बिहार के मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार का नाम जनता ने आज बदल कर सुशासन कुमार रख दिया है. क्यूंकि चारो ओर खुशहाली और हरियाली दिख रही है. पर आज मैंने इसी सुशासन कुमार के राज्य का एक तालिबानी विडियो क्लिप किसी न्यूज़ चैनल पर देखा, जिसने मेरे रौंगटे खड़े कर दिए. इस क्लिप को देखने बाद से मुझे समझ नहीं आ रहा है कि मैं मुख्यमंत्री का नामकरण सुशासन कुमार करूं या फिर कुशासन कुमार? इस क्लिप में हाल ही में अररिया, फारवीसगंज में हुए गोलीकांड के बाद का जिक्र है. जिसमे एक पुलिसवाला 16-17 साल के बेहोश पड़े हुए बच्चे के चेहरे पर घुटने के बल कूद जाता है. फिर अपने बूट से उसके सर पर निर्मम वार करता है. अब इससे भी मन नहीं भरा तो अपने साथी से डंडा मांगने लगता है, जिसे उसके साथी ने मना कर दिया. सच में अगर आपने वो विडियो क्लिप देख लिया तो आपका खून खुल उठेगा इस सरकार के खिलाफ. http://aajtak.intoday.in/videoplay.php/videos/view/57589/2/206/what-should-be-name-of-this-barbaric-act.html
जी हाँ यहाँ मैंने वेब एड्रेस डाला है इस URL को आप कॉपी पेस्ट करके वो विडियो क्लिप देख सकते हैं.
जब मैंने ये देखा तो इस खबर को विस्तार से जानने के लिए मैंने जांच-पड़ताल शुरू कर दी, तो पता चला कि ये ज़मीन अधिग्रहण का मामला है. सरकार ने ओरो सुंदरम इंटरनेशनल प्रा. लि. को एक फैक्ट्री लगाने के लिए ज़मीन बेचीं थी. पर जो ज़मीन फैक्ट्री को दी गयी वो गांव आने जाने का एकमात्र सार्वजनिक रास्ता है जिस पर कई सरकारी निधियों द्वारा सड़क निर्माण के नाम पर पैसा लगाया जा चूका है. जिससे गांववाले उसी रास्ते से गांव कि अन्दर बाहर जाते थे और इसी का विरोध गांव वालों ने किया. पर सुशासन सरकार ने गाँव वालों के विरोध के खिलाफ जो पुलिसिया कारवाई की वो बेहद शर्मनाक थी. सरकार ने तो इंदिरा सरकार के आपातकाल दौर को भी पीछे छोड़ दिया, जिसका एक अंश आप उस विडियो क्लिप में भी देख सकते हैं. वहां पुलिस द्वारा ज़बरदस्त गोलीबारी की गयी जिसमे सरकारी आंकड़ों के हिसाब से चार लोगों की मौत हो गयी. अब सवाल ये उठता है कि गलत ज़मीन क्यूँ सरकार द्वारा बेचीं गयी और जब गाँव वालों ने विरोध किया तो ये तालिबान की तरह पुलिसिया कारवाई क्यूँ कि गयी? कहीं इसमें सरकार या फिर सरकार में शामिल किसी का स्वार्थ तो नहीं छिपा हुआ था? जी हाँ, ओरो सुंदरम इंटरनेशनल प्रा. लि. के निदेशक अशोक चौधरी हैं और इसमें भाजपा के विधान पार्षद अशोक अग्रवाल के पुत्र सौरभ अग्रवाल भी साझेदार हैं. तो अब सवाल ये उठता है कि कही ये कारवाई सरकार इशारे पर तो नहीं हुई?
खैर इसमें साझेदार जो भी है पर सबसे बड़ा सवाल ये है कि नंदीग्राम के बराबर का ये कांड था पर बिहार कि मीडिया में इस खबर को कितनी प्रमुखता से छापा गया? बिहार के तीन-चार प्रमुख और चर्चित अखबार हैं, जिसमे फारविसगंज की खबर को प्रमुखता से नहीं बस एक सूचना के तौर पर जगह मिली. चाहे वो, दैनिक हिन्दुस्तान हो, चाहे दैनिक जागरण या फिर प्रभात खबर. अगर घटना के दुसरे दिन रविवार 5 जून का अखबार आप देखंगे तो पाएंगे कि बड़े अखबारों हिन्दुस्तान और दैनिक जागरण के पटना संस्करण के पहले पन्ने पर फारबिसगंज पुलिस गोलीबारी से संबंधित कोई खबर ही नहीं थी. इतना ही नहीं शनिवार को उपरोक्त अखबारों में इस गोलीकांड के विरोध में भाकपा (माले) द्वारा निकाले गये प्रतिवाद मार्च की खबर या तो अंदर के पन्नों पर किसी कोने में इस तरह छापी गयी कि मुश्किल से उस पर नजर पड़ती. या फिर इस मार्च को हिंदी अखबारों ने कोई जगह ही नहीं दी. दरअसल बड़े हिंदी अखबारों ने यह दिखाने की पूरी कोशिश की, कि इस बर्बर घटना के बावजूद राजधानी पटना में सब शांति-शांति है. लेकिन लोकतंत्र का ये चौथा स्तम्भ बिहार में इतना पंगु क्यों है, शायद इन्हें लगता है कि अगर जनता को इस बर्बरता के बारे में बताने से बिहार के मीडिया को नियंत्रित करने वाला मुख्यमंत्री सचिवालय नाराज हो जायेगा और वहां से बहने वाले विज्ञापनों के श्रोत सूखने लगेंगे. लेकिन ऐसी सोच इनकी हो गयी है तो लोकतंत्र का स्तम्भ कहलाने का क्या हक है इन्हें?
अगर हम नीतीश सरकार के पिछले छह साल के कार्यकाल पर नज़र डालें तो यह निष्कर्ष निकलता है कि बड़े अखबारों के निष्पक्ष नहीं रहने का यह कोई पहला मामला नहीं है और अंतिम तो बिल्कुल नहीं. फारबिसगंज गोलीबारी की घटना का इन अखबारों ने जिस तरह से कवरेज किया वो इसका एक नया उदाहरण मात्र है. जंगलराज की समाप्ति के बाद आज भी बिहार में पुलिस अत्याचार, भ्रष्टाचार, हत्या, अपहरण, फिरौती, बलात्कार जैसी घटनाएं बड़े पैमाने पर घट रही हैं. पर राजद सरकार में ऐसी ख़बरें प्रमुखता से पहले पन्ने पर आती थी जिसे अब धकेल कर अंदर के पन्नों में भेज दिया गया है या फिर ये खबर बनती ही नहीं है. क्यूंकि इससे इनके सुशासनी दावों कि पोल खुल जाएगी और अगर अखबार सरकार की पोल खोलना शुरू कर देंगे तो मुख्मंत्री सरकारी विज्ञापन देना बंद कर देंगे. अब सीधा दोष हम सरकार का भी नहीं दे सकते क्यूंकि व्यासायिक दृष्टिकोण यही कहता है कि अखबार चलाने के लिए पैसा चाहिए, अगर सरकार का तलवा चाटने से ही ये कमी पूरी होती है तो यही सही. जी हाँ, अगर आप अखबार देखें तो पाएंगे कि सरकारी विज्ञापनों से हर पन्ना पटा रहता है और सुशासन बाबू का स्पष्ट निर्देश है कि जो भी अखबार उनके खिलाफ खबर छापे उनका विज्ञापन बंद कर दो. अब आप ही बताएं इस आर्थिक युग में कौन अपना लाखों का नुकसान करवाएगा? आजकल मीडिया मार्केटिंग एक बहुत बड़ा हथियार है जिससे आप अपनी बात मनवा सकते हैं और मैं मानता हूँ कि बिहार में पिछले छह सालों में मीडिया मार्केटिंग के अलावा और कुछ भी नहीं हुआ है. क्यंकि आप ही देखिये कि छह साल पहले शपथ के ठीक बाद मीडिया के सामने बिहार से पलायन रोकने कि उद्घोषणा करने वाले सुशासन बाबु बिहार में कोई नया उद्योग स्थापित करना तो तो दूर पुराने उद्योग ही शुरू नहीं कर पाए, लेकिन मीडिया मार्केटिंग इनकी इतनी ज़बरदस्त थी, कि बिकास के नाम पर वापस सरकार में आ गए.
अब सरकार के लिए मीडिया मैनेज इसलिए भी आसान है क्यूंकि बिहार कि 89%
अखबार पढने वाले ज्यादातर लोग दो ही अखबार पढ़ते हैं, दैनिक हिंदुस्तान और दैनिक जागरण. ऐसे में सरकार के लिए दो अखबार मैनेज करना कोई बड़ी बात नहीं है. वैसे भी सुशासन बाबू के लिए एक सुविधाजनक बात ये भी है कि सत्तारूढ़ जनता दल (यू) के एक सांसद एन. के. सिंह एचटी मीडिया के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर में भी शामिल हैं. इन सब परिस्थितियों के कारण अखबार नीतीश सरकार को खुश करने के लिए ज्यादा ही तत्पर रहते हैं. कभी-कभी तो मुझे लगता है कि यहाँ सरकार का जनसंपर्क विभाग बंद हो गया है और ये काम सुशासन बाबू ने यहाँ के अखबारों को दे दिया है, जो दिन भर सरकार के बखान में लगे रहते हैं. सरकार अपनी छवि चमकाने के लिए जनता का पैसा विज्ञापन के रूप में बड़े अखबारों पर लुटा रही है और अपनी सत्ता वापसी के रास्ते बना रही है. पहले जनाधार वाली पार्टियाँ मीडिया को आधारविहीन मानती थी और कर्म पर विश्वास करती थी पर समय बदल गया है. पार्टियां मीडिया के द्वारा छवि निर्माण करने में लगीं हैं. राजनीतिक पार्टियां मुख्यधारा के मीडिया का इस्तेमाल कर उन वोटरों को प्रभावित करने में लगीं हैं, जो पाठक-दर्शक भी हैं और इसका सदुपयोग या यों कहें कि सबसे बड़ा उदहारण बिहार है. साफ़ शब्दों में अगर कहें तो लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ अब पुर्णतः बिक चूका है और राजनीति में इस खरीद-बिक्री का श्रेय पूरी तरह से श्रधेय श्री नीतीश कुमार जी को जाता है, जिन्होंने बहुत गलत परंपरा कि शुरुआत कर दी है. ऐसे में लोकतंत्र पर सबसे बड़ा खतरा ये है कि अब हर कोई मीडिया को सेंसर कर जनमत को प्रभावित करने कि कोशिश करेगा जैसा कि नीतीश कुमार कर रहे हैं. इसलिए अब समय आ गया है कि जनता जागे और असलियत को समझे. लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहलाने वाला अपने ऊपर से बिकाऊ का लेबल हटा कर एक स्वच्छ छवि का निर्माण करें जिससे देश और समाज दोनों का भला हो.
