे. मैं यहाँ ये जानना चाहता हूँ कि क्या सरकार जांच कर रही है कि ये पैसे कहाँ से आये हैं? बताया जाता है कि माला को खूबसूरत बनाने के लिए इसके किनारों को लाल रंग से रंगा गया था. क्या आर. बी. आई. के तहत इनपर मुकदमा नहीं चलना चाहिए. क्यूंकि जहाँ तक मेरी जानकारी कहती है कि अगर आप नोट पर कुछ लिखते हैं या किसी अन्य तरीकों से भी इसकी वर्तमान अवस्था को भिन्न करने कि कोशिश कि जाती है तो ये संगीन अपराध माना जाता है.
वैसे इन सब से मैडम मायावती को क्या फर्क पड़ता है. अगर एक ब्यौरा इनकी संपत्ति पर डाले तो खुद मैं आश्चर्य चकित हो जाता हूँ. सीबीआई कि चार्जशीट के हिसाब से मायावती के पास 74 प्रोपर्टी खेती वाली ज़मीन इनके परिवार वालों के नाम से हैं, 16 अवासीय प्लाट हैं, 5 जंगल के लिए ज़मीन है साथ ही 2 दुकाने और 3 बगीचा है. जिसकी कीमत अंदाज़न 6.93 करोड़ आंकी गयी है. इसके अलावा 12.98 करोड़ रुपये इनके पास दान के द्वारा करीब 130 दानदाताओं से मिले थे पर सीबीआई को बड़ी मेहनत करने के बाद सिर्फ 30 दानदाता ही मिले हैं. एक बात आपको मैं यहाँ और बताना चाहूँगा कि मायावती जी का दिल्ली के महरोली में करीब चार एकड़ का प्लाट है जिसकी कीमत इन्होने 10लाख रुपये कागजों में दिखाया है. तो आप खुद ही इससे ऊपर 6.93 करोड़ आंकड़े का मतलब समझ सकते हैं अगर महरोली कि ज़मीन १०लाख कि है तो.
अंततः मैं वापस राजनीति कि उसी दहलीज पर पहुँच गया हूँ और सोचने पर मजबूर हो गया हूँ कि क्या है इस राजनीति का भविष्य? सच कहूँ तो मुझे कोई जवाब नहीं मिल रहा है. क्या हम ऐसे ही चुप बैठ कर तमाशा देखते रहेंगे, या मैं बस अपना ब्लॉग लिख कर ही खुश होता रहूँगा कि चलो मेरा तो काम पूरा हो गया? फिर मैं सोचता हूँ, कि नहीं एक दिन आएगा जब सिर्फ इसपर बहस नहीं होगी बल्कि इसे सुधारने हम और आप आगे आएंगे. तो शायद अब इंतजार इसी बात का है कि पानी नाक से ऊपर हो जाए.....
सोमवार, 22 फ़रवरी 2010
रो पड़ी डा. राजेंद्र प्रसाद की आत्मा .......
जीरादेई, बिहार के सीवान जिले का एक छोटा सा गाँव. ये एक ऐसा गाँव है जिसने देश को प्रथम राष्ट्रपति दिया. शायद यह गाँव उसी दिन इतिहास के पन्नों में चला गया. डा. राजेंद्र प्रसाद भारत के प्रथम राष्ट्रपति बने और उसी दिन से ये बिहार के एक पवित्र गाँव में इसकी गिनती शुरू हो गयी. लोगों का मानना था की कुछ तो बात है यहाँ की मिट्टी में की ऐसी विलक्षण प्रतिभा का जन्म यहाँ हुआ है. राजेंद्र बाबू ने जीरादेई का नाम पूरे भारतवर्ष में ऊँचा किया.
पर कुछ दिनों पहले जीरादेई एक बार फिर लोगों के सामने आया. यह गाँव एक बार फिर से लोगों के आकर्षण का केंद्र बना, पर मैं समझ नहीं पाया कि यह कौन सी प्रतिभा थी. असल में पिछले दिनों बिहार कि राजधानी पटना में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने "महादलित रैली" का आयोजन करवाया था. इसी सिलसिले में भाग लेने जीरादेई से कुछ लोग आये हुए थे जो वही के विधायक "श्याम बहादुर सिंह" के सरकारी आवास पर ठहरे हुए थे और पवित्र ग्राम "जीरादेई" के विधायक ने अपने लोगों के मनोरंजन के लिए "बार बालाओं" के नाच का भी कार्यक्रम रखा था. चलिए यहाँ तक तो किसी को शायद कोई आपत्ति नहीं होगी. लेकिन जब आधी रात के बाद विधायक जी पर शराब का नशा उनके सर चढ़ के बोलने लगा तो अपनी मर्यादा भूल कर आ गए वो भी "बार बालाओं" के साथ मैंदान में. वो भी लगे उनके साथ ठुमके लगाने. उनके उस अशलील ठुमकों को देख कर मुझे अपनी आँखों पर यकीं नहीं हो रहा था कि ये जीरादेई जैसे पवित्र भूमी का प्रतिनिधित्व करते हैं और प्रेस के सामने विधायक जी कह रहे हैं कि "बुरा न मानो होली है" मैंने सोचा की शराब के नशे के साथ अगर सत्ता का भी नशा किसी के ऊपर चढ़ जाये तो इसका अंजाम यही होता है. सत्ता का नशा तो अच्छे अच्छों को बहका देता है.