मंगलवार, 14 जून 2011
सोमवार, 31 जनवरी 2011
तिरंगे की राजनीति...
तिरंगा शब्द हमारे ज़ेहन में आते ही एक अजीब सी स्फूर्ति बदन में आ जाती है. हमारा सर गर्व से ऊँचा हो जाता है साथ ही हमें फख्र होता है कि हम विश्व के सबसे बड़े प्रजातंत्र के नागरिक हैं. हमसब के लिए हिन्दुस्तानी होना ही बहुत बड़ी बात है. साथ ही हमारा राष्ट्रीय ध्वज जिसके लिए जाने कितने लोग आज़ादी के दौरान वन्दे मातरम् बोलते हुए शहीद हो गए. हर 26 जनवरी और 15 अगस्त को अपने तिरंगे का ध्वजारोहण करके अपने शहीदों का सम्मान और अपनी आज़ादी का जश्न मनाते हैं. इस दिन हिन्दुस्तान के हर हिस्से में हर घर, हर शहर, हर चौक एवं चौराहे पर हम सब तिरंगा फहराते हैं और इसका अधिकार हर हिन्दुस्तानी को है. परन्तु हम 26 जनवरी को अपने ही देश के एक राज्य जम्मू कश्मीर के लाल चौक पर तिरंगा नहीं फहरा सकते. जी हाँ ये बिलकुल सही है, पर ऐसा क्यूँ है?
कुछ दिनों पहले भाजयुमो के राष्ट्रीय अध्यक्ष अनुराग ठाकुर भारत भ्रमण करते हुए जम्मू कश्मीर पहुँच कर वहां लाल चौक पर झंडा फहराने का कार्यक्रम बनाया था. पर उन्हें और साथ ही सभी बड़े नेताओं को जम्मू कश्मीर कि सीमा पर ही गिरफ्तार कर लिया गया. यहाँ सवाल भाजपाई होने का नहीं है यहाँ सवाल है, कि हम लाल चौक पर झंडा क्यूँ नहीं फहरा सकते? प्रधानमंत्री का कहना है, कि जम्मू कश्मीर एक संवेदनशील राज्य है, पर ये संवेदनशीलता तब कहाँ चली जाती है जब इसी जम्मू कश्मीर के लाल चौक पर जहाँ कभी हरे रंग का इस्लामिक झंडा, तो कभी पाकिस्तानी झंडा फहराया जाता है. लेकिन हमारा राष्ट्रीय ध्वज फहराने में हिन्दुस्तान की सरकार को ऐतराज़ है. आप अपने ही देश किसी हिस्से में इसे प्रतिबंधित कैसे कर सकते हैं. यहाँ पिछले कई सालों तक 14 अगस्त को पाकिस्तानी झंडा फहराया जाता था और हमारी सरकार ख़ामोशी से अलगाववादियों के हौसले बुलंद किये. इन्ही कारणों से करीब यहाँ से 200 मीटर दूर CRPF के बंकर में तिरंगा नहीं लहराया जा सका. ये तो कुछ भी नहीं, श्रीनगर के कुछ इलाकों में अलगावादियों के हौसले इतने बुलंद है की वहां इन्होने बोर्ड तक लगाया हुआ है “Welcome to Chhota Pakistan” का. पर सरकार को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है. पर उन्हें तब फर्क ज़रूर पड़ता है जब आप अपने ही देश के इस हिस्से में तिरंगा फहराते हैं.
वैसे आज ये बहुत बड़ा मुद्दा है कि हम लाल चौक पर झंडा नहीं फहरा सकते. पर भाजपा वालों की एक और मांग है, कि धारा 370 समाप्त करो वरना आन्दोलन होगा. अब यहाँ असल में सोचने की बात बात ये है कि भाजपा का सच में कश्मीर से कन्याकुमारी तक अखंड भारत का सपना है और सब जगह एक सामान क़ानून हो या फिर ये सिर्फ राजनीतिक एजेंडा बना कर ढोंग कर रहे हैं. क्यूँ जब इनकी सरकार लगातार 5 साल तक थी तब तो इन्होने 370 खत्म करने की कोई कवायद नहीं की? अगर सच में ये इमानदारी से इस मुद्दे के खिलाफ थे तो अपनी ये मांग अपनी ही सरकार में बखूबी पूरा कर सकते थे.पर नहीं जी, इन्हें तो राजनीतिक डपोरशंखी चाहिए जिससे मुद्दा बना कर ये चुनाव लड़ सकें. लाल चौक पर झंडा नहीं फहराने से हर हिन्दुस्तानी आहत ज़रूर है पर भाजपा की इस गन्दी राजनीति से ज्यादा आहत है.
पहले यहाँ सवाल ये उठता है कि क्यूँ इस सरकार को हरबार ये बोलने की ज़रूरत पड़ती है "कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है?" इसका उत्तर साफ़ है कि इनके ही सहयोगी नेशनल कांफ्रेंस जिसकी सरकार के मुख्यमंत्री जम्मू कश्मीर के हैं, उनका एक बयान आया था कि “जम्मू कश्मीर का विलय ही अपूर्ण है” अब जिस सरकार का सहयोगी ऐसे बयान देंगे तो क्या होगा. यहाँ एक बात और गौर करने वाली है, कि अगर आप रेडियो सुनते हैं तो कभी आल इंडिया रेडियो का प्रसारण हिंदुस्तान के किसी हिस्से का सुन लें और साथ ही जम्मू कश्मीर का सुन लें आपको फर्क पता चल जायेगा. पटना प्रसारण से वक्ता कहता है कि “ये आल इंडिया का पटना केंद्र है, लखनऊ के कहते हैं “ये आल इंडिया का लखनऊ केंद्र है. ऐसा हिन्दुस्तान के हर हिस्से में कहा जाता है पर जम्मू कश्मीर की बात अलग है वहां के वक्ता कहते हैं कि “ये रेडियो जम्मू कश्मीर है” इन्हें इंडिया नाम लेना भी गंवारा नहीं है. यहाँ तक की रेवेन्यु स्टाम्प पूरे भारत का एक है पर जम्मू कश्मीर में वहां का अपना रेवेन्यु स्टाम्प चलता है. फिर भी सरकार बार बार चिल्ला चिल्ला के कैसे बोल रही है कि “कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है” सिर्फ ये कहने से कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है से हमारी एकता और अखंडता बनी नहीं रह सकती? अगर अपने ही देश के किसी हिस्से में तिरंगा फहराने से शांति भंग होने का खतरा होने का संकेत अगर ये सरकार दे रही है तो धिक्कार है ऐसी सरकार पर. कश्मीर जैसे मुद्दे पर तो सरकार की हालत बिलकुल शुतुरमुर्ग वाली है कि जो तूफ़ान आते ही अपना सर रेत में छुपा लेता है ये सोच कर कि शायद आने वाला तूफ़ान यू ही टल जायेगा. सरकार को कश्मीर पर अपनी नीति पुर्णतः स्पष्ट करनी पड़ेगी वरना ये एक छोटा सा घाव एक दिन कैंसर का रूप ले लेगा.
कुछ दिनों पहले भाजयुमो के राष्ट्रीय अध्यक्ष अनुराग ठाकुर भारत भ्रमण करते हुए जम्मू कश्मीर पहुँच कर वहां लाल चौक पर झंडा फहराने का कार्यक्रम बनाया था. पर उन्हें और साथ ही सभी बड़े नेताओं को जम्मू कश्मीर कि सीमा पर ही गिरफ्तार कर लिया गया. यहाँ सवाल भाजपाई होने का नहीं है यहाँ सवाल है, कि हम लाल चौक पर झंडा क्यूँ नहीं फहरा सकते? प्रधानमंत्री का कहना है, कि जम्मू कश्मीर एक संवेदनशील राज्य है, पर ये संवेदनशीलता तब कहाँ चली जाती है जब इसी जम्मू कश्मीर के लाल चौक पर जहाँ कभी हरे रंग का इस्लामिक झंडा, तो कभी पाकिस्तानी झंडा फहराया जाता है. लेकिन हमारा राष्ट्रीय ध्वज फहराने में हिन्दुस्तान की सरकार को ऐतराज़ है. आप अपने ही देश किसी हिस्से में इसे प्रतिबंधित कैसे कर सकते हैं. यहाँ पिछले कई सालों तक 14 अगस्त को पाकिस्तानी झंडा फहराया जाता था और हमारी सरकार ख़ामोशी से अलगाववादियों के हौसले बुलंद किये. इन्ही कारणों से करीब यहाँ से 200 मीटर दूर CRPF के बंकर में तिरंगा नहीं लहराया जा सका. ये तो कुछ भी नहीं, श्रीनगर के कुछ इलाकों में अलगावादियों के हौसले इतने बुलंद है की वहां इन्होने बोर्ड तक लगाया हुआ है “Welcome to Chhota Pakistan” का. पर सरकार को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है. पर उन्हें तब फर्क ज़रूर पड़ता है जब आप अपने ही देश के इस हिस्से में तिरंगा फहराते हैं.