अगर डा. राजेंद्र प्रसाद की आत्मा यह सब देख रही होगी तो वो भी फूट फूट कर रो रही होगी और सोच रही होगी कि "क्या इसी लोकतंत्र के लिए हम अंग्रेजों से लड़े थे." जीरादेई तो एक छोटा सा उदाहरण है आप सबों के सामने, लोकतंत्र का मज़ाक तो देश के हर हिस्से में अलग अलग तरीके से हमारे ये नेता उड़ा रहे हैं. क्या हम यूँ ही ये सब देखते रहेंगे? जितने भी नियम क़ानून बनते हैं वो हम आम जनता के लिए होता है. पर इनके लिए ये कुछ नहीं होता. अगर कोई सरकारी पदाधिकारी ये दुस्साहस करता तो अब तक उसे उसके पद से निष्कासित कर दिया गया होता पर इनको कौन कहेगा?
आप ही सोचिये किसी भी ऑफिस को चपरासी भी चाहिए तो कम से कम दसवी पास की योग्यता रखी जाती है. लेकिन जो आपका देश चला रहा है, आपके लिए नियम क़ानून निर्धारित कर रहा है, उस पद पर जाने की क्या योग्यता है, बस अंगूठा छाप? कितनी निंदनीय व्यवस्था है, मेरी समझ से अब वक्त आ गया है की इस पर बहस छिड़ना चाहिए, लोगों को इसके बारे में सोचना चाहिए. एक चीज़ मैं यहाँ और बता देना चाहता हूँ कि अगर इस इंतज़ार में मत रहिएगा कि ये नेता इस बारे में कुछ सोचेंगे तो ये तो कभी नहीं होगा, क्यूंकि इससे इनकी कुर्सी हिल जाएगी. इसलिए हमें आगे आना होगा. तभी इस देश का दुर्भाग्य बदलेगा.
पर कुछ दिनों पहले जीरादेई एक बार फिर लोगों के सामने आया. यह गाँव एक बार फिर से लोगों के आकर्षण का केंद्र बना, पर मैं समझ नहीं पाया कि यह कौन सी प्रतिभा थी. असल में पिछले दिनों बिहार कि राजधानी पटना में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने "महादलित रैली" का आयोजन करवाया था. इसी सिलसिले में भाग लेने जीरादेई से कुछ लोग आये हुए थे जो वही के विधायक "श्याम बहादुर सिंह" के सरकारी आवास पर ठहरे हुए थे और पवित्र ग्राम "जीरादेई" के विधायक ने अपने लोगों के मनोरंजन के लिए "बार बालाओं" के नाच का भी कार्यक्रम रखा था. चलिए यहाँ तक तो किसी को शायद कोई आपत्ति नहीं होगी. लेकिन जब आधी रात के बाद विधायक जी पर शराब का नशा उनके सर चढ़ के बोलने लगा तो अपनी मर्यादा भूल कर आ गए वो भी "बार बालाओं" के साथ मैंदान में. वो भी लगे उनके साथ ठुमके लगाने. उनके उस अशलील ठुमकों को देख कर मुझे अपनी आँखों पर यकीं नहीं हो रहा था कि ये जीरादेई जैसे पवित्र भूमी का प्रतिनिधित्व करते हैं और प्रेस के सामने विधायक जी कह रहे हैं कि "बुरा न मानो होली है" मैंने सोचा की शराब के नशे के साथ अगर सत्ता का भी नशा किसी के ऊपर चढ़ जाये तो इसका अंजाम यही होता है. सत्ता का नशा तो अच्छे अच्छों को बहका देता है.
अगर डा. राजेंद्र प्रसाद की आत्मा यह सब देख रही होगी तो वो भी फूट फूट कर रो रही होगी और सोच रही होगी कि "क्या इसी लोकतंत्र के लिए हम अंग्रेजों से लड़े थे." जीरादेई तो एक छोटा सा उदाहरण है आप सबों के सामने, लोकतंत्र का मज़ाक तो देश के हर हिस्से में अलग अलग तरीके से हमारे ये नेता उड़ा रहे हैं. क्या हम यूँ ही ये सब देखते रहेंगे? जितने भी नियम क़ानून बनते हैं वो हम आम जनता के लिए होता है. पर इनके लिए ये कुछ नहीं होता. अगर कोई सरकारी पदाधिकारी ये दुस्साहस करता तो अब तक उसे उसके पद से निष्कासित कर दिया गया होता पर इनको कौन कहेगा?