वैसे आज ये बहुत बड़ा मुद्दा है कि हम लाल चौक पर झंडा नहीं फहरा सकते. पर भाजपा वालों की एक और मांग है, कि धारा 370 समाप्त करो वरना आन्दोलन होगा. अब यहाँ असल में सोचने की बात बात ये है कि भाजपा का सच में कश्मीर से कन्याकुमारी तक अखंड भारत का सपना है और सब जगह एक सामान क़ानून हो या फिर ये सिर्फ राजनीतिक एजेंडा बना कर ढोंग कर रहे हैं. क्यूँ जब इनकी सरकार लगातार 5 साल तक थी तब तो इन्होने 370 खत्म करने की कोई कवायद नहीं की? अगर सच में ये इमानदारी से इस मुद्दे के खिलाफ थे तो अपनी ये मांग अपनी ही सरकार में बखूबी पूरा कर सकते थे.पर नहीं जी, इन्हें तो राजनीतिक डपोरशंखी चाहिए जिससे मुद्दा बना कर ये चुनाव लड़ सकें. लाल चौक पर झंडा नहीं फहराने से हर हिन्दुस्तानी आहत ज़रूर है पर भाजपा की इस गन्दी राजनीति से ज्यादा आहत है.
पहले यहाँ सवाल ये उठता है कि क्यूँ इस सरकार को हरबार ये बोलने की ज़रूरत पड़ती है "कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है?" इसका उत्तर साफ़ है कि इनके ही सहयोगी नेशनल कांफ्रेंस जिसकी सरकार के मुख्यमंत्री जम्मू कश्मीर के हैं, उनका एक बयान आया था कि “जम्मू कश्मीर का विलय ही अपूर्ण है” अब जिस सरकार का सहयोगी ऐसे बयान देंगे तो क्या होगा. यहाँ एक बात और गौर करने वाली है, कि अगर आप रेडियो सुनते हैं तो कभी आल इंडिया रेडियो का प्रसारण हिंदुस्तान के किसी हिस्से का सुन लें और साथ ही जम्मू कश्मीर का सुन लें आपको फर्क पता चल जायेगा. पटना प्रसारण से वक्ता कहता है कि “ये आल इंडिया का पटना केंद्र है, लखनऊ के कहते हैं “ये आल इंडिया का लखनऊ केंद्र है. ऐसा हिन्दुस्तान के हर हिस्से में कहा जाता है पर जम्मू कश्मीर की बात अलग है वहां के वक्ता कहते हैं कि “ये रेडियो जम्मू कश्मीर है” इन्हें इंडिया नाम लेना भी गंवारा नहीं है. यहाँ तक की रेवेन्यु स्टाम्प पूरे भारत का एक है पर जम्मू कश्मीर में वहां का अपना रेवेन्यु स्टाम्प चलता है. फिर भी सरकार बार बार चिल्ला चिल्ला के कैसे बोल रही है कि “कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है” सिर्फ ये कहने से कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है से हमारी एकता और अखंडता बनी नहीं रह सकती? अगर अपने ही देश के किसी हिस्से में तिरंगा फहराने से शांति भंग होने का खतरा होने का संकेत अगर ये सरकार दे रही है तो धिक्कार है ऐसी सरकार पर. कश्मीर जैसे मुद्दे पर तो सरकार की हालत बिलकुल शुतुरमुर्ग वाली है कि जो तूफ़ान आते ही अपना सर रेत में छुपा लेता है ये सोच कर कि शायद आने वाला तूफ़ान यू ही टल जायेगा. सरकार को कश्मीर पर अपनी नीति पुर्णतः स्पष्ट करनी पड़ेगी वरना ये एक छोटा सा घाव एक दिन कैंसर का रूप ले लेगा.
बुधवार, 12 जनवरी 2011
बेटी का जनाज़ा...
आज मध्य प्रदेश के अनुप पुर जिले में एक ऐसी घटना हुई, जिसने इंसानियत को झकझोर के रख दिया. अनूप पुर जिले के किसी गाँव में एक लड़की की उलटी और दस्त के कारण मृत्यु हो गयी. यह खबर वहां के पुलिस थाने तक पहुंची और थाने से फरमान आया कि लाश कि जांच थाने आ कर करवाओ. बेचारा लड़की का पिता गरीब था इसलिए बेटी की लाश ले जाने का कोई और साधन नहीं होने के कारण उसने अपनी सायकिल निकाली और कपडे के साथ कम्बल में लपेट कर लाश सायकिल के पीछे कैरिएर पर लाद कर ले गए. देख कर ऐसा लग रहा था जैसे कोई सामान की गठरी ले कर जा रहा हो. थाने में प्राथमिक जांच के बाद लड़की के पिता से कहा गया की जिला अस्पताल जा कर लाश का पंचनामा करवा लो. पुलिस थाने से सिर्फ आदेश जारी हुआ इसके अलावा कोई सुविधा उन्हें मुहैया नहीं करवाई गयी. बेचारा लड़की का पिता अपनी बेटी की लाश वापस अपनी सायकिल के कैरियर पर लाद कर उसका पंचनामा करवाने जिला अस्पताल की तरफ निकल पड़ा. जिला अस्पताल वहां से करीब 25 किलोमीटर दूर था. करीब चार घंटे के सफ़र के बाद एक पिता अपनी बेटी की लाश का पंचनामा करवाने जिला अस्पताल पहुंचा. क्यूंकि सरकारी कारवाई के बाद एक पिता को बेटी की लाश वापस चाहिए उसका अन्तिम संस्कार करने के लिए. इसलिए वो अपनी बेटी के जनाज़े के साथ हो रही हर ज़िल्लत को बर्दाश्त करता रहा. वैसे ज़िल्लत बर्दाश्त करने के अलावा वो कुछ कर भी नहीं सकता था, क्यूंकि वो ग़रीब था.
अब यहाँ सवाल ये उठता है कि, क्या ग़रीब होना गुनाह है या फिर सविंधान इन्हें जीने का कोई हक नहीं देता है. मध्य प्रदेश सरकार के मुखिया शिवराज सिंह चौहान खुद को ग़रीबों का सबसे बड़ा हितैषी बताते हैं. उनके अनुसार उनके यहाँ अधिकतम योजनायें ग़रीबों के हित के लिए ही है और सबसे बड़ी बात ये है कि कुछ दिनों पहले से मध्य प्रदेश सरकार वहां के पुलिसवालों को ट्रेनिंग दे रही है और एक बृहत् कार्यक्रम पुलिस वालों के लिए चला रही है जिसका मकसद है कि "मध्य प्रदेश पुलिस, जनता के समक्ष कैसे सभ्य और विनम्र रहे." अगर वहां के पुलिस की ये विनम्रता है तो ये क्रूर हो जाए तो आप ही अंदाजा लगायें कि आलम क्या होगा? मुझे कायदा कानून की ज्यादा जानकारी नहीं है पर कोई मुझे ये बताये कि अगर कही कोई हादसा हो जाये तो सरकारी संस्थाएं अगली कारवाई के लिए सुविधाएँ प्रदान करती हैं या नहीं या फिर इन्ही पुलिस वालों की तरह अपनी हैवानियत वाली शक्ल दिखाती रहती हैं? शायद यहाँ मेरा कहना ये गलत नहीं होगा कि हमारा सविंधान ये सुविधाएँ हैसियत देख कर देती है, अगर ये किसी मंत्री, विधायक या सांसद के साथ हुआ होता तो हमारा सरकारी तंत्र क्या ऐसे ही काम कर रहा होता?
इतने बड़े हादसे के बाद वहां मुख्यमंत्री जी प्रेस के सामने आये और आते ही उन्होंने इस पूरी घटना कि निंदा की और न्यायिक जांच का आदेश देते हुए वहां के ए. एस. आइ. को बर्खास्त कर दिया. मेरे विचार में ये खानापूर्ति कि अलावा कुछ भी नहीं था. आज हमारे देश के किसी भी हिस्से में कुछ होता है तो सरकार का मुखिया एक जांच समिति बना कर मामले को रफा दफा कर देता है. ये शायद इन ग़रीबों का दुर्भाग्य है कि इन्हें ऐसे ही प्रशासक मिलते हैं. मुझे ये पता नहीं आज जो कुछ भी हुआ उसे कैसे रोका जा सकता था पर साफ़ शब्दों में मैं कहना चाहता हूँ की जो भी हुआ वो इंसानियत को शर्मसार करने के लिए काफी था. यह दृश्य टी.वी. पर देखने के बाद से मेरी अंतरात्मा मुझे झकझोर रही है और बार बार यही आवाज़ आ रही है कि "हाय रे गरीबों कि सरकार"
पुलिस और सरकारी तंत्र से तो ऐसी ही आशा थी पर वहां आस-पास के लोग जो मूकदर्शक बने हुए थे उन्हें क्या कहना चाहिए? हम क्यूँ हर बात पर सरकार को दोष देते हैं? अगर हम बदलेंगे तभी सरकार की सोच बदलेगी. आज जब मैंने टी.वी. पर उस व्यक्ति को अपनी बेटी की लाश ले कर इधर उधर भटकते हुए देखा तो मुझे लगा की वहां आस-पास मौजूद लोगों की आत्मा बिलकुल मर चुकी है. ये दुनिया जानती है कि हमारे राजनेता और मंत्रियों के पास तो आत्मा नाम कि कोई चीज़ ही नहीं होती. लेकिन हम क्यूँ उनके नक़्शे कदम पर चल रहे हैं. ज़रा सोचिये वो बाप जिसने अपनी बेटी की डोली उठाने की सोची होगी, कभी उसने सोचा होगा कि उसकी बेटी कि विदाई खूबसूरत डोली में करेगा. वो आज अपनी बेटी के जनाज़े को ले कर इधर उधर भटक रहा है और ये पुलिस और प्रशासन इनका मज़ाक बना रही है. अब वक़्त आ गया है कि हम सरकार के भरोसे न रह कर खुद आगे आयें और इसके खिलाफ आवाज़ उठायें. ताकि इन ग़रीबों की डोली उठाने में तो हम सहयोग नहीं कर पाए पर इनकी अर्थी इनके घर से इज्ज़त के साथ उठे और इस ग़रीब कि बेटी कि विदाई इतनी ज़िल्लत से न हो...
अब यहाँ सवाल ये उठता है कि, क्या ग़रीब होना गुनाह है या फिर सविंधान इन्हें जीने का कोई हक नहीं देता है. मध्य प्रदेश सरकार के मुखिया शिवराज सिंह चौहान खुद को ग़रीबों का सबसे बड़ा हितैषी बताते हैं. उनके अनुसार उनके यहाँ अधिकतम योजनायें ग़रीबों के हित के लिए ही है और सबसे बड़ी बात ये है कि कुछ दिनों पहले से मध्य प्रदेश सरकार वहां के पुलिसवालों को ट्रेनिंग दे रही है और एक बृहत् कार्यक्रम पुलिस वालों के लिए चला रही है जिसका मकसद है कि "मध्य प्रदेश पुलिस, जनता के समक्ष कैसे सभ्य और विनम्र रहे." अगर वहां के पुलिस की ये विनम्रता है तो ये क्रूर हो जाए तो आप ही अंदाजा लगायें कि आलम क्या होगा? मुझे कायदा कानून की ज्यादा जानकारी नहीं है पर कोई मुझे ये बताये कि अगर कही कोई हादसा हो जाये तो सरकारी संस्थाएं अगली कारवाई के लिए सुविधाएँ प्रदान करती हैं या नहीं या फिर इन्ही पुलिस वालों की तरह अपनी हैवानियत वाली शक्ल दिखाती रहती हैं? शायद यहाँ मेरा कहना ये गलत नहीं होगा कि हमारा सविंधान ये सुविधाएँ हैसियत देख कर देती है, अगर ये किसी मंत्री, विधायक या सांसद के साथ हुआ होता तो हमारा सरकारी तंत्र क्या ऐसे ही काम कर रहा होता?
इतने बड़े हादसे के बाद वहां मुख्यमंत्री जी प्रेस के सामने आये और आते ही उन्होंने इस पूरी घटना कि निंदा की और न्यायिक जांच का आदेश देते हुए वहां के ए. एस. आइ. को बर्खास्त कर दिया. मेरे विचार में ये खानापूर्ति कि अलावा कुछ भी नहीं था. आज हमारे देश के किसी भी हिस्से में कुछ होता है तो सरकार का मुखिया एक जांच समिति बना कर मामले को रफा दफा कर देता है. ये शायद इन ग़रीबों का दुर्भाग्य है कि इन्हें ऐसे ही प्रशासक मिलते हैं. मुझे ये पता नहीं आज जो कुछ भी हुआ उसे कैसे रोका जा सकता था पर साफ़ शब्दों में मैं कहना चाहता हूँ की जो भी हुआ वो इंसानियत को शर्मसार करने के लिए काफी था. यह दृश्य टी.वी. पर देखने के बाद से मेरी अंतरात्मा मुझे झकझोर रही है और बार बार यही आवाज़ आ रही है कि "हाय रे गरीबों कि सरकार"
पुलिस और सरकारी तंत्र से तो ऐसी ही आशा थी पर वहां आस-पास के लोग जो मूकदर्शक बने हुए थे उन्हें क्या कहना चाहिए? हम क्यूँ हर बात पर सरकार को दोष देते हैं? अगर हम बदलेंगे तभी सरकार की सोच बदलेगी. आज जब मैंने टी.वी. पर उस व्यक्ति को अपनी बेटी की लाश ले कर इधर उधर भटकते हुए देखा तो मुझे लगा की वहां आस-पास मौजूद लोगों की आत्मा बिलकुल मर चुकी है. ये दुनिया जानती है कि हमारे राजनेता और मंत्रियों के पास तो आत्मा नाम कि कोई चीज़ ही नहीं होती. लेकिन हम क्यूँ उनके नक़्शे कदम पर चल रहे हैं. ज़रा सोचिये वो बाप जिसने अपनी बेटी की डोली उठाने की सोची होगी, कभी उसने सोचा होगा कि उसकी बेटी कि विदाई खूबसूरत डोली में करेगा. वो आज अपनी बेटी के जनाज़े को ले कर इधर उधर भटक रहा है और ये पुलिस और प्रशासन इनका मज़ाक बना रही है. अब वक़्त आ गया है कि हम सरकार के भरोसे न रह कर खुद आगे आयें और इसके खिलाफ आवाज़ उठायें. ताकि इन ग़रीबों की डोली उठाने में तो हम सहयोग नहीं कर पाए पर इनकी अर्थी इनके घर से इज्ज़त के साथ उठे और इस ग़रीब कि बेटी कि विदाई इतनी ज़िल्लत से न हो...
बुधवार, 5 जनवरी 2011
ये हैं जनप्रतिनिधि
कल एक जबरदस्त न्यूज़ जंगल में आग की तरह फैली कि, बिहार में पूर्णिया के विधायक राजकिशोर केसरी की एक महिला ने निर्मम हत्या कर दी. वैसे तो हत्या का मूल कारण जांच के बाद ही पता चलेगा लेकिन पहली नज़र में अगर देखें तो कुछ अजीब सी ही बातें सामने आती हैं, जो हमें बिलकुल स्तब्ध कर देती है. आरोपी महिला रूपम पाठक ने विधायक और उनके सहयोगियों पर यौन दुराचार का आरोप लगाया था. उसके बाद 18 अप्रेल 2010 को पुलिस अधीक्षक से मिल कर लिखित शिकायत दर्ज किया. अब यहाँ ऐसा प्रतीत हो रहा है कि समय पर कारवाई नहीं होने के कारण ही महिला ने ये दुस्साहस करने कि ठानी. अब यहाँ राजनीति शुरू हो चुकी है और आरोप प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है. लेकिन यहाँ अगर आम जनता का मत agar हम जानें तो पाते हैं कि रूपम पाठक के द्वारा न्याय के लिए अपनाये गए तरीके को गलत मानते हैं पर विधायक जी को भी साफतौर से बरी नहीं कर रहे हैं.
यहाँ सचमुच ये अब चिंतन का विषय हो गया है कि, कहलाते तो ये जनप्रतिनिधि हैं. लेकिन जनता के सामने कभी इनकी छवि साफ़ सुथरी नहीं होती. ऐसा नहीं है कि सभी जनप्रतिनिधि ऐसे ही हैं. परन्तु हमारे दिमाग में ऐसी ही छवि बनी हुई है. ये सिर्फ एक जगह कि हालत नहीं है. कुछ दिन पहले ही उत्तर प्रदेश के एक बसपा विधायक पर भी बलात्कार का इलज़ाम लगा है और वो बचाव में बयान देते फिर रहे हैं. मैं उस महिला के कदम को बिलकुल सही नहीं मानता हूँ. पर ज़रा सोचिये कि कोई भी महिला इस तरह के अंजाम तक किस हालात में पहुँच सकती है. यहाँ मतलब साफ़ है कि, क़त्ल एक अन्तिम हथियार ही बचता है. जब क़ानून से आपका विश्वास उठ जाये तो शायद इसके अलावा कोई उपाय नहीं बचता है. वैसे इस तरह के हत्याकांड को समाज सिरे से नकारते हैं लेकिन कोई व्यक्ति करे तो आखिर क्या, जब हमारा सविंधान ही हमारी रक्षा न कर पाए तो?
इस हत्याकांड के बाद जब मैंने अपने उपमुख्यमंत्री श्री सुशील कुमार मोदी जी का बयान सुना तो मैं बिलकुल ही हतप्रभ रह गया. बिना किसी जांच के और बिना किसी परिस्थिति को जाने कोई ऐसा गैर जिम्मेदारी वाला बयान कैसे दे सकता है? सुशील कुमार मोदी ने राजकिशोर केसरी को क्लीन चिट देते हुए सारे आरोप उक्त महिला रूपम पाठक के सर मढ़ दिया. उन्होंने महिला पर आरोप लगाया कि "रूपम पाठक विधायक को ब्लैक मेल कर रही थी" परन्तु कोई ज़रा हमें ये बताये कि कोई भी इंसान किसी को ब्लैक मेल किस आधार पर कर सकता है. बचपन में सुनी हुई एक कहावत है कि "धुंआ वही उठता है जहाँ आग आग लगी रहती है" तात्पर्य ये है कि अगर वो विधायक को ब्लैक मेल कर रही थी तो ये बात यहाँ साफ़ है कि विधायक जी के खिलाफ कोई सबूत उनके पास था जिसके कारण सुशील कुमार मोदी ये कह रहे हैं कि महिला विधायक को ब्लैक मेल कर रही थी. मेरा राजनेताओं से अनुरोध है कि पहले वस्तुस्थिति को समझने की कोशिश करें फिर कोई बयान दें.