आप ही सोचिये किसी भी ऑफिस को चपरासी भी चाहिए तो कम से कम दसवी पास की योग्यता रखी जाती है. लेकिन जो आपका देश चला रहा है, आपके लिए नियम क़ानून निर्धारित कर रहा है, उस पद पर जाने की क्या योग्यता है, बस अंगूठा छाप? कितनी निंदनीय व्यवस्था है, मेरी समझ से अब वक्त आ गया है की इस पर बहस छिड़ना चाहिए, लोगों को इसके बारे में सोचना चाहिए. एक चीज़ मैं यहाँ और बता देना चाहता हूँ कि अगर इस इंतज़ार में मत रहिएगा कि ये नेता इस बारे में कुछ सोचेंगे तो ये तो कभी नहीं होगा, क्यूंकि इससे इनकी कुर्सी हिल जाएगी. इसलिए हमें आगे आना होगा. तभी इस देश का दुर्भाग्य बदलेगा.
शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010
ख़त्म हो रहा बचपन.............
आज एक अजीब से दुर्घटना मेरे साथ हुई. आज दिन के करीब २बजे के आस-पास मैं नॉएडा के मार्केट सेक्टर-18 गया हुआ था. उस बाज़ार में मैं बड़े आराम से अपनी मोटर साईकिल चला रहा था. आगे जा कर मुझे दाएँ मुड़ना था कि मैंने देखा एक कार दनदनाती हुई आई और दायी तरफ मुड गयी मैंने अपनी मोटर साइकिल में ब्रेक लगाया. मैं कुछ समझ ही पाता कि अचानक वो कार उसी स्पीड में दनदनाती हुई पीछे कि तरफ आने लगी. मुझे लग गया कि अब धक्का लगने वाला है और एक जोर कि वहां आवाज़ आई "धडाम " और कार ने पीछे से मेरी मोटर साइकिल में धक्का मार दिया. ये सब कुछ इतनी रफ़्तार में हुआ कि मुझे कुछ समझने का मौका ही नहीं मिला. उसके बाद का नज़ारा यही था कि मेरी मोटर साइकिल अचेता अवस्था में लेटा पड़ा था और मैं बगल में खड़ा हो कर उसे निहार रहा था. मुझे बहुत जोर का गुस्सा आया कि ये क्या तरीका है गाडी चलाने का. मैं बहुत गुस्से में गाडी कि तरफ जा कर शीशे पर ड्राईवर को बाहर निकलने का इशारा किया . पर जब मैंने ड्राईवर को देखा तो मैं स्तब्ध रह गया, एक लड़की स्कूल ड्रेस में बाहर निकली. उसे देख कर ऐसा लगा की मुश्किल से वो आठवीं या नवमी क्लास की छात्रा होगी. बाहर निकलते ही अंग्रेजी के कुछ शब्द, अमूमन जो ऐसे मौके पे लोग छोड़ना पसंद करते हैं, वही शब्द कई बार मेरे ऊपर पर छोड़े जा रहे थे. जैसे कि sorry, sorry i am extremely sorry, i m realy sorry. पर मुझे ये समझ नहीं आ रहा था कि इस बच्चे को मैं क्या कहूँ? शायद इसे देख कर मेरा गुस्सा काफूर हो चूका था. मुझे समझ नहीं आ रहा था जिन बच्चे के हाथ माँ-बाप कि उंगलिया पकड़ने वाले हैं उनके हाथ में इतनी लम्बी कार के स्टेरिंग किसने दिया.
सच बताऊँ तो इस दुर्घटना के कई घंटे बीत चुके हैं, लेकिन मैं अभी तक आत्म मंथन में लगा हुआ हूँ कि इस दुर्घटना का दोष मैं किसे दूं, इस बच्चे को जो गाडी चला रही थी या इनके माता-पिता को जिन्हें ये पता ही नहीं है कि उनके बच्चे कहाँ हैं और वो क्या कर रहे हैं. असल में जितने भी मेट्रो शहर हैं वहां सब जगह एक अंधी दौड़ मची पड़ी है. कोई पैसे के लिए भाग रहा है, तो कोई नाम के लिए, तो किसी को किसी से आगे निकलना है. इस अंधी दौड़ में लोग अपने परिवार को भूल गए हैं. हर किसी के दायरे सिमटते जा रहे हैं. उनके बच्चे कहाँ है और क्या कर रहे हैं किसी को कुछ भी नहीं पता होता है.