मैं मानता हूँ कि विधायक कि हत्या निहायत ही गलत कदम है. उस महिला का आरोप अगर सच भी है फिर भी ये तरीका बिलकुल गैरकानूनी और गलत है. पर हमें फिक्र इस बात कि होनी चाहिए कि उस महिला ने अब तक कोई सबूत नहीं दिए हैं फिर भी आम जनता विधायक के करतूत को सही मान रही है. हर कोई यही कह रहा है कि महिला झूठ नहीं बोल रही है. पर ज़रा हम विधायक के सहयोगियों को देखें तो उन्हें उस महिला पर आरोप लगाने का उन्हें कोई अधिकार नहीं है. क्यूंकि इस हत्या के बाद उनके सहयोगियों ने मार-मार कर उसे अधमरा कर दिया. क्या ये न्याय संगत था?
ऐसा लगता है कि हर पार्टी और हर प्रदेश में ऐसे लोग मौजूद हैं जो कही न कहीं किसी न किसी काण्ड में लिप्त हैं. पर पार्टी इन्हें बाहर निकालने या इनपर कारवाई करने का कोई व्यस्थित उपाय नहीं कर रही है. हर पार्टी को अपने विरोधी पार्टी में अपराधी तत्व नज़र आते हैं और उस वक़्त ये मसला सबसे अहम् हो जाता है पर एक बार अपने गिरेबान में झाँकने की भूल कभी नहीं करते. यहाँ सवाल सिर्फ माननीय जनप्रतिनिधि के अपराधिक या चारित्रिक मामले लिप्त होने का नहीं है, सवाल ये है कि अगर हमारे माननीय जनप्रतिनिधि ऐसे होंगे तो हम आम जनता से कानून पालन करने कि क्या उम्मीद कर सकते हैं...
यहाँ सचमुच ये अब चिंतन का विषय हो गया है कि, कहलाते तो ये जनप्रतिनिधि हैं. लेकिन जनता के सामने कभी इनकी छवि साफ़ सुथरी नहीं होती. ऐसा नहीं है कि सभी जनप्रतिनिधि ऐसे ही हैं. परन्तु हमारे दिमाग में ऐसी ही छवि बनी हुई है. ये सिर्फ एक जगह कि हालत नहीं है. कुछ दिन पहले ही उत्तर प्रदेश के एक बसपा विधायक पर भी बलात्कार का इलज़ाम लगा है और वो बचाव में बयान देते फिर रहे हैं. मैं उस महिला के कदम को बिलकुल सही नहीं मानता हूँ. पर ज़रा सोचिये कि कोई भी महिला इस तरह के अंजाम तक किस हालात में पहुँच सकती है. यहाँ मतलब साफ़ है कि, क़त्ल एक अन्तिम हथियार ही बचता है. जब क़ानून से आपका विश्वास उठ जाये तो शायद इसके अलावा कोई उपाय नहीं बचता है. वैसे इस तरह के हत्याकांड को समाज सिरे से नकारते हैं लेकिन कोई व्यक्ति करे तो आखिर क्या, जब हमारा सविंधान ही हमारी रक्षा न कर पाए तो?
इस हत्याकांड के बाद जब मैंने अपने उपमुख्यमंत्री श्री सुशील कुमार मोदी जी का बयान सुना तो मैं बिलकुल ही हतप्रभ रह गया. बिना किसी जांच के और बिना किसी परिस्थिति को जाने कोई ऐसा गैर जिम्मेदारी वाला बयान कैसे दे सकता है? सुशील कुमार मोदी ने राजकिशोर केसरी को क्लीन चिट देते हुए सारे आरोप उक्त महिला रूपम पाठक के सर मढ़ दिया. उन्होंने महिला पर आरोप लगाया कि "रूपम पाठक विधायक को ब्लैक मेल कर रही थी" परन्तु कोई ज़रा हमें ये बताये कि कोई भी इंसान किसी को ब्लैक मेल किस आधार पर कर सकता है. बचपन में सुनी हुई एक कहावत है कि "धुंआ वही उठता है जहाँ आग आग लगी रहती है" तात्पर्य ये है कि अगर वो विधायक को ब्लैक मेल कर रही थी तो ये बात यहाँ साफ़ है कि विधायक जी के खिलाफ कोई सबूत उनके पास था जिसके कारण सुशील कुमार मोदी ये कह रहे हैं कि महिला विधायक को ब्लैक मेल कर रही थी. मेरा राजनेताओं से अनुरोध है कि पहले वस्तुस्थिति को समझने की कोशिश करें फिर कोई बयान दें.
मैं मानता हूँ कि विधायक कि हत्या निहायत ही गलत कदम है. उस महिला का आरोप अगर सच भी है फिर भी ये तरीका बिलकुल गैरकानूनी और गलत है. पर हमें फिक्र इस बात कि होनी चाहिए कि उस महिला ने अब तक कोई सबूत नहीं दिए हैं फिर भी आम जनता विधायक के करतूत को सही मान रही है. हर कोई यही कह रहा है कि महिला झूठ नहीं बोल रही है. पर ज़रा हम विधायक के सहयोगियों को देखें तो उन्हें उस महिला पर आरोप लगाने का उन्हें कोई अधिकार नहीं है. क्यूंकि इस हत्या के बाद उनके सहयोगियों ने मार-मार कर उसे अधमरा कर दिया. क्या ये न्याय संगत था?
ऐसा लगता है कि हर पार्टी और हर प्रदेश में ऐसे लोग मौजूद हैं जो कही न कहीं किसी न किसी काण्ड में लिप्त हैं. पर पार्टी इन्हें बाहर निकालने या इनपर कारवाई करने का कोई व्यस्थित उपाय नहीं कर रही है. हर पार्टी को अपने विरोधी पार्टी में अपराधी तत्व नज़र आते हैं और उस वक़्त ये मसला सबसे अहम् हो जाता है पर एक बार अपने गिरेबान में झाँकने की भूल कभी नहीं करते. यहाँ सवाल सिर्फ माननीय जनप्रतिनिधि के अपराधिक या चारित्रिक मामले लिप्त होने का नहीं है, सवाल ये है कि अगर हमारे माननीय जनप्रतिनिधि ऐसे होंगे तो हम आम जनता से कानून पालन करने कि क्या उम्मीद कर सकते हैं...
शुक्रवार, 17 दिसंबर 2010
बदलता बिहार...
गत चुनाव के परिणाम ने साबित कर दिया है कि बिहार अब बदल रहा है. जो बिहार आजतक जात-पात के बूते पर चुनाव लड़ता था, पार्टियाँ अपना उम्मीदवार जातीय समीकरण के आधार पर तय करते थे, लेकिन परिणाम ने साफ़-साफ़ ये बता दिया कि अब बिहार बदल कर विहार(खूबसूरत जगह) बन रहा है. परन्तु, मैं यहाँ मीडिया वालो को भी ज़रा सा दोष देना चाहूँगा, क्यूंकि यही मीडिया कहती है, कि बिहार में जात-पात कि राजनीति होती है लेकिन जैसे ही राजनितिक पार्टियाँ अपना उम्मीदवार घोषित करती हैं तो अगले दिन समाचार पत्रों में उम्मीदवारों कि जातिवार सूची जारी कर देते हैं. इसमें हम किसे दोष देंगे, इन राजनेताओं को या फिर मीडिया को? इसबार वैसे भी बिहार में जात-पात से ऊपर उठ कर मतदान किया गया है, जिसका गवाह पूरा हिन्दुस्तान है. लेकिन मुझे तब बड़ा आश्चर्य हुआ कि एक तरफ हम खुद को बदलने कि कोशिश कर रहे हैं वही दूसरी तरफ कई समाचार पत्रों ने जीते हुए विधायकों कि जातिवार सूची तक ज़ारी कर दी. खैर, बस अब हमें इस बात की ख़ुशी है कि हम अब बदल रहे हैं. पर इस अप्रत्याशित जीत के बाद नीतिश कुमार कि जिम्मेदारियां भी बहुत बढ़ गयी है. बिकास तो चारो तरफ दिख रहा है पर मेरे विचार में सम्पूर्ण विकसित करने में सबसे बड़ा योगदान बैंकों का होता है. लेकिन सर्वे के अनुसार बिहार में ऋण देने में बैंक सबसे पिछड़ी हुई है.
अगर हम रिपोर्ट देखें तो पाएंगे कि पूरे बिहार के बैंकों में बिहारवासियों ने करीब 101761 करोड़ रुपये जमा करवाया है लेकिन ऋण के नाम पर इन्हें करीब 31921 करोड़ ही मिले हैं. यहाँ मतलब बिलकुल साफ़ है कि, माहौल बदल रहा है, हालात एवं क़ानून व्यवस्था में सुधार हो रहा है पर बैंक के क्रिया-कलाप मे कोई सुधार नही दिख रहा है. हमने अपने प्रदेश के बैंक मे 101761 करोड़ रुपये जमा किया है पर ऋण के रूप मे हमे केवल 31921 करोड़ मिले हैं बांकी के करीब 70000 करोड़ रुपये यू ही या तो बैंक मे पड़े हुए हैं या ये बाहर के प्रदेशों मे जा रहे हैं. बिहार सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती है की यहाँ के बैंक की साख जमा अनुपात अर्थात ऋण देने की दर मे बढ़ोतरी करना. अगर हम बिहार की तुलना अन्य प्रदेशों से करें तो पता चलेगा की ऋण देने मे हम कितने पीछे हैं.
राज्य जमा(करोड़) क़र्ज़(करोड़) प्रतिशत(क़र्ज़ का)
तमिलनाडु 251532 282604 113
आंध्रप्रदेश 245686 269760 109
राजस्थान 123918 103295 87
कर्नाटक 283571 226879 80
महाराष्ट्र 1693706 1313775 78
गुजरात 210738 143015 68
मध्यप्रदेश 134274 81023 60
बिहार 101762 31921 31
(सर्वे रिपोर्ट, सौजन्य- दैनिक हिन्दुस्तान)
अगर उपर्युक्त आंकड़ों को देखें तो हमें पता चलता है कि बैंक वालों के रवैये के कारण हम कितने पिछड़े हुए हैं और इस हालात में हमें अपने निकटम प्रदेश के आस-पास भी पहुंचना मुश्किल सा प्रतीत हो जाता है. अगर हम आंकड़ों को देखें तो पता चलेगा कि साख जमा अनुपात के मामले में बिहार देश के सभी छोटे और बड़े राज्यों से पिछड़ा हुआ है. इस मामले में महाराष्ट्र, राजस्थान, कर्नाटक एवं गुजरात जैसे राज्य बिहार से दोगुने या उससे भी ज्यादा आगे हैं. मिजोरम ने 61 प्रतिशत, उड़ीसा ने 52 प्रतिशत, मणिपुर ने 50 प्रतिशत, सिक्किम ने 42 प्रतिशत और असम ने 40 प्रतिशत कि दर के साथ हमें पीछे छोड़ रखा है.
अब मेरा आग्रह बिहार के मुख्यमंत्री जी से है कि कृपया इन बातों पर ज़रा गौर फरमाएं जिससे बिहार में स्वरोजगार की संभावनाएं बढ़ेगी. जिस पलायन को रोकने के लिए सभी सरकारें सिर्फ कहने का प्रयास ही कर रही हैं, शायद वो हम रोक सकेंगे और जो समृद्ध बिहार केवल हमारी कल्पना में ही बसी हुई है उसे यकीन में बदल सकते हैं
अगर हम रिपोर्ट देखें तो पाएंगे कि पूरे बिहार के बैंकों में बिहारवासियों ने करीब 101761 करोड़ रुपये जमा करवाया है लेकिन ऋण के नाम पर इन्हें करीब 31921 करोड़ ही मिले हैं. यहाँ मतलब बिलकुल साफ़ है कि, माहौल बदल रहा है, हालात एवं क़ानून व्यवस्था में सुधार हो रहा है पर बैंक के क्रिया-कलाप मे कोई सुधार नही दिख रहा है. हमने अपने प्रदेश के बैंक मे 101761 करोड़ रुपये जमा किया है पर ऋण के रूप मे हमे केवल 31921 करोड़ मिले हैं बांकी के करीब 70000 करोड़ रुपये यू ही या तो बैंक मे पड़े हुए हैं या ये बाहर के प्रदेशों मे जा रहे हैं. बिहार सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती है की यहाँ के बैंक की साख जमा अनुपात अर्थात ऋण देने की दर मे बढ़ोतरी करना. अगर हम बिहार की तुलना अन्य प्रदेशों से करें तो पता चलेगा की ऋण देने मे हम कितने पीछे हैं.
राज्य जमा(करोड़) क़र्ज़(करोड़) प्रतिशत(क़र्ज़ का)
तमिलनाडु 251532 282604 113
आंध्रप्रदेश 245686 269760 109
राजस्थान 123918 103295 87
कर्नाटक 283571 226879 80
महाराष्ट्र 1693706 1313775 78
गुजरात 210738 143015 68
मध्यप्रदेश 134274 81023 60
बिहार 101762 31921 31
(सर्वे रिपोर्ट, सौजन्य- दैनिक हिन्दुस्तान)
अगर उपर्युक्त आंकड़ों को देखें तो हमें पता चलता है कि बैंक वालों के रवैये के कारण हम कितने पिछड़े हुए हैं और इस हालात में हमें अपने निकटम प्रदेश के आस-पास भी पहुंचना मुश्किल सा प्रतीत हो जाता है. अगर हम आंकड़ों को देखें तो पता चलेगा कि साख जमा अनुपात के मामले में बिहार देश के सभी छोटे और बड़े राज्यों से पिछड़ा हुआ है. इस मामले में महाराष्ट्र, राजस्थान, कर्नाटक एवं गुजरात जैसे राज्य बिहार से दोगुने या उससे भी ज्यादा आगे हैं. मिजोरम ने 61 प्रतिशत, उड़ीसा ने 52 प्रतिशत, मणिपुर ने 50 प्रतिशत, सिक्किम ने 42 प्रतिशत और असम ने 40 प्रतिशत कि दर के साथ हमें पीछे छोड़ रखा है.
अब मेरा आग्रह बिहार के मुख्यमंत्री जी से है कि कृपया इन बातों पर ज़रा गौर फरमाएं जिससे बिहार में स्वरोजगार की संभावनाएं बढ़ेगी. जिस पलायन को रोकने के लिए सभी सरकारें सिर्फ कहने का प्रयास ही कर रही हैं, शायद वो हम रोक सकेंगे और जो समृद्ध बिहार केवल हमारी कल्पना में ही बसी हुई है उसे यकीन में बदल सकते हैं
शुक्रवार, 8 अक्टूबर 2010
बिहार चुनाव- हाय रे नेता तेरा रंग कैसा
आजकल मैं अपने गृह शहर पटना आया हुआ हूँ. यहाँ आ कर मैंने पाया की यहाँ चुनाव चर्चा अपने चरम पर है और देश की सभी मीडिया चाहे वो प्रिंट हो या इलेक्ट्रोनिक सभी बिलकुल मिनट मिनट की खबर जनता तक पहुंचा रहे हैं. आज सुबह ही मैंने जब समाचार पत्र देखा तो एक जबरदस्त न्यूज़ पर नज़र गयी कि "प्रदेश भाजपा अध्यक्ष पद्मश्री सी. पी. ठाकुर का इस्तीफा" और साथ ही उनका एक बयान था कि "मैं पार्टी के टिकट बटवारे से नाखुश हूँ. यहाँ भाजपा के समर्पित कार्यकर्ताओं कि अवहेलना कि गयी है.मेरा बेटा विवेक ठाकुर भाजपा का समर्पित कार्यकर्ता है."
यह न्यूज़ पढने के ठीक बाद मेरी नज़र नीचे कोने में लिखी एक और न्यूज़ पर गयी जहाँ लिखा था कि " सी. पी. ठाकुर के पुत्र विवेक ठाकुर कांग्रेस से चुनाव लड़ेंगे." यह खबर पढ़ते ही मेरे मन में तभी से एक अंतर्द्वंद चल रहा है कि क्या आज के युग में "समर्पण और अवसरवादिता" एक दुसरे के पर्यायवाची हो गए हैं, क्या रामायण कि यह चौपाई सचमुच चरितार्थ हो गयी है कि. "प्रभुता में कछु दोष न गोसाईं" अर्थात समृद्ध व्यक्ति हमेशा सही होता है? एक तरफ अध्यक्ष महोदय कह रहे हैं कि बेटा पार्टी का समर्पित कार्यकर्ता है और दूसरी तरफ टिकट के लिए कांग्रेस से भी संपर्क साधे हुए हैं. अगर सी. पी. ठाकुर के व्यक्तित्व और उनका इतिहास देखें तो चिकित्सा के क्षेत्र में गोल्ड मेडल और कई ऐसे मेडल, अवार्ड लेने के बाद भारत सरकार से पद्मश्री अवार्ड से भी नवाज़े गए. पर आज का इनका बयान और क्रिया कलाप देख कर लगता है कि राजनीति अच्छे अच्छों का ईमान बदल देती है. शायद आज के युग में महात्मा गाँधी जी भी होते तो पुत्रवाद, परिवारवाद और अवसरवादी चरित्र से खुद को दूर नहीं रख पाते. क्यूंकि आज कि राजनीती है ही ऐसी. अब मुझे लग रहा है कि जे. पी. आन्दोलन के प्रणेता श्री जयप्रकाश नारायण को भगवान् ने पुत्र से वंचित इसलिए रखा था कि कहीं समय इनपर भी पुत्रमोह का दाग न लगा दे.
आज कल हर एक नेता समाज सेवा के थोथे दावे कर के अपने पुत्र और परिवार को आगे बढाते हुए समाजवाद कि बात करते हैं. इसका सबे बड़ा जीता जागता उदहारण हैं हमारे पूर्व केंद्रीय मंत्री श्री रामविलास पासवान. इनकी पार्टी लोजपा (लोकतांत्रिक जनशक्ति पार्टी) के अधिकतम उम्मीदवार इनके परिवार से ही हैं. कोई भाई है तो कोई समधी, कोई भतीजा है तो कोई दामाद. अब रामविलास जी के ननिहाल कि तरफ चलते हैं तो वहां पाएंगे कि इनके मामा श्री रामसेवक हजारी जिन्होंने नीतीश कुमार का दामन जद यु थाम के खुद विधान सभा चुनाव लड़ रहे हैं. साथ ही अपने पुत्र महेश्वर हजारी को सांसद बनाया और दुसरे पुत्र शशिभूषण हजारी के साथ अपनी बहु मंजू हजारी को भी चुनाव लडवा रहे हैं. परिवारवाद का विरोध करने वाले नीतीश कुमार इन्हें अपना मौन समर्थन दिए हुए हैं. लालू प्रसाद के तरफ चलें तो वहां भी वही हाल है. अब तो उन्होंने अपने बेटे को अगला उत्तराधिकारी भी घोषित कर दिया है. कैलाशपति मिश्रा का तो जातिवाद जग जाहिर ही है. क्यूंकि जब 1990 में पार्टी के अंतर्कलह के कारण रातों रात पार्टी अध्यक्ष पद से इन्दर सिंह नामधारी को हटा कर कैलाशपति मिश्रा को अध्यक्ष बनाया गया था तो, कैलाशपति मिश्र ने नामधारी के द्वारा जारी किये गए उम्मीदवारों के लिस्ट को बदल कर नयी लिस्ट ज़ारी कि. जिसमे से इन्होने नविन किशोरे सिन्हा और नन्द किशोर यादव जैसे लगातार जितने वाले प्रत्याशी को हटा कर अपने ख़ास लोगों को टिकट दिया था. वैसे कांग्रेस तो परिवारवाद के परंपरा कि जननी ही मानी जाती है.