वो लड़की जो कार ले कर बाज़ार में निकली थी तो हो सकता है उसके माता-पिता को पता भी न हो कि उनकी बेटी आज कार से स्कूल गयी है और अभी बाज़ार में घूम रही है. या ये भी हो सकता है कि माता-पिता ने कार दिया हो कि उसे कही लाने ले जाने का झंझट ही न रहे. इसमें आप क्या कहेंगे इसमें दोष उस लड़की का है या उनके माता-पिता का जिनके पास इतना भी वक़्त नहीं है कि अपने बच्चों के बारे में पता कर सके. माता-पिता यह समझते हैं कि बच्चों को अगर हम समय पर पैसे दे दें तो हमारी जिम्मेदारी ख़तम हो गयी. पर ऐसा नहीं है. पहली बात, कि आपको अपने बच्चों के लिए समय निकलना पड़ेगा. दूसरी बात, कि ये उम्र का ऐसा पड़ाव होता है जब हर कोई इस उम्र में हर सीमा लांघना चाहता है. पर घर के बड़ों का काम होता है उन सीमाओं कि मर्यादा को बताना. मुझे यहाँ स्कूल के बच्चों को देख कर कभी-कभी शर्म सी आती है पर इसमें मैं दोष किसे दूं?
बचपन में मैं सुना था कि बच्चों का मन बिलकुल कुम्हार की कच्ची मिटटी के सामान होता है इसे हम जैसा आकार देना चाहें दे सकते हैं. अगर ये जो कुम्हार रूपी माता-पिता अपनी कच्ची मिटटी को खुद आकार देने कि कोशिश करेंगे तो उनकी मिटटी का बर्तन निश्चित तौर पर अच्छा ही बनेगा. बस ध्यान रहे कि किसी कुम्हार को किराये पर ला कर अपनी मिटटी उन्हें ना सौंप दें. वरना फिर उस मिटटी का बर्तन वैसा ही बनेगा जैसा आज मुझे मिला था......
सच बताऊँ तो इस दुर्घटना के कई घंटे बीत चुके हैं, लेकिन मैं अभी तक आत्म मंथन में लगा हुआ हूँ कि इस दुर्घटना का दोष मैं किसे दूं, इस बच्चे को जो गाडी चला रही थी या इनके माता-पिता को जिन्हें ये पता ही नहीं है कि उनके बच्चे कहाँ हैं और वो क्या कर रहे हैं. असल में जितने भी मेट्रो शहर हैं वहां सब जगह एक अंधी दौड़ मची पड़ी है. कोई पैसे के लिए भाग रहा है, तो कोई नाम के लिए, तो किसी को किसी से आगे निकलना है. इस अंधी दौड़ में लोग अपने परिवार को भूल गए हैं. हर किसी के दायरे सिमटते जा रहे हैं. उनके बच्चे कहाँ है और क्या कर रहे हैं किसी को कुछ भी नहीं पता होता है.
वो लड़की जो कार ले कर बाज़ार में निकली थी तो हो सकता है उसके माता-पिता को पता भी न हो कि उनकी बेटी आज कार से स्कूल गयी है और अभी बाज़ार में घूम रही है. या ये भी हो सकता है कि माता-पिता ने कार दिया हो कि उसे कही लाने ले जाने का झंझट ही न रहे. इसमें आप क्या कहेंगे इसमें दोष उस लड़की का है या उनके माता-पिता का जिनके पास इतना भी वक़्त नहीं है कि अपने बच्चों के बारे में पता कर सके. माता-पिता यह समझते हैं कि बच्चों को अगर हम समय पर पैसे दे दें तो हमारी जिम्मेदारी ख़तम हो गयी. पर ऐसा नहीं है. पहली बात, कि आपको अपने बच्चों के लिए समय निकलना पड़ेगा. दूसरी बात, कि ये उम्र का ऐसा पड़ाव होता है जब हर कोई इस उम्र में हर सीमा लांघना चाहता है. पर घर के बड़ों का काम होता है उन सीमाओं कि मर्यादा को बताना. मुझे यहाँ स्कूल के बच्चों को देख कर कभी-कभी शर्म सी आती है पर इसमें मैं दोष किसे दूं?
बचपन में मैं सुना था कि बच्चों का मन बिलकुल कुम्हार की कच्ची मिटटी के सामान होता है इसे हम जैसा आकार देना चाहें दे सकते हैं. अगर ये जो कुम्हार रूपी माता-पिता अपनी कच्ची मिटटी को खुद आकार देने कि कोशिश करेंगे तो उनकी मिटटी का बर्तन निश्चित तौर पर अच्छा ही बनेगा. बस ध्यान रहे कि किसी कुम्हार को किराये पर ला कर अपनी मिटटी उन्हें ना सौंप दें. वरना फिर उस मिटटी का बर्तन वैसा ही बनेगा जैसा आज मुझे मिला था......
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