ये तो सिर्फ एक बानगी है. अगर मैं पूरा व्योरा देने बैठ जाऊंगा तो शायद पन्नों कि कमी के साथ स्याही भी कम पड़ जायेगा. यहाँ का हर नेता समाजवाद का जीता जागता उदाहरण बन रहा है. आज के सन्दर्भ में मेरी परिभाषा इस समाजवाद के लिए कुछ और ही है. असल में ये है समाज-बाद, अर्थात हम पहले समाज बाद में. अब यहाँ सवाल यह आता है कि मतदाता क्या करे? ये शायद बहुत ही महत्वपूर्ण सवाल है. क्यूंकि हम आम मतदाता के लिए यह असमंजस का विषय है कि हम बाहुबलियों से किनारा करें या इस परिवारवाद से. मेरी समझ से अब वक़्त आ गया है कि एक वोट में कितनी शक्ति है ये जानने का और इन नेताओं को बाहुबलियों और परिवारवाद की राजनीती का सबक सिखाने का. जिससे हम इन राजनेताओं का मोहरा न बने और सुसंस्कृत देश और प्रदेश का निर्माण कर सकें.
यह न्यूज़ पढने के ठीक बाद मेरी नज़र नीचे कोने में लिखी एक और न्यूज़ पर गयी जहाँ लिखा था कि " सी. पी. ठाकुर के पुत्र विवेक ठाकुर कांग्रेस से चुनाव लड़ेंगे." यह खबर पढ़ते ही मेरे मन में तभी से एक अंतर्द्वंद चल रहा है कि क्या आज के युग में "समर्पण और अवसरवादिता" एक दुसरे के पर्यायवाची हो गए हैं, क्या रामायण कि यह चौपाई सचमुच चरितार्थ हो गयी है कि. "प्रभुता में कछु दोष न गोसाईं" अर्थात समृद्ध व्यक्ति हमेशा सही होता है? एक तरफ अध्यक्ष महोदय कह रहे हैं कि बेटा पार्टी का समर्पित कार्यकर्ता है और दूसरी तरफ टिकट के लिए कांग्रेस से भी संपर्क साधे हुए हैं. अगर सी. पी. ठाकुर के व्यक्तित्व और उनका इतिहास देखें तो चिकित्सा के क्षेत्र में गोल्ड मेडल और कई ऐसे मेडल, अवार्ड लेने के बाद भारत सरकार से पद्मश्री अवार्ड से भी नवाज़े गए. पर आज का इनका बयान और क्रिया कलाप देख कर लगता है कि राजनीति अच्छे अच्छों का ईमान बदल देती है. शायद आज के युग में महात्मा गाँधी जी भी होते तो पुत्रवाद, परिवारवाद और अवसरवादी चरित्र से खुद को दूर नहीं रख पाते. क्यूंकि आज कि राजनीती है ही ऐसी. अब मुझे लग रहा है कि जे. पी. आन्दोलन के प्रणेता श्री जयप्रकाश नारायण को भगवान् ने पुत्र से वंचित इसलिए रखा था कि कहीं समय इनपर भी पुत्रमोह का दाग न लगा दे.
आज कल हर एक नेता समाज सेवा के थोथे दावे कर के अपने पुत्र और परिवार को आगे बढाते हुए समाजवाद कि बात करते हैं. इसका सबे बड़ा जीता जागता उदहारण हैं हमारे पूर्व केंद्रीय मंत्री श्री रामविलास पासवान. इनकी पार्टी लोजपा (लोकतांत्रिक जनशक्ति पार्टी) के अधिकतम उम्मीदवार इनके परिवार से ही हैं. कोई भाई है तो कोई समधी, कोई भतीजा है तो कोई दामाद. अब रामविलास जी के ननिहाल कि तरफ चलते हैं तो वहां पाएंगे कि इनके मामा श्री रामसेवक हजारी जिन्होंने नीतीश कुमार का दामन जद यु थाम के खुद विधान सभा चुनाव लड़ रहे हैं. साथ ही अपने पुत्र महेश्वर हजारी को सांसद बनाया और दुसरे पुत्र शशिभूषण हजारी के साथ अपनी बहु मंजू हजारी को भी चुनाव लडवा रहे हैं. परिवारवाद का विरोध करने वाले नीतीश कुमार इन्हें अपना मौन समर्थन दिए हुए हैं. लालू प्रसाद के तरफ चलें तो वहां भी वही हाल है. अब तो उन्होंने अपने बेटे को अगला उत्तराधिकारी भी घोषित कर दिया है. कैलाशपति मिश्रा का तो जातिवाद जग जाहिर ही है. क्यूंकि जब 1990 में पार्टी के अंतर्कलह के कारण रातों रात पार्टी अध्यक्ष पद से इन्दर सिंह नामधारी को हटा कर कैलाशपति मिश्रा को अध्यक्ष बनाया गया था तो, कैलाशपति मिश्र ने नामधारी के द्वारा जारी किये गए उम्मीदवारों के लिस्ट को बदल कर नयी लिस्ट ज़ारी कि. जिसमे से इन्होने नविन किशोरे सिन्हा और नन्द किशोर यादव जैसे लगातार जितने वाले प्रत्याशी को हटा कर अपने ख़ास लोगों को टिकट दिया था. वैसे कांग्रेस तो परिवारवाद के परंपरा कि जननी ही मानी जाती है.
ये तो सिर्फ एक बानगी है. अगर मैं पूरा व्योरा देने बैठ जाऊंगा तो शायद पन्नों कि कमी के साथ स्याही भी कम पड़ जायेगा. यहाँ का हर नेता समाजवाद का जीता जागता उदाहरण बन रहा है. आज के सन्दर्भ में मेरी परिभाषा इस समाजवाद के लिए कुछ और ही है. असल में ये है समाज-बाद, अर्थात हम पहले समाज बाद में. अब यहाँ सवाल यह आता है कि मतदाता क्या करे? ये शायद बहुत ही महत्वपूर्ण सवाल है. क्यूंकि हम आम मतदाता के लिए यह असमंजस का विषय है कि हम बाहुबलियों से किनारा करें या इस परिवारवाद से. मेरी समझ से अब वक़्त आ गया है कि एक वोट में कितनी शक्ति है ये जानने का और इन नेताओं को बाहुबलियों और परिवारवाद की राजनीती का सबक सिखाने का. जिससे हम इन राजनेताओं का मोहरा न बने और सुसंस्कृत देश और प्रदेश का निर्माण कर सकें.
मंगलवार, 31 अगस्त 2010
नक्सली कौन...?
आज सुबह मैं बड़ी मीठी नींद में सोया हुआ था कि मेरे फ़ोन के घंटी बज उठी. मुझे बड़ा गुस्सा आया क्यूंकि बीती रात मैं देर से सोया था. बड़े अनमने ढंग से मैंने फ़ोन उठाया तो पता चला की फ़ोन मेरे पिता जी का था. आधी नींद में ही मैं उनसे बात कर रहा था. पर पिता जी ने एक ऐसा समाचार सुनाया कि मेरे बिलकुल ही होश उड़ गए और मेरी नींद कहाँ चली गयी मुझे पता ही नहीं चला. अब मैं उस समय से उठ कर आत्मंथन में लगा हुआ हूँ कि ये क्या हो रहा है. जो भी समाचार मुझे मेरे पिता जी ने सुबह सुबह दिया उसके बारे में सोच कर समझ नहीं आ रहा है कि ये दोष किसे दूं मैं.
असल में हमारे एक पारिवारिक मित्र हैं जो मेरे पिता जी के साथ स्कूल में पढ़ते थे. इनके परिवार के साथ हमारा बड़ा ही घनिष्ठ सम्बन्ध है. आपको जैसा कि ज्ञात होगा कि गत दिनों बिहार के लखीसराय जिले में नक्सलियों की पुलिस के साथ जबरदस्त मुठभेड़ हुई थी, जिसमे सात पुलिसकर्मी शहीद हो गए थे और कई पुलिसकर्मियों को उन्होंने बंधक बना लिया है. उन अपहृत लोगों में मेरे पिता जी के दोस्त के दामाद भी हैं, जो लखीसराय के किसी थाने में कार्यरत थे.
जब से ये खबर मेरे कानो में आई है मैं यही सोच रहा हूँ कि ये क्या हो रहा है. इस घटना के करीब 2 दिन हो चुके हैं लेकिन इनलोगों का कोई पता भी नहीं है कि ये लोग कहाँ हैं. नक्सलियों ने इनके साथ किया क्या है. ये जिंदा भी हैं ये मर गए. बस इन 2 दिनों में सरकार से इनके परिजनों को एक ही चीज़ मिल रही है और वो है 'भरोसा', इसके अलावा सरकार इन मामूली अधिकारियों या आम आदमी के लिए कुछ नहीं कर सकती. क्यूंकि ये किसी गृहमंत्री जी के पुत्री नहीं है, ये एक मामूली से आम आदमी है. अगर कल इनके मरने कि भी खबर आ जाये तो सरकारी खजाने से 10 लाख की रकम दे कर सरकार सोचेगी कि हमारा काम हो गया. क्या यही इन्साफ है?
ये नक्सली दिन दहाड़े हमारी हत्याएं करते रहे पर हमारे केंद्रीय मंत्री समझते हैं कि वो भी इंसान हैं इसलिए इनसे बात-चीत करके मामला सुलझाएं. ये राजनेता ज़रा सोचें कि, जितने भी अधिकारी अपहृत हैं, उनके घरों का क्या माहौल होगा अभी? लेकिन ये क्यूँ सोचें, इन्हें क्या फर्क पड़ता है? इनकी राजनीति तो चमकनी चाहिए बस. जहाँ तक मुझे पता है कि जिस क्षेत्र में ये घटना हुई है उसके बारे में ख़ुफ़िया विभाग पहले ही रिपोर्ट दे चूका था कि यहाँ नक्सली कैंप चल रहा है और आशंका जताते हुए राज्य मुख्यालय को भी सतर्क किया गया था. पर शिथिल प्रशासन पर भारी पड़े नक्सलियों ने खून की होली खेलकर प्रशासन को उसकी औकाद बता दी. महत्वपूर्ण बात यह है कि हाल के दिनों में सरकार ने लखीसराय जिले को नक्सल प्रभावित घोषित किया है लेकिन इस जिले में नक्सलियों से लड़ने के लिए न तो संसाधन उपलब्ध है न पुलिस बल. जहाँ नक्सली इस मुठभेड़ के दौरान 100 से अधिक संख्यां में थे और साथ ही नक्सली एल.एम.जी. और ए.के.47 जैसे हथियारों से हमले कर रहे थे पर हमारे पुलिसबल के पास कौन से हथियार होते हैं? मेरा तो सरकार से बड़ा ही सीधा सवाल है कि जब ख़ुफ़िया विभाग कि रिपोर्ट इन जगहों के बारे में आ चुकी थी तो पूर्ण सुविधाएँ हमारे जवानों को क्यूँ नहीं मिली थी, क्यूँ उन्हें भगवान के भरोसे छोड़ दिया गया था?
कुछ दिनों पहले हमारी केंद्रीय मंत्री ममता बनर्जी ने नक्सल के समर्थन में बयान देते हुए कहा है कि उनके साथ अन्याय हो रहा है. साथ ही इनके समर्थन में हमारे एक और केंद्रीय मंत्री प्रणव मुखर्जी का भी बयान आया है. क्या ये कुछ दिनों पहले CRPF पर हुआ नक्सली हमला भूल गए. जिसमे हमारे अनगिनत जवान मौत के घात उतार दिए गए. ज़रा हमारे मंत्रीगण बयान देने के पहले सोचें कि उस हमले में शहीद हुए जवानों के परिवार पर क्या बिता होगा यह सब सुनकर. वो यही सोच रहे होंगे कि "जिसने इनके घर का चिराग बुझा दिया ये सरकार उसी को बचाने में लगी है" और इधर इन पुलिस पदाधिकारियों के अपहरण हुए करीब दो दिन से भी ज्यादा हो चुके हैं, पर अभी तक हमारे माननीय मुख्यमंत्री जी का कोई बयान नहीं आया है. जबकि ये जांबाज़ पुलिस पदाधिकारी अपनी जान पर खेल कर इन नक्सलियों से लोहा लेने गए थे, ताकि क्षेत्र में शान्ति व्यवस्था कायम रह सके. इनके परिवार में कोहराम मचा हुआ है. इनलोगों के आंसू आँखों से सूख ही नहीं रहे हैं. पर सरकार क्या कर रही है कुछ पता नहीं चल रहा है. अब मुझे ऐसा लग रहा है कि सरकार ही अब नक्सालियों जैसी हरकत करने लगा है. अब तो सवाल ये आ गया है कि असल में नक्सली है कौन, ये जंगल में छिपे लोग या फिर सरेआम खादी पहन कर घुमने वाले ये नेता जो नक्सलियों का समर्थन करते हैं? अब सच बताऊँ तो मेरा विश्वास उठ चूका है इन मंत्रियों और सरकार से. आजतक नक्सलियों के समर्थन में बोलने वाले इन मंत्रियों का इस मामले में कोई बयान क्यूँ नहीं आ रहा है? इधर बिहार के मुख्यमंत्री जी भी चुप्पी साधे बैठे हुए हैं. इसलिए मैं इनलोगों कि कुशलता कि कामना ईश्वर से करता हूँ और इनके सकुशल वापसी कि दुआएं मांगता हूँ.
असल में हमारे एक पारिवारिक मित्र हैं जो मेरे पिता जी के साथ स्कूल में पढ़ते थे. इनके परिवार के साथ हमारा बड़ा ही घनिष्ठ सम्बन्ध है. आपको जैसा कि ज्ञात होगा कि गत दिनों बिहार के लखीसराय जिले में नक्सलियों की पुलिस के साथ जबरदस्त मुठभेड़ हुई थी, जिसमे सात पुलिसकर्मी शहीद हो गए थे और कई पुलिसकर्मियों को उन्होंने बंधक बना लिया है. उन अपहृत लोगों में मेरे पिता जी के दोस्त के दामाद भी हैं, जो लखीसराय के किसी थाने में कार्यरत थे.
जब से ये खबर मेरे कानो में आई है मैं यही सोच रहा हूँ कि ये क्या हो रहा है. इस घटना के करीब 2 दिन हो चुके हैं लेकिन इनलोगों का कोई पता भी नहीं है कि ये लोग कहाँ हैं. नक्सलियों ने इनके साथ किया क्या है. ये जिंदा भी हैं ये मर गए. बस इन 2 दिनों में सरकार से इनके परिजनों को एक ही चीज़ मिल रही है और वो है 'भरोसा', इसके अलावा सरकार इन मामूली अधिकारियों या आम आदमी के लिए कुछ नहीं कर सकती. क्यूंकि ये किसी गृहमंत्री जी के पुत्री नहीं है, ये एक मामूली से आम आदमी है. अगर कल इनके मरने कि भी खबर आ जाये तो सरकारी खजाने से 10 लाख की रकम दे कर सरकार सोचेगी कि हमारा काम हो गया. क्या यही इन्साफ है?
ये नक्सली दिन दहाड़े हमारी हत्याएं करते रहे पर हमारे केंद्रीय मंत्री समझते हैं कि वो भी इंसान हैं इसलिए इनसे बात-चीत करके मामला सुलझाएं. ये राजनेता ज़रा सोचें कि, जितने भी अधिकारी अपहृत हैं, उनके घरों का क्या माहौल होगा अभी? लेकिन ये क्यूँ सोचें, इन्हें क्या फर्क पड़ता है? इनकी राजनीति तो चमकनी चाहिए बस. जहाँ तक मुझे पता है कि जिस क्षेत्र में ये घटना हुई है उसके बारे में ख़ुफ़िया विभाग पहले ही रिपोर्ट दे चूका था कि यहाँ नक्सली कैंप चल रहा है और आशंका जताते हुए राज्य मुख्यालय को भी सतर्क किया गया था. पर शिथिल प्रशासन पर भारी पड़े नक्सलियों ने खून की होली खेलकर प्रशासन को उसकी औकाद बता दी. महत्वपूर्ण बात यह है कि हाल के दिनों में सरकार ने लखीसराय जिले को नक्सल प्रभावित घोषित किया है लेकिन इस जिले में नक्सलियों से लड़ने के लिए न तो संसाधन उपलब्ध है न पुलिस बल. जहाँ नक्सली इस मुठभेड़ के दौरान 100 से अधिक संख्यां में थे और साथ ही नक्सली एल.एम.जी. और ए.के.47 जैसे हथियारों से हमले कर रहे थे पर हमारे पुलिसबल के पास कौन से हथियार होते हैं? मेरा तो सरकार से बड़ा ही सीधा सवाल है कि जब ख़ुफ़िया विभाग कि रिपोर्ट इन जगहों के बारे में आ चुकी थी तो पूर्ण सुविधाएँ हमारे जवानों को क्यूँ नहीं मिली थी, क्यूँ उन्हें भगवान के भरोसे छोड़ दिया गया था?
कुछ दिनों पहले हमारी केंद्रीय मंत्री ममता बनर्जी ने नक्सल के समर्थन में बयान देते हुए कहा है कि उनके साथ अन्याय हो रहा है. साथ ही इनके समर्थन में हमारे एक और केंद्रीय मंत्री प्रणव मुखर्जी का भी बयान आया है. क्या ये कुछ दिनों पहले CRPF पर हुआ नक्सली हमला भूल गए. जिसमे हमारे अनगिनत जवान मौत के घात उतार दिए गए. ज़रा हमारे मंत्रीगण बयान देने के पहले सोचें कि उस हमले में शहीद हुए जवानों के परिवार पर क्या बिता होगा यह सब सुनकर. वो यही सोच रहे होंगे कि "जिसने इनके घर का चिराग बुझा दिया ये सरकार उसी को बचाने में लगी है" और इधर इन पुलिस पदाधिकारियों के अपहरण हुए करीब दो दिन से भी ज्यादा हो चुके हैं, पर अभी तक हमारे माननीय मुख्यमंत्री जी का कोई बयान नहीं आया है. जबकि ये जांबाज़ पुलिस पदाधिकारी अपनी जान पर खेल कर इन नक्सलियों से लोहा लेने गए थे, ताकि क्षेत्र में शान्ति व्यवस्था कायम रह सके. इनके परिवार में कोहराम मचा हुआ है. इनलोगों के आंसू आँखों से सूख ही नहीं रहे हैं. पर सरकार क्या कर रही है कुछ पता नहीं चल रहा है. अब मुझे ऐसा लग रहा है कि सरकार ही अब नक्सालियों जैसी हरकत करने लगा है. अब तो सवाल ये आ गया है कि असल में नक्सली है कौन, ये जंगल में छिपे लोग या फिर सरेआम खादी पहन कर घुमने वाले ये नेता जो नक्सलियों का समर्थन करते हैं? अब सच बताऊँ तो मेरा विश्वास उठ चूका है इन मंत्रियों और सरकार से. आजतक नक्सलियों के समर्थन में बोलने वाले इन मंत्रियों का इस मामले में कोई बयान क्यूँ नहीं आ रहा है? इधर बिहार के मुख्यमंत्री जी भी चुप्पी साधे बैठे हुए हैं. इसलिए मैं इनलोगों कि कुशलता कि कामना ईश्वर से करता हूँ और इनके सकुशल वापसी कि दुआएं मांगता हूँ.
